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केंचुए से खाद बनाना सीखा तो बदल गई रामपुर बकैनिया गांव की तस्वीर
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बिलसंडा। तीन साल पहले तक रामपुर बकैनिया के किसान केंचुए की खाद बनाने के बारे में नहीं जानते थे। तीन साल पहले कृषि मेले से केंचुआ खरीदकर लाए और उससे खाद बनाना शुरू किया। उसे अपनी गेहूं, धान, गन्ना की फसल के अलावा सब्जी उगाते वक्त भी डालने लगे। उत्साहजनक परिणाम आए। फिर क्या था। फसलों की लागत घटकर आधी से भी कम हो गई। उत्पादन भी बढ़ा। इतना ही नहीं, किसान केंचुए की खाद बनाकर आस-पास इलाकों में बेचने भी लगे। इसने पूरे गांव की तस्वीर बदल गई। अब गांव के किसान पहले की तुलना में अधिक संपन्न हो गए हैं और टिकाऊ खेती करने लगे हैं।
लगातार रसायनिक उर्वरकों के इस्तेमाल से जमीन की उर्वरा शक्ति कम हो रही है। इससे फसलों की लागत तो बढ़ती ही है, उत्पादन भी कम होता है। किसान साल भर खेत में रात दिन लगकर मेहनत करते हैं, मगर जब फसल पैदा होती है तो उसमें इतना भी नहीं बचता कि उनके परिवार की ठीक से आजीविका चल सके। मगर, जैविक खेती किसानों का कायाकल्प कर सकती है। किसान चाहे तो केंचुए की खाद बनाकर न केवल अपनी फसलों की लागत कम कर सकते हैं, बल्कि जमीन की उर्वरा शक्ति को भी बढ़ा सकते हैं। इतना ही नहीं, किसान केंचुए की खाद बनाकर खेती के साथ इसे रोजगार के रूप में अपनाकर अपनी आमदनी भी दो गुनी कर सकते हैं। सरकार का भी यही उद्देश्य है।
इस बात को साकार कर दिखाया ग्राम पंचायत बकैनिया रामपुर अमृत के किसानों ने। शुरूआत में गांव के सभी किसान अपने खेत में रसायनिक खादें ही डालते थे। मगर, तीन साल पहले गांव के 10-12 किसान बरखेड़ा क्षेत्र के गांव खूंटीकुआं में आयोजित कृषि मेले में गए। वहां उन्होंने केंचुए की खाद बनाना सीखा। फिर ये किसान वहां से केंचुए लाकर गांव में वर्मी कंपोस्ट (केंचुआ खाद) बनाने लगे। केंचुआ खाद को जब किसानों ने अपने खेतों में सब्जी की फसल में डाला तो उत्साहजनक नतीजे आए। फसलों के उत्पादन में डेढ़ गुनी तक बढ़ोत्तरी हुई। फिर तो गांव के बाकी किसानों ने भी रसायनिक खादों को बंद कर दिया और अपने घरों में केंचुआ लाकर उससे खाद बनाना शुरू कर दिया। इससे न केवल इनकी फसल की पैदावार बढ़ी बल्कि वह वर्मी कंपोस्ट बनाकर अतिरिक्त आमदनी भी कर रहे हैं।
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गांव के किसान संतराम ने बताया कि तीन साल से वह केंचुआ खाद तैयार करके अपनी फसलों में डालते हैं। अतिरिक्त खाद बेचते भी हैं। तीन साल पूर्व परंपरागत कृषि विकास योजना में उन्हें पांच हजार का अनुदान मिला था। उसके बाद गांव के बाकी किसानों ने भी केंचुए की खाद बनाना शुरू कर दिया। अब बड़ी संख्या में गांव के किसान केंचुए खाद वर्मी कंपोस्ट बनाते हैं। इसी खाद से वह मक्का, तुरई, भिंडी जैसी फसलों की पैदावार करते हैं। केंचुए खाद 500 रूपये कट्टा बिकती है। वर्मी कंपोस्ट उत्पादन से उनकी आमदनी बढ़कर दो गुने से भी अधिक हो गई है। धीरे-धीरे गांव के अन्य किसान भी जैविक खेती की ओर अपना रुख करने लगे हैं। गांव की आर्थिक तस्वीर भी बदलने लगी है।
ऐसे बनती है केंचुआ खाद
केंचुआ खाद बनाने के लिए तीन फुट चौड़ाई, 10 से 12 फुट लंबाई और दो से ढाई फुट गहराई का गड्ढा खोदकर उसमें अपशिष्ट गोबर भरते हैं। फिर उसमें केंचुए छोड़ते हैं। गड्डे की फर्श को कंकरीट से पक्का करते हैं। जल निकासी के लिए पिट में एक छिद्र बनाया जाता है। दो गड्ढों का निर्माण एक साथ किया जाता है। बीच में दीवार रखते हैं और उसमें छिद्र छोड़ देते हैं, ताकि आसानी से केंचुए एक से दूसरे गड्ढे में जा सकें। एक माह बाद उस ढेर को लोहे के पंजे की सहायता से पलटते हैं। पिट में नमी बनाए रखने के लिए प्रतिदिन पानी का छिड़काव भी करते हैं। इस तरह 45 से 60 दिन में वर्मी कम्पोस्ट बनकर तैयार हो जाती है। एक एकड़ खेत में रसायनिक खाद का उपयोग करने पर फसल की लागत छह हजार रुपये बैठती है, जबकि वर्मी कंपोस्ट प्रति एकड़ खर्च तीन हजार रुपये का है।
खाद बनाने के लिए सही स्थान होना चाहिए
केंचुआ खाद बनाने के लिए छायादार और नम वातावरण की जरूरत होती है। घने छायादार पेड़ के नीचे या हवादार छप्पर के नीचे केंचुआ खाद बनानी चाहिए क्योंकि नम वातावरण में केंचुओं की बढ़वार जल्दी होती है। स्थान के चुनाव के समय जल निकासी और पानी की व्यवस्था का विशेष ध्यान रखें।
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लगातार रसायनिक उर्वरकों के इस्तेमाल से जमीन की उर्वरा शक्ति कम हो रही है। इससे फसलों की लागत तो बढ़ती ही है, उत्पादन भी कम होता है। किसान साल भर खेत में रात दिन लगकर मेहनत करते हैं, मगर जब फसल पैदा होती है तो उसमें इतना भी नहीं बचता कि उनके परिवार की ठीक से आजीविका चल सके। मगर, जैविक खेती किसानों का कायाकल्प कर सकती है। किसान चाहे तो केंचुए की खाद बनाकर न केवल अपनी फसलों की लागत कम कर सकते हैं, बल्कि जमीन की उर्वरा शक्ति को भी बढ़ा सकते हैं। इतना ही नहीं, किसान केंचुए की खाद बनाकर खेती के साथ इसे रोजगार के रूप में अपनाकर अपनी आमदनी भी दो गुनी कर सकते हैं। सरकार का भी यही उद्देश्य है।
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इस बात को साकार कर दिखाया ग्राम पंचायत बकैनिया रामपुर अमृत के किसानों ने। शुरूआत में गांव के सभी किसान अपने खेत में रसायनिक खादें ही डालते थे। मगर, तीन साल पहले गांव के 10-12 किसान बरखेड़ा क्षेत्र के गांव खूंटीकुआं में आयोजित कृषि मेले में गए। वहां उन्होंने केंचुए की खाद बनाना सीखा। फिर ये किसान वहां से केंचुए लाकर गांव में वर्मी कंपोस्ट (केंचुआ खाद) बनाने लगे। केंचुआ खाद को जब किसानों ने अपने खेतों में सब्जी की फसल में डाला तो उत्साहजनक नतीजे आए। फसलों के उत्पादन में डेढ़ गुनी तक बढ़ोत्तरी हुई। फिर तो गांव के बाकी किसानों ने भी रसायनिक खादों को बंद कर दिया और अपने घरों में केंचुआ लाकर उससे खाद बनाना शुरू कर दिया। इससे न केवल इनकी फसल की पैदावार बढ़ी बल्कि वह वर्मी कंपोस्ट बनाकर अतिरिक्त आमदनी भी कर रहे हैं।
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गांव के किसान संतराम ने बताया कि तीन साल से वह केंचुआ खाद तैयार करके अपनी फसलों में डालते हैं। अतिरिक्त खाद बेचते भी हैं। तीन साल पूर्व परंपरागत कृषि विकास योजना में उन्हें पांच हजार का अनुदान मिला था। उसके बाद गांव के बाकी किसानों ने भी केंचुए की खाद बनाना शुरू कर दिया। अब बड़ी संख्या में गांव के किसान केंचुए खाद वर्मी कंपोस्ट बनाते हैं। इसी खाद से वह मक्का, तुरई, भिंडी जैसी फसलों की पैदावार करते हैं। केंचुए खाद 500 रूपये कट्टा बिकती है। वर्मी कंपोस्ट उत्पादन से उनकी आमदनी बढ़कर दो गुने से भी अधिक हो गई है। धीरे-धीरे गांव के अन्य किसान भी जैविक खेती की ओर अपना रुख करने लगे हैं। गांव की आर्थिक तस्वीर भी बदलने लगी है।
ऐसे बनती है केंचुआ खाद
केंचुआ खाद बनाने के लिए तीन फुट चौड़ाई, 10 से 12 फुट लंबाई और दो से ढाई फुट गहराई का गड्ढा खोदकर उसमें अपशिष्ट गोबर भरते हैं। फिर उसमें केंचुए छोड़ते हैं। गड्डे की फर्श को कंकरीट से पक्का करते हैं। जल निकासी के लिए पिट में एक छिद्र बनाया जाता है। दो गड्ढों का निर्माण एक साथ किया जाता है। बीच में दीवार रखते हैं और उसमें छिद्र छोड़ देते हैं, ताकि आसानी से केंचुए एक से दूसरे गड्ढे में जा सकें। एक माह बाद उस ढेर को लोहे के पंजे की सहायता से पलटते हैं। पिट में नमी बनाए रखने के लिए प्रतिदिन पानी का छिड़काव भी करते हैं। इस तरह 45 से 60 दिन में वर्मी कम्पोस्ट बनकर तैयार हो जाती है। एक एकड़ खेत में रसायनिक खाद का उपयोग करने पर फसल की लागत छह हजार रुपये बैठती है, जबकि वर्मी कंपोस्ट प्रति एकड़ खर्च तीन हजार रुपये का है।
खाद बनाने के लिए सही स्थान होना चाहिए
केंचुआ खाद बनाने के लिए छायादार और नम वातावरण की जरूरत होती है। घने छायादार पेड़ के नीचे या हवादार छप्पर के नीचे केंचुआ खाद बनानी चाहिए क्योंकि नम वातावरण में केंचुओं की बढ़वार जल्दी होती है। स्थान के चुनाव के समय जल निकासी और पानी की व्यवस्था का विशेष ध्यान रखें।