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अमर उजाला ने ही किया था खुलासा
पीलीभीत, ब्यूरो
Updated Sat, 02 Apr 2016 12:46 AM IST
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पीलीभीत में तीन मुठभेड़ों में दस लोगों को मारे जाने की खबर अमर उजाला ने ही तब सबसे पहले पीलीभीत के लोगों तक पहुंचाई थी और इस मुठभेड़ पर सवाल उठाने वाला भी अमर उजाला ही पहला अखबार था। पुलिस अधीक्षक पीलीभीत आर डी त्रिपाठी ने जब अगले दिन मरने वालों के नामों का खुलासा किया तो अमर उजाला की टीम ने अमरिया पहुंचकर बस में सवार प्रत्यक्षदर्शियों से बात कर मामले की सच्चाई जानी। इस मुठभेड़ में मारे गए निर्दोष नरेंदर की मां जुगिंदर ने तब अमर उजाला को बताया था कि अपने बेटे समेत दो लोगों को वह ठीक से जानती है जिनका आतंकवाद से कोई लेना देना नहीं था। उन्होंने बताया था कि पुलिस ने 10 नहीं बल्कि 13 युवकों को बस से उतारा था। जिनमें से दस की ही लाशों मिली हैं। दूसरे प्रत्यक्षदर्शियों ने नाम न छापने की शर्त पर पूरा किस्सा बयां किया था कि किस तरह हाथ बांध कर सब लोगों को जीपों में डाल दिया गया था। फिर इस बात का भी खुलासा किया कि मारे गए युवक पुलिस चौकी में देखे गए थे जहां से जंगल में ले जाकर उन्हें मारा गया। इसके बाद इस मामले में एक के बाद एक खुलासे होते रहे और अमर उजाला में सुर्खियां बनते रहे।
-------------------- फोटो अखबार का फाइल चित्र
सीबीआई ने बनाए 178 गवाह
सीबीआई ने अपनी चार्जशीट में 178 गवाह बनाए। पुलिस कर्मियों के हथियार, कारतूसों समेत 101 सुबूत तलाशे। जांच एजेंसी ने 207 कागजातों को भी अपनी 58 पन्नों की चार्जशीट में साक्ष्य के तौर पर शामिल किया था। सुप्रीम कोर्ट में चार्जशीट आने के बाद 12 जून 1995 को संज्ञान लिया गया और तीन फरवरी 2001 को विचारण के लिए सत्र न्यायालय के सुपुर्द कर दिया गया। 20 जनवरी 2003 को सत्र न्यायालय ने आरोपियों पर आरोप तय किए गए।
मामले में निर्णायक बने तथ्य -
- कोर्ट ने कहा हत्याएं हुई हैं, इसमें कोई संदेह नहीं है। जहां बताया गया, ये घटनाएं वहीं हुईं, इसमें भी कोई संदेह नहीं है। सीएफएसएल के रिटायर्ड वैज्ञानिक सत्यपाल शर्मा के बयान का विश्लेषण किया गया, इससे यह साबित होता है कि उसी बस में गोलियों के निशान पाए गए थे, जिस बस में दस सिख युवकों को बैठाकर ले जाया गया था।
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- गवाह डॉ. जीजी गोपालदास और फार्मासिस्ट डीपी अवस्थी के मुताबिक घटना के वक्त न्यूरिया थानाध्यक्ष जीपी सिंह जिला अस्पताल पीलीभीत में आपात वार्ड में अपना इलाज करवा रहे थे। जबकि थानाध्यक्ष ने खुद जीडी में दर्ज किया था कि वे घटनास्थल पर थे। कोर्ट ने कहा कि युवकों को पहले ही मार दिया गया था। केवल रात के आने और गुजरने का इंतजार किया जा रहा था, ताकि रात में मुठभेड़ होना दिखाया जा सके।
- पोस्टमार्टम करने वाले डॉ. विमल कुमार के बयान के अनुसार युवकों के शरीर पर केवल गोलियों के जख्म व चोटें ही नहीं थीं, अन्य चोटों के निशान भी थे। ऐसे में यह कहा जा सकता है कि युवकों को पहले पकड़ा गया और बाद में हत्या की गई।
- पीएससी प्लाटून कमांडर दयान सिंह ने और पीएसी के जवानों ने बयान दिया कि तीनों थाना क्षेत्रों में घटना के दिन थाने में आमद और रवानगी का गलत उल्लेख किया गया था। पीएससी ने किसी भी मुठभेड़ में हिस्सा नहीं लिया। तीनों थानों की जीडी में पीएसी की आमद और रवानागी जिस समय दिखाई गई, उस समय पीएसी के जवान अपने अपने कैंपों में आराम कर रहे थे। केवल मुठभेड़ को सही साबित करने के लिए पीएसी के जवानों को 13 जुलाई 1991 की सुबह तीन बजे थाने पर बुलाया गया और ड्यूटी का पर्चा भी दिया गया। कोर्ट ने कहा कि ऐसी क्या आवश्यकता थी कि तीनों संबंधित थानों की जीडी में पीएससी की आमद और रवानागी को गलत दर्शाया गया। यह मान भी लिया जाए कि एक थाने की जीडी में गलत समय दर्ज हो गया होगा, लेकिन तीनों थानों में गलत समय दर्ज करने से साबित होता है कि हत्याओं को मुठभेड़ बताने के लिए फर्जी साक्ष्य तैयार किए गए।
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इन लोगों को बस से उतारकर मारा गया
नरिंदर सिंह उर्फ निंदर, पिता दर्शन सिंह, पीलीभीत
लखविंदर सिंह उर्फ लाखा, पिता गुरमेज सिंह, पीलीभीत
बलजीत सिंह उर्फ पप्पू, पिता बसंत सिंह, गुरदासपुर
जसवंत सिंह उर्फ जस्सा, पिता बसंत सिंह, गुरदासपुर
जसवंत सिंह उर्फ फौजी, पिता अजायब सिंह, बटाला
करतार सिंह, पिता अजायब सिंह, बटाला
मुखविंदर सिंह उर्फ मुखा, पिता संतोख सिंह, बटाला
हरमिंदर सिंह उर्फ मिंटा, पिता अजायब सिंह, गुरदासपुर
सुरजनसिंह उर्फ बिट्टो, पिता करनैल सिंह, गुरदासपुर
रनधीर सिंह उर्फ धीरा, पिता सुंदर सिंह, गुरदासपुर
( नोट : तलविंदर सिंह पिता मलकैत, शाहजहांपुर (गुमशुदा बताए गए)
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सीबीआई ने बनाए 178 गवाह
सीबीआई ने अपनी चार्जशीट में 178 गवाह बनाए। पुलिस कर्मियों के हथियार, कारतूसों समेत 101 सुबूत तलाशे। जांच एजेंसी ने 207 कागजातों को भी अपनी 58 पन्नों की चार्जशीट में साक्ष्य के तौर पर शामिल किया था। सुप्रीम कोर्ट में चार्जशीट आने के बाद 12 जून 1995 को संज्ञान लिया गया और तीन फरवरी 2001 को विचारण के लिए सत्र न्यायालय के सुपुर्द कर दिया गया। 20 जनवरी 2003 को सत्र न्यायालय ने आरोपियों पर आरोप तय किए गए।
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मामले में निर्णायक बने तथ्य -
- कोर्ट ने कहा हत्याएं हुई हैं, इसमें कोई संदेह नहीं है। जहां बताया गया, ये घटनाएं वहीं हुईं, इसमें भी कोई संदेह नहीं है। सीएफएसएल के रिटायर्ड वैज्ञानिक सत्यपाल शर्मा के बयान का विश्लेषण किया गया, इससे यह साबित होता है कि उसी बस में गोलियों के निशान पाए गए थे, जिस बस में दस सिख युवकों को बैठाकर ले जाया गया था।
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- गवाह डॉ. जीजी गोपालदास और फार्मासिस्ट डीपी अवस्थी के मुताबिक घटना के वक्त न्यूरिया थानाध्यक्ष जीपी सिंह जिला अस्पताल पीलीभीत में आपात वार्ड में अपना इलाज करवा रहे थे। जबकि थानाध्यक्ष ने खुद जीडी में दर्ज किया था कि वे घटनास्थल पर थे। कोर्ट ने कहा कि युवकों को पहले ही मार दिया गया था। केवल रात के आने और गुजरने का इंतजार किया जा रहा था, ताकि रात में मुठभेड़ होना दिखाया जा सके।
- पोस्टमार्टम करने वाले डॉ. विमल कुमार के बयान के अनुसार युवकों के शरीर पर केवल गोलियों के जख्म व चोटें ही नहीं थीं, अन्य चोटों के निशान भी थे। ऐसे में यह कहा जा सकता है कि युवकों को पहले पकड़ा गया और बाद में हत्या की गई।
- पीएससी प्लाटून कमांडर दयान सिंह ने और पीएसी के जवानों ने बयान दिया कि तीनों थाना क्षेत्रों में घटना के दिन थाने में आमद और रवानगी का गलत उल्लेख किया गया था। पीएससी ने किसी भी मुठभेड़ में हिस्सा नहीं लिया। तीनों थानों की जीडी में पीएसी की आमद और रवानागी जिस समय दिखाई गई, उस समय पीएसी के जवान अपने अपने कैंपों में आराम कर रहे थे। केवल मुठभेड़ को सही साबित करने के लिए पीएसी के जवानों को 13 जुलाई 1991 की सुबह तीन बजे थाने पर बुलाया गया और ड्यूटी का पर्चा भी दिया गया। कोर्ट ने कहा कि ऐसी क्या आवश्यकता थी कि तीनों संबंधित थानों की जीडी में पीएससी की आमद और रवानागी को गलत दर्शाया गया। यह मान भी लिया जाए कि एक थाने की जीडी में गलत समय दर्ज हो गया होगा, लेकिन तीनों थानों में गलत समय दर्ज करने से साबित होता है कि हत्याओं को मुठभेड़ बताने के लिए फर्जी साक्ष्य तैयार किए गए।
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इन लोगों को बस से उतारकर मारा गया
नरिंदर सिंह उर्फ निंदर, पिता दर्शन सिंह, पीलीभीत
लखविंदर सिंह उर्फ लाखा, पिता गुरमेज सिंह, पीलीभीत
बलजीत सिंह उर्फ पप्पू, पिता बसंत सिंह, गुरदासपुर
जसवंत सिंह उर्फ जस्सा, पिता बसंत सिंह, गुरदासपुर
जसवंत सिंह उर्फ फौजी, पिता अजायब सिंह, बटाला
करतार सिंह, पिता अजायब सिंह, बटाला
मुखविंदर सिंह उर्फ मुखा, पिता संतोख सिंह, बटाला
हरमिंदर सिंह उर्फ मिंटा, पिता अजायब सिंह, गुरदासपुर
सुरजनसिंह उर्फ बिट्टो, पिता करनैल सिंह, गुरदासपुर
रनधीर सिंह उर्फ धीरा, पिता सुंदर सिंह, गुरदासपुर
( नोट : तलविंदर सिंह पिता मलकैत, शाहजहांपुर (गुमशुदा बताए गए)
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