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आजादी मिलने तक गोरों की आंखों की किरकिरी बने रहे नासिरुद्दीन खां
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अमरिया। स्वतंत्रता आंदोलन में अमरिया निवासी नासिरुद्दीन खां के योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता। रईस-ए-आजम अमरिया के नाम से विख्यात स्वतंत्रता सेनानी ने असहयोग आंदोलन से लेकर भारत छोड़ो आंदोलन तक में बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया। अपने ओजपूर्ण भाषण के कारण वह देश आजाद होने तक गोरों की आंख की किरकिरी बने रहे। कई बार जेल गए, तमाम यातनाएं के बाद भी देश की आजादी के लिए संघर्ष करते रहे।
नासिरुद्दीन खां का जन्म सन 1901 में कस्बा अमरिया में हुआ था। उनके पूर्वज अफगानिस्तान से आकर भारत में बसे थे। अमरिया में 1857 के विद्रोह के समय में पठानों का गढ़ था। अंग्रेज अधिकारी पठानों का लोहा मानते थे। उसी माहौल में नासिरुद्दीन खां ने नवाब परिवार में होश संभाला और बड़े हुए। नासिरुद्दीन खां के पोते व ग्राम सभा अमरिया के प्रधान मिन्हाजुद्दीन खां उर्फ मिन्नू मियां ने बताया कि 21 मई 1973 को लेखक शिव सुबरन लाल जौहरी ने स्वतंत्रता संग्राम में पीलीभीत का योगदान नामक पुस्तक लिखी। इसमें स्वतंत्रता सेनानी नासिरुद्दीन का पूरा उल्लेख है। बताया कि दादा नासिरुद्दीन को कुश्ती और कसरत का बेहद शौक था। उनकी तुलना जिले के संपन्न लोगों में होती थी। शुरू में उनकी मां ने चाहा कि वह आजादी के आंदोलन में सक्रिय भूमिका न निभाएं लेकिन जब उन्होंने वतन की अहमियत और अपने इरादे बताए तब मां ने कोई आपत्ति नहीं की। उसी दौरान एक जिला मजिस्ट्रेट ने उनके घर जाकर जब नासिरुद्दीन खां की मां से उन्हें रोकने को कहा तो उनकी मां ने चौंकाने वाला जवाब दिया। बोलीं मेरे दो पुत्र हैं। यदि बड़ा बेटा देश के लिए जीवन बलिदान कर सकता है तो मैं अपने छोटे बेटे को भी यही करने के लिए कहूंगी। नासिरुद्दीन खां ने 28 जनवरी 1922 को जिले के कई स्थानों पर भाषण देकर अंग्रेजों के खिलाफ लोगों के दिलों में जल रही आग को धधका दिया। इस पर उन्हें गिरफ्तार कर पहले पीलीभीत फिर लखनऊ जेल में रखा गया। लखनऊ जेल में वह पंडित जवाहर लाल नेहरू के साथ रहे। छह फरवरी 1922 को उन्हें छह माह की कठोर कारावास की सजा हुई। जेल में उन्हें प्रतिदिन सवा मन गेहूं पीसने के लिए दिया जाता था। जेल में अंग्रेजों के खिलाफ आवाज बुलंद करने पर एक बार गर्म सलाखों से उनके माथे पर दागा भी गया। आजादी के बाद भारत सरकार की ओर से उन्हें ताम्र पत्र दिया गया। 20 जनवरी 1980 को उनका निधन हो गया।
कस्बे में जाने वाले मार्ग पर गेट बनवाने की मांग सालों बाद भी अधूरी
अमरिया ब्लॉक में शिलापट पर स्वतंत्रता सेनानी नासिरुद्दीन खां का नाम अंकित है। कई सालों से नासिरुद्दीन खां के वंशज व गांव के लोग उनके नाम से कस्बे में जाने वाले मुख्य मार्ग पर एक दरवाजा बनवाने की सरकार से मांग कर रहे हैं। आज तक किसी ने इस ओर ध्यान ही नहीं दिया।
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नासिरुद्दीन खां का जन्म सन 1901 में कस्बा अमरिया में हुआ था। उनके पूर्वज अफगानिस्तान से आकर भारत में बसे थे। अमरिया में 1857 के विद्रोह के समय में पठानों का गढ़ था। अंग्रेज अधिकारी पठानों का लोहा मानते थे। उसी माहौल में नासिरुद्दीन खां ने नवाब परिवार में होश संभाला और बड़े हुए। नासिरुद्दीन खां के पोते व ग्राम सभा अमरिया के प्रधान मिन्हाजुद्दीन खां उर्फ मिन्नू मियां ने बताया कि 21 मई 1973 को लेखक शिव सुबरन लाल जौहरी ने स्वतंत्रता संग्राम में पीलीभीत का योगदान नामक पुस्तक लिखी। इसमें स्वतंत्रता सेनानी नासिरुद्दीन का पूरा उल्लेख है। बताया कि दादा नासिरुद्दीन को कुश्ती और कसरत का बेहद शौक था। उनकी तुलना जिले के संपन्न लोगों में होती थी। शुरू में उनकी मां ने चाहा कि वह आजादी के आंदोलन में सक्रिय भूमिका न निभाएं लेकिन जब उन्होंने वतन की अहमियत और अपने इरादे बताए तब मां ने कोई आपत्ति नहीं की। उसी दौरान एक जिला मजिस्ट्रेट ने उनके घर जाकर जब नासिरुद्दीन खां की मां से उन्हें रोकने को कहा तो उनकी मां ने चौंकाने वाला जवाब दिया। बोलीं मेरे दो पुत्र हैं। यदि बड़ा बेटा देश के लिए जीवन बलिदान कर सकता है तो मैं अपने छोटे बेटे को भी यही करने के लिए कहूंगी। नासिरुद्दीन खां ने 28 जनवरी 1922 को जिले के कई स्थानों पर भाषण देकर अंग्रेजों के खिलाफ लोगों के दिलों में जल रही आग को धधका दिया। इस पर उन्हें गिरफ्तार कर पहले पीलीभीत फिर लखनऊ जेल में रखा गया। लखनऊ जेल में वह पंडित जवाहर लाल नेहरू के साथ रहे। छह फरवरी 1922 को उन्हें छह माह की कठोर कारावास की सजा हुई। जेल में उन्हें प्रतिदिन सवा मन गेहूं पीसने के लिए दिया जाता था। जेल में अंग्रेजों के खिलाफ आवाज बुलंद करने पर एक बार गर्म सलाखों से उनके माथे पर दागा भी गया। आजादी के बाद भारत सरकार की ओर से उन्हें ताम्र पत्र दिया गया। 20 जनवरी 1980 को उनका निधन हो गया।
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कस्बे में जाने वाले मार्ग पर गेट बनवाने की मांग सालों बाद भी अधूरी
अमरिया ब्लॉक में शिलापट पर स्वतंत्रता सेनानी नासिरुद्दीन खां का नाम अंकित है। कई सालों से नासिरुद्दीन खां के वंशज व गांव के लोग उनके नाम से कस्बे में जाने वाले मुख्य मार्ग पर एक दरवाजा बनवाने की सरकार से मांग कर रहे हैं। आज तक किसी ने इस ओर ध्यान ही नहीं दिया।
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