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ग्रामीणों के लिए जी का जंजाल बना जंगल से सटा इलाका
Updated Sat, 17 Jun 2017 05:47 PM IST
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पीलीभीत। बाघ के हमलों को लेकर ग्रामीण भले ही खौफ के साए में जिंदगी गुजार रहे हों, लेकिन महकमा इसको लेकर पूरी तरह से अंजान बना है। हर बार हमले के बाद वन विभाग की लापरवाही को लेकर ग्रामीणों को आक्रोश सामने आता रहा है।
पिछले बार हुए बाघ के हमले हो या फिररूपपुर के केवल प्रसाद की मौत का मामला। हर बार ग्रामीणों ने जंगल से सटे इलाकों में जानवर न घुस सकें। इसको लेकर पुख्ता बंदोबस्त न होने पर रोष जाहिर किया। उनका कहना है कि काफी समय से वन विभाग के अधिकारियों से जंगल के चारों ओर तार फेंसिंग करने की मांग रखी गई, लेकिन अफसरों ने इसको गंभीरता से लेने की जहमत नहीं उठाई। अनसुना कर टाल दिया गया। लगातार लोगों की जान जा रही है। इसके बावजूद बाघ को काबू करने के लिए एक्सपर्ट जिला स्तर पर नहीं आ सके है। सिर्फ लकीर पीटने का काम विभागीय स्तर से किया जा रहा है। चंद इलाकों में तार फेसिंग कराकर पल्ला झाड़ लिया गया। कभी इस बात का पता लगाने की भी कोशिश नहीं की गई, कि आखिर किन कारणों को लेकर बाघ बार-बार आबादी में प्रवेश कर रहे हैं। कहीं न कहीं वन विभाग का लापरवाह रवैया जंगल से सटे इलाकों में रह रहे ग्रामीणों के लिए जी का जंजाल बना हुआ है। सिर्फ घटना के बाद मरने वालों के जंगल के भीतर आने की बात कहकर खुद का बचाव जारी है। कई बार इसी को लेकर गांव के लोगों के गुस्से का सामना भी विभागीय कर्मचारियों को करना पड़ा है।
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पिछले बार हुए बाघ के हमले हो या फिररूपपुर के केवल प्रसाद की मौत का मामला। हर बार ग्रामीणों ने जंगल से सटे इलाकों में जानवर न घुस सकें। इसको लेकर पुख्ता बंदोबस्त न होने पर रोष जाहिर किया। उनका कहना है कि काफी समय से वन विभाग के अधिकारियों से जंगल के चारों ओर तार फेंसिंग करने की मांग रखी गई, लेकिन अफसरों ने इसको गंभीरता से लेने की जहमत नहीं उठाई। अनसुना कर टाल दिया गया। लगातार लोगों की जान जा रही है। इसके बावजूद बाघ को काबू करने के लिए एक्सपर्ट जिला स्तर पर नहीं आ सके है। सिर्फ लकीर पीटने का काम विभागीय स्तर से किया जा रहा है। चंद इलाकों में तार फेसिंग कराकर पल्ला झाड़ लिया गया। कभी इस बात का पता लगाने की भी कोशिश नहीं की गई, कि आखिर किन कारणों को लेकर बाघ बार-बार आबादी में प्रवेश कर रहे हैं। कहीं न कहीं वन विभाग का लापरवाह रवैया जंगल से सटे इलाकों में रह रहे ग्रामीणों के लिए जी का जंजाल बना हुआ है। सिर्फ घटना के बाद मरने वालों के जंगल के भीतर आने की बात कहकर खुद का बचाव जारी है। कई बार इसी को लेकर गांव के लोगों के गुस्से का सामना भी विभागीय कर्मचारियों को करना पड़ा है।
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