पद्मश्री पाकर भी यूपी के सीताराम दाने-दाने को मोहताज

राम विलास पांडेय/गाजीपुर Updated Thu, 24 Oct 2013 12:02 AM IST
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देश और समाज के लिए उत्कृष्ट कार्य करने वाले भी बदहाली में जीने को मजबूर हैं। प्रतिष्ठित नागरिक सम्मान पद्मश्री से नवाजे गए उत्तर प्रदेश के गाजीपुर में भांवरकोल के सीताराम पाल दाने-दाने को मोहताज हैं। उनकी कोई सुध लेने वाला तक नहीं है। उनका पुत्र भी अंधा है।
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डीएम से लेकर राष्ट्रपति तक उन्होंने मदद की गुहार लगाई लेकिन किसी के हाथ नहीं उठे। ऐसे में तंग आकर अब सीताराम ने राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर निवेदन किया है कि मेरी मौत के बाद मेरे पद्मश्री के तमगे को चिता के साथ ही जला दिया जाए। इससे मेरी आत्मा को शांति मिलेगी।
शेरपुर कलां गांव निवासी सीताराम पाल की उत्कृ ष्ट कंबल बुनाई को कलात्मक सामाजिक कार्य मानते हुए भारत सरकार द्वारा 1981 में उन्हें पद्मश्री सम्मान दिया गया था। 28 मार्च 1981 को तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. नीलम संजीव रेड्डी ने राष्ट्रपति भवन में उन्हें यह सम्मान प्रदान किया था।
इसके बाद जिले में इनकी पहचान तो बन गई लेकिन आर्थिक रूप से वह कभी मजबूत नहीं हो पाए। कुछ ही समय बाद 1986 में उनकी आंखों की रोशनी चली गई। इसके चलते घर की रही-सही पूंजी इलाज में चली गई।

अपनी दशा को लेकर सीताराम पाल ने कई राष्ट्रपतियों और प्रधानमंत्रियों से मुलाकात की लेकिन हर जगह इन्हें कोरा आश्वासन ही मिला। सीताराम का पुत्र श्रवण भी दृष्टिहीन है।

उसकी भी कोई मासिक आमदनी नहीं हैं, जिससे घर का आर्थिक संकट और गहरा गया है। विकलांग पेंशन के रूप में तीन सौ रुपये महीना पाने वाले सीताराम पाल व्यवस्था से बेहद आहत हैं।
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