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फर्जी कमोडिटी एक्चेंज का पर्दाफाश
अमर उजाला, नोएडा
Updated Sat, 16 Nov 2013 01:54 AM IST
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नोएडा में मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज में खरीद-फरोख्त का बड़ा फर्जीवाड़ा पकड़ा गया है। भोपाल में चल रही ट्रेडिंग का सर्वर नोएडा में मिला है।
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भोपाल साइबर सेल की एक टीम ने इंदौर से गिरफ्तार आरोपी की निशानदेही पर फेज टू क्षेत्र के एनएसईजेड परिसर के एक ऑफिस से सर्वर बरामद किया है।
पकड़ा गया आरोपी व उसके साथी फर्जीवाड़ा कर चार माह में व्यापारियों को सोलह लाख रुपये की चपत लगा चुके हैं।
सर्किल ऑफिसर थर्ड राजकुमार मिश्र ने बताया कि बृहस्पतिवार को भोपाल पुलिस की साइबर सेल के डिप्टी एसपी दीपक ठाकुर दो इंसपेक्टरों की टीम के साथ एक आरोपी इंदौर निवासी विजय सेमेर को लेकर नोएडा आए थे।
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उन्होंने बताया कि भोपालसाइबर सेल में 28 अक्तूबर को धोखाधड़ी व आईटी एक्ट का मामला दर्ज किया गया था। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि भोपाल में एयू कमोडिटी मनी हाउस नाम की कंपनी के मालिक अमित व संचालक डब्ल्यूआईएस मेगा ट्रेडर्स व अन्य लोगों ने अपनी कंपनियों को मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज से जुड़ा बताते हुए कारोबार कर रहे थे।
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जबकि पता चला कि वह इस एक्सचेंज के सदस्य तक नहीं हैं। उनके द्वारा व्यापारियों को गुमराह कर उनसे रुपये लेकर कारोबार किया जा रहा है। जांच में आरोप सही पाए गए थे।
पता चला कि इस गोरखधंधे का मास्टर माइंड अमित सोनी उर्फ अमित साहिल है। इससे पहले पुलिस उस तक पहुंचती, जयपुर पुलिस ने उसे किसी और मामले में गिरफ्तार कर लिया।
पुलिस ने उसके एक साथी विजय सेमरे को गिरफ्तार कर रिमांड पर लिया। पता चला कि जिस सर्वर के जरिये लोगों के साथ फर्जीवाडा कर रहे थे वह नोएडा में है। इस जानकारी पर पुलिस नोएडा पहुंची।
फेज टू पुलिस की मदद से सर्वर एनएसईजेड के जी ब्लॉक स्थित प्लॉट नंबर 13 में पहुंची। जहां पुलिस को सर्वर मौजूद मिला। भोपाल पुलिस सर्वर जब्त कर शुक्रवार की सुबह अपने साथ ले गई।
ऐसे चल रहा था गोरखधंधा
चार माह पहले भोपाल में अमित व उसके साथियों ने कमोडिटी ट्रेडिंग की कंपनी खोली। कई व्यापारियों को अपनी कंपनी से खरीद-फरोख्त के लिए जोड़ा।
कंपनी उन व्यापारियों के लिए मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज के जरिये खरीद-फरोख्त करने लगी। इसके लिए उन व्यापारियों का अकाउंट खोल कर एक पासवर्ड भी दे दिया गया था।
अगर व्यापारी देखना चाहे कि उनके अकाउंट में क्या खरीद-फरोख्त हो रही है तो पासवर्ड व अकाउंट नंबर डाल कर चेक कर सकता था। जब व्यापारी ऐसा करता था तो उसका लिंक नोएडा स्थित सर्वर से जुड़ जाता था और फाइलें खुलने लगती थीं।
जिसमें दिखाता था कि उसके अकाउंट में खरीद-फरोख्त चल रही है। व्यापारी विश्वास कर बैठ जाता था। जबकि ऐसा नहीं होता था। व्यापारी के सामने खुलने वाला डाटा फर्जी होता था। माह के अंत में व्यापारी को कारोबार में घाटा बताकर उसकी रकम हड़प लेते थे।
आपसी फूट से खुली पोल
फर्जीवाड़ा की पोल पार्टनरों में हुए विवाद के कारण खुली। चार माह में व्यापारियों से सोलह लाख रुपये हड़पने के बाद पार्टनरों में उन रुपये के बंटवारे को लेकर विवाद हो गया।
इसी विवाद में एक पार्टनर ने साइबर सेल भोपाल को एक ईमेल कर दिया। उस मेल की जांच में यह गोरखधंधा खुल कर सामने आ गया। अगर ऐसा न होता तो शायद करोड़ाें की ठगी हो चुकी होती।