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मृदु होने के साथ कुटिलता भी दूर करो: प्रणम्य सागर
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जैन मिलन विहार के दिगंबर जैन मंदिर में ऑन लाइन प्रवचन करते प्रणम्य सागर महाराज।
- फोटो : MUZAFFARNAGAR
मुजफ्फरनगर। जैन मिलन के पंचायती जैन मंदिर में दशलक्षण पर्व के तीसरे दिन प्रणम्य सागर महाराज ने उत्तम आर्जव धर्म का मर्म बताया।
ऑन लाइन प्रवचन के दौरान उन्होंने बताया कि अपनी आत्मा को योग्य बनाने के लिए सहनशील और मृदु होने के साथ-साथ हमें अपने भीतर की कुटिलता को भी दूर करना है। हम भीतर की मायाचारी से ही अपनी उन्नति स्वयं रोकते हैं। मायाचारी इतनी सूक्ष्म होती हैं कि हमें कुछ पता ही नहीं चलता और हमें अंधकार में ही रहना अच्छा लगने लगता है। हम ज्ञान के मार्ग में, चारित्र में, उन्नति में तरह-तरह के बहाने बनाने लगते हैं। हमें उन्हीं बहानों को बहाना है। जो है उसे उसी रूप में सरल होकर स्वीकार करना चाहिए। जिस प्रकार नदी अपना रास्ता स्वयं बनाती हुई अपनी मंजिल की ओर अग्रसर रहती है, उसी प्रकार हमें अपनी राह की बाधाओं से न घबराकर अपनी मंजिल की ओर बढ़ते रहना चाहिए।
उन्होंने कहा कि आजकल के बच्चे सबसे ज्यादा अपने माता-पिता को धोखा दे रहे हैं। देर रात तक पढ़ाई करने के नाम पर मोबाइल में चैटिंग करते रहते हैं। परिणाम स्वरूप उन्हें अपने ही घर में घुटन होने लगती हैं और गलत स्टेप ले लेते हैं। बेहतर है कि आज से ही हम अपनी बुराई को पहचाने और उसे भीतर से कम करने की कोशिश करें।
उत्तम आर्जव धर्म के पालन का संकल्प किया
खतौली। जैन मंदिरों में उत्तम आर्जव धर्म की विधि विधान पूर्व पूजा अर्चना की गई। अशोक शास्त्री के मार्गदर्शन में मंत्रोच्चार के साथ अर्ध्य समर्पित किए गए। जिनेंद्र भगवान का अभिषेक व पूजन किया गया। ऑनलाइन धर्मचर्चा के माध्यम से राजकुमार जैन ने बताया कि आर्जव का अर्थ सरलता है। अपने जीवन में सरल सहज बनें। जीवन में छल-कपट न करें। मन, वचन व काम में एकरूपता रहे। कपट रहित व्यक्ति को चाहे शास्त्रज्ञान थोड़ा हो परंतु सरल चित होने से शांति बनी रहती है और इसी शांति का नाम ही तो धर्म है। चाहे जितनी भी कठिनाई हो, परंतु छल कपट को मन से निकाल दो। आर्जव धर्म मोक्ष मार्ग के पथ का सहयोगी है। सिद्धार्थ, रवि, सुनील, सतीश, संजय, वीरेश, राजेंद्र, रामकुमार, राकेश, रतनलाल, जुगमंदर, नेमचंद, अरुण औषधि, योगेश, शीलचंद, राजीव मुखिया, मुकेश एडवोकेट, पतेंद्र, सुरेंद्र, बल्लू जैन, अजय, अनुपम, दीपक, अकलंक, राजकुमार, अतुल, आलोक, नीरज जैन आदि रहे।
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ऑन लाइन प्रवचन के दौरान उन्होंने बताया कि अपनी आत्मा को योग्य बनाने के लिए सहनशील और मृदु होने के साथ-साथ हमें अपने भीतर की कुटिलता को भी दूर करना है। हम भीतर की मायाचारी से ही अपनी उन्नति स्वयं रोकते हैं। मायाचारी इतनी सूक्ष्म होती हैं कि हमें कुछ पता ही नहीं चलता और हमें अंधकार में ही रहना अच्छा लगने लगता है। हम ज्ञान के मार्ग में, चारित्र में, उन्नति में तरह-तरह के बहाने बनाने लगते हैं। हमें उन्हीं बहानों को बहाना है। जो है उसे उसी रूप में सरल होकर स्वीकार करना चाहिए। जिस प्रकार नदी अपना रास्ता स्वयं बनाती हुई अपनी मंजिल की ओर अग्रसर रहती है, उसी प्रकार हमें अपनी राह की बाधाओं से न घबराकर अपनी मंजिल की ओर बढ़ते रहना चाहिए।
उन्होंने कहा कि आजकल के बच्चे सबसे ज्यादा अपने माता-पिता को धोखा दे रहे हैं। देर रात तक पढ़ाई करने के नाम पर मोबाइल में चैटिंग करते रहते हैं। परिणाम स्वरूप उन्हें अपने ही घर में घुटन होने लगती हैं और गलत स्टेप ले लेते हैं। बेहतर है कि आज से ही हम अपनी बुराई को पहचाने और उसे भीतर से कम करने की कोशिश करें।
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उत्तम आर्जव धर्म के पालन का संकल्प किया
खतौली। जैन मंदिरों में उत्तम आर्जव धर्म की विधि विधान पूर्व पूजा अर्चना की गई। अशोक शास्त्री के मार्गदर्शन में मंत्रोच्चार के साथ अर्ध्य समर्पित किए गए। जिनेंद्र भगवान का अभिषेक व पूजन किया गया। ऑनलाइन धर्मचर्चा के माध्यम से राजकुमार जैन ने बताया कि आर्जव का अर्थ सरलता है। अपने जीवन में सरल सहज बनें। जीवन में छल-कपट न करें। मन, वचन व काम में एकरूपता रहे। कपट रहित व्यक्ति को चाहे शास्त्रज्ञान थोड़ा हो परंतु सरल चित होने से शांति बनी रहती है और इसी शांति का नाम ही तो धर्म है। चाहे जितनी भी कठिनाई हो, परंतु छल कपट को मन से निकाल दो। आर्जव धर्म मोक्ष मार्ग के पथ का सहयोगी है। सिद्धार्थ, रवि, सुनील, सतीश, संजय, वीरेश, राजेंद्र, रामकुमार, राकेश, रतनलाल, जुगमंदर, नेमचंद, अरुण औषधि, योगेश, शीलचंद, राजीव मुखिया, मुकेश एडवोकेट, पतेंद्र, सुरेंद्र, बल्लू जैन, अजय, अनुपम, दीपक, अकलंक, राजकुमार, अतुल, आलोक, नीरज जैन आदि रहे।
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