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भूख मिटाने को खेतिहर मजदूर बना दंपती
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दूधली में आजीविका चलाने को खेत में भैंसा से जुताई करता दंपती
- फोटो : MUZAFFARNAGAR
भूख मिटाने को खेतिहर मजदूर बना दंपती
मुजफ्फरनगर, चरथावल। कोरोना आपदा में लंबे लॉकडाउन से सिर्फ प्रवासी श्रमिक ही दर-बदर नहीं हुए, बल्कि ग्रामीण अंचल में मेहनत-मजदूरी कर जिंदगी बसर करने वाले लोग भी मुश्किलों में हैं। ऐसे अनगिनत परिवार हैं, जहां न सरकार की अनुकंपा सहारा बन पाई और न ही इमदाद को हाथ पहुंचे।
चरथावल क्षेत्र के दूधली गांव में जून की तेज गर्मी में कृष्ण और लक्ष्मी कश्यप खेत में मजदूरी करते दिखाई दिए। उनकी मुश्किलों और मजबूरियों को कुरेदा तो पता चला वो दंपती हैं और चार बच्चों की भूख का निवाला जुटाने को खेतों में मजदूरी कर रहे हैं। भैंसा-बुग्गी से किराए पर सामान ढोकर वो अपना घर चलाते है। लॉकडाउन में काम ही खत्म हो गए। ऐसे में 150 रुपये प्रति बीघा पर कल्टीवेटर से काश्तकारों के यहां ईख की जुताई कर दो वक्त का निवाला जुटाने में लगे हैं। अकेले में दिक्कत होती है, इसलिए पत्नी साथ निभाती है। बकौल लक्ष्मी चार बच्चे हैं अंश, आकाशी, कार्तिक और अनोखी। उनका पेट पालने को हर रोज 300 रुपये कमा लेते हैं। कृष्ण बताते हैं कि उज्ज्वला योजना का तीन बार फार्म भरा, पर सूची में नाम नहीं आ सका। बीपीएल कार्ड भी नहीं बन पाया। लॉकडाउन में गरीबों को जो 1000 रुपये सरकार ने दिया, वो भी नियमों में उलझ गया। प्रधान के पति रवींद्र पुंडीर का कहना है कि सरकारी योजना का लाभ जिन्होंने प्रयास किया, गांव में सभी को मिला है। क्यों और कैसे कृष्ण और लक्ष्मी वंचित रह गए, इसका पता कराएंगे।
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मुजफ्फरनगर, चरथावल। कोरोना आपदा में लंबे लॉकडाउन से सिर्फ प्रवासी श्रमिक ही दर-बदर नहीं हुए, बल्कि ग्रामीण अंचल में मेहनत-मजदूरी कर जिंदगी बसर करने वाले लोग भी मुश्किलों में हैं। ऐसे अनगिनत परिवार हैं, जहां न सरकार की अनुकंपा सहारा बन पाई और न ही इमदाद को हाथ पहुंचे।
चरथावल क्षेत्र के दूधली गांव में जून की तेज गर्मी में कृष्ण और लक्ष्मी कश्यप खेत में मजदूरी करते दिखाई दिए। उनकी मुश्किलों और मजबूरियों को कुरेदा तो पता चला वो दंपती हैं और चार बच्चों की भूख का निवाला जुटाने को खेतों में मजदूरी कर रहे हैं। भैंसा-बुग्गी से किराए पर सामान ढोकर वो अपना घर चलाते है। लॉकडाउन में काम ही खत्म हो गए। ऐसे में 150 रुपये प्रति बीघा पर कल्टीवेटर से काश्तकारों के यहां ईख की जुताई कर दो वक्त का निवाला जुटाने में लगे हैं। अकेले में दिक्कत होती है, इसलिए पत्नी साथ निभाती है। बकौल लक्ष्मी चार बच्चे हैं अंश, आकाशी, कार्तिक और अनोखी। उनका पेट पालने को हर रोज 300 रुपये कमा लेते हैं। कृष्ण बताते हैं कि उज्ज्वला योजना का तीन बार फार्म भरा, पर सूची में नाम नहीं आ सका। बीपीएल कार्ड भी नहीं बन पाया। लॉकडाउन में गरीबों को जो 1000 रुपये सरकार ने दिया, वो भी नियमों में उलझ गया। प्रधान के पति रवींद्र पुंडीर का कहना है कि सरकारी योजना का लाभ जिन्होंने प्रयास किया, गांव में सभी को मिला है। क्यों और कैसे कृष्ण और लक्ष्मी वंचित रह गए, इसका पता कराएंगे।
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