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स्वतंत्रता दिवस विशेष : क्रांतिकारियों ने उड़ा दिए थे फिरंगियों के होश
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पुरकाजी का शूली वाली बाग, जहां पर क्रांतिकारियों को शूली पर लटकाया गया था।
- फोटो : MUZAFFARNAGAR
स्वतंत्रता दिवस विशेष : क्रांतिकारियों ने उड़ा दिए थे फिरंगियों के होश
मुजफ्फरनगर/पुरकाजी। वर्ष10 मई, 1857 को मेरठ से आजादी की जंग का बिगुल बजते ही जिले में भी क्रांति की मशालें जल उठीं। शाहपुर क्षेत्र में सर्व खाप पंचायत के गांव शोरों (सोरम) में विद्रोह की तैयारी को लेकर आजादी के मतवालों की बैठक हुई थी, जिसमें बिजरोल के शाहमल सिंह, परासौली के नवाब खैराती खां, बड़ौत के लाला देवी सहाय, भोकरहेड़ी के लाला छज्जू सिंह, महमूद अली , नवाब महमूद खां तथा शामली के चौधरी मुहर सिंह आदि शरीक हुए थे। उस समय जिले के कलक्टर बरफोर्ड और ज्वाइंट मजिस्ट्रेट सी ग्रांट थे। विद्रोह की आशंका में अंग्रेज अफसरों ने अपने परिवार सुरक्षित जगहों पर भेज दिए। 14 मई को शहर में हमला हुआ। अंग्रेजों के बंगले लूटकर फूंक दिए गए। कलक्टर बरफोर्ड ने मोहल्ला अबूपुरा में छिपकर जान बचाई थी।
जिला प्रशासन की मदद को 20 वीं कैवेलरी की जो सैनिक टुकड़ी मेरठ से यहां तैनात की गई थी, उसने भी विद्रोहियों का साथ दिया। तहसील सदर से खजाना लूट लिया गया। हालात बेकाबू थे। 29 मई को अबूपुरा में कलक्टर बरफोर्ड की हत्या कर दी गई। उनके बाद जिम्मा ज्वाइंट मजिस्ट्रेट सी.ग्रांट ने संभाला और मेरठ से घुड़सवार सैनिकों की नई टुकड़ी मंगाई। बावजूद इसके 21 जून को लेफ्टिनेंट स्मिथ तथा बटरफील्ड को तलवारों से काट दिया गया। दो दिन तक उनके शव दफन नहीं हो सके थे। शहर में नाकेबंदी कर जैसे-तैसे क्रांतिकारियों पर काबू पाया गया, लेकिन स्वतंत्रता की आग शामली, थानाभवन, जलालाबाद में तेजी से फैल चुकी थी। वीर और वीरांगनाओं ने ब्रिटिश अफसरों को होश फाख्ता कर दिए थे। हर जाति और धर्म के लोगों ने बलिदान किया। अंग्रेजों की हत्या और विद्रोह से आक्रोशित फिरंगियों ने सैकड़ों वीरों को फांसी पर चढ़ा दिया। पुरकाजी का सूली वाला बाग शूरवीरों की गाथा का ऐसा ही मौन गवाह है, जहां सैकड़ों क्रांतिकारियों ने हंसते-हंसते प्राण न्योछावर किये थे। जिले के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में सूली वाले बाग का जिक्र किया गया है, मगर कोई स्मारक प्रशासन आज तक यहां नहीं बना पाया हैं।
शहीद स्थल बने सूली वाला बाग
पुरकाजी। सूली वाला बाग कस्बे को गौरवान्वित करता है। 1857 की क्रांति से जुड़े वीरों के बलिदान की स्मृति में बीते कई साल से भाकियू के प्रदेश महासचिव एवं नगर पंचायत अध्यक्ष जहीर फारुकी के नेतृत्व में कस्बे में तिरंगा यात्रा निकल चुकी है। फारुकी कहते हैं कि 15 अगस्त और 26 जनवरी को प्रति वर्ष अनेक देशभक्ति के कार्यक्रम होते हैं। सूली वाला बाग पर ध्वजारोहण किया जा चुका है। शहीद स्थल घोषित करने की मांग को लेकर हजारों लोग थाने पर गिरफ्तारी दे चुके हैं। मांग पूरी होने तक संघर्ष जारी रहेगा। बुजुर्ग नूरहसन फरीदी कहते हैं कि अपने बड़ों से अंग्रेजों के जुल्मों की बातें सुनी है। अंग्रेज मुंह पर काला नकाब पहनाकर गले में रेशम का फंदा डालकर सूली पर चढ़ाते थे। सरदार सुखपाल सिंह बेदी का कहना है कि 1857 में जान-माल की हानि से ब्रिटिश हुक्मरान बौखला गए थे। क्रांतिकारियों पर जुल्म ढहाए और सूली वाला बाग में फांसी दे दी गई। हाफिज जुल्फिकार कहते है कि जिले में स्वतंत्रता संग्राम के दौरान 1857 का विद्रोह अद्वितीय था। हिंदू और मुस्लिमों ने एकजुट होकर देशभक्ति के साथ अंग्रेजों के पसीने छुड़वा दिए थे।
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खोदाई में मिल चुकी अंग्रेजी राज की तोप
पुरकाजी। इस साल बीस जनवरी को हरिनगर के जंगल में खोदाई के दौरान अंग्रेजी राज की तोप मिली थी, जिसे भाकियू ने सूली वाला बाग में रखवा दिया था। इस प्रकरण में भाकियू और प्रशासन के बीच खींचतान रही। डीएम सेल्वा कुमारी जे के निर्देश पर पुलिस प्रशासन ने ये तोप कब्जे में लेकर जांच हेतु आगरा प्रयोगशाला भिजवा दी थी।
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मुजफ्फरनगर/पुरकाजी। वर्ष10 मई, 1857 को मेरठ से आजादी की जंग का बिगुल बजते ही जिले में भी क्रांति की मशालें जल उठीं। शाहपुर क्षेत्र में सर्व खाप पंचायत के गांव शोरों (सोरम) में विद्रोह की तैयारी को लेकर आजादी के मतवालों की बैठक हुई थी, जिसमें बिजरोल के शाहमल सिंह, परासौली के नवाब खैराती खां, बड़ौत के लाला देवी सहाय, भोकरहेड़ी के लाला छज्जू सिंह, महमूद अली , नवाब महमूद खां तथा शामली के चौधरी मुहर सिंह आदि शरीक हुए थे। उस समय जिले के कलक्टर बरफोर्ड और ज्वाइंट मजिस्ट्रेट सी ग्रांट थे। विद्रोह की आशंका में अंग्रेज अफसरों ने अपने परिवार सुरक्षित जगहों पर भेज दिए। 14 मई को शहर में हमला हुआ। अंग्रेजों के बंगले लूटकर फूंक दिए गए। कलक्टर बरफोर्ड ने मोहल्ला अबूपुरा में छिपकर जान बचाई थी।
जिला प्रशासन की मदद को 20 वीं कैवेलरी की जो सैनिक टुकड़ी मेरठ से यहां तैनात की गई थी, उसने भी विद्रोहियों का साथ दिया। तहसील सदर से खजाना लूट लिया गया। हालात बेकाबू थे। 29 मई को अबूपुरा में कलक्टर बरफोर्ड की हत्या कर दी गई। उनके बाद जिम्मा ज्वाइंट मजिस्ट्रेट सी.ग्रांट ने संभाला और मेरठ से घुड़सवार सैनिकों की नई टुकड़ी मंगाई। बावजूद इसके 21 जून को लेफ्टिनेंट स्मिथ तथा बटरफील्ड को तलवारों से काट दिया गया। दो दिन तक उनके शव दफन नहीं हो सके थे। शहर में नाकेबंदी कर जैसे-तैसे क्रांतिकारियों पर काबू पाया गया, लेकिन स्वतंत्रता की आग शामली, थानाभवन, जलालाबाद में तेजी से फैल चुकी थी। वीर और वीरांगनाओं ने ब्रिटिश अफसरों को होश फाख्ता कर दिए थे। हर जाति और धर्म के लोगों ने बलिदान किया। अंग्रेजों की हत्या और विद्रोह से आक्रोशित फिरंगियों ने सैकड़ों वीरों को फांसी पर चढ़ा दिया। पुरकाजी का सूली वाला बाग शूरवीरों की गाथा का ऐसा ही मौन गवाह है, जहां सैकड़ों क्रांतिकारियों ने हंसते-हंसते प्राण न्योछावर किये थे। जिले के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में सूली वाले बाग का जिक्र किया गया है, मगर कोई स्मारक प्रशासन आज तक यहां नहीं बना पाया हैं।
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शहीद स्थल बने सूली वाला बाग
पुरकाजी। सूली वाला बाग कस्बे को गौरवान्वित करता है। 1857 की क्रांति से जुड़े वीरों के बलिदान की स्मृति में बीते कई साल से भाकियू के प्रदेश महासचिव एवं नगर पंचायत अध्यक्ष जहीर फारुकी के नेतृत्व में कस्बे में तिरंगा यात्रा निकल चुकी है। फारुकी कहते हैं कि 15 अगस्त और 26 जनवरी को प्रति वर्ष अनेक देशभक्ति के कार्यक्रम होते हैं। सूली वाला बाग पर ध्वजारोहण किया जा चुका है। शहीद स्थल घोषित करने की मांग को लेकर हजारों लोग थाने पर गिरफ्तारी दे चुके हैं। मांग पूरी होने तक संघर्ष जारी रहेगा। बुजुर्ग नूरहसन फरीदी कहते हैं कि अपने बड़ों से अंग्रेजों के जुल्मों की बातें सुनी है। अंग्रेज मुंह पर काला नकाब पहनाकर गले में रेशम का फंदा डालकर सूली पर चढ़ाते थे। सरदार सुखपाल सिंह बेदी का कहना है कि 1857 में जान-माल की हानि से ब्रिटिश हुक्मरान बौखला गए थे। क्रांतिकारियों पर जुल्म ढहाए और सूली वाला बाग में फांसी दे दी गई। हाफिज जुल्फिकार कहते है कि जिले में स्वतंत्रता संग्राम के दौरान 1857 का विद्रोह अद्वितीय था। हिंदू और मुस्लिमों ने एकजुट होकर देशभक्ति के साथ अंग्रेजों के पसीने छुड़वा दिए थे।
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खोदाई में मिल चुकी अंग्रेजी राज की तोप
पुरकाजी। इस साल बीस जनवरी को हरिनगर के जंगल में खोदाई के दौरान अंग्रेजी राज की तोप मिली थी, जिसे भाकियू ने सूली वाला बाग में रखवा दिया था। इस प्रकरण में भाकियू और प्रशासन के बीच खींचतान रही। डीएम सेल्वा कुमारी जे के निर्देश पर पुलिस प्रशासन ने ये तोप कब्जे में लेकर जांच हेतु आगरा प्रयोगशाला भिजवा दी थी।