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विश्व आपदा नियंत्रण दिवस:बहुमंजिला इमारतों में नहीं अग्निशमन के पर्याप्त इंतजाम
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बहुमंजिला इमारतों में अग्निशमन के नहीं पर्याप्त इंतजाम
मुजफ्फरनगर। आपदा नियंत्रण के मामले में जनपद सबसे निचले स्तर पर है। शासकीय लिहाज से सी श्रेणी में सूचीबद्ध जिले में न तो बहुमंजिली इमारतों में अग्निशमन के पर्याप्त इंतजाम हैं और न ही भूकंप आदि आने की स्थिति में जल्द राहत कार्य शुरू करने के उपकरण। बेहद सीमित संसाधनों के दम पर अग्निशमन विभाग के कर्मचारी अग्निकांड से तो जूझ सकते हैं, लेकिन कभी कोई बड़ी आपदा आ जाए तो सब कुछ भगवान भरोसे ही है।
जनपद में आपदा नियंत्रण की स्थिति बदहाल है। जिला मुख्यालय होने के बावजूद न तो यहां आपदा प्रबंधन के समुचित इंतजाम हैं और न ही पर्याप्त स्टाफ। शासन स्तर पर सी श्रेणी में सूचीबद्ध जनपद में आपदा प्रबंधन की स्थिति में स्थानीय प्रशासन का रवैया भी बेपरवाह जैसा है। आपदा प्रबंधन में जिले की खस्ता हालत इसी से समझी जा सकती है कि यहां आपदाओं की प्रथम और अनिवार्य स्थिति अग्निकांड पर काबू पाने के लिए भी बेहद सीमित संसाधन हैं। अग्निशमन विभाग के पास नई गाड़ी आए बरसों बीत चुके हैं। सभी हाइड्रेंट पंप सड़कों के नीचे अथवा घनी आबादी में जमीन में दबकर नष्ट हो चुके हैं। संकरी गलियों में आग पर काबू पाने के लिए 400 लीटर क्षमता वाली एकमात्र हाईप्रेशर गाड़ी है, लेकिन बहुमंजिली इमारतों के लिए न तो किसी तरह की सुविधा है और न ही कारगर योजना। बेपरवाही का आलम यह कि जनपद में कुकुरमुत्तों की भांति खुल रहे होटल, रेस्टोरेंट व अन्य प्रतिष्ठानों तक में आग बुझ़ाने के पर्याप्त साधन उपलब्ध नहीं हैं। ऐसे में यदि कोई दैवीय आपदा (भूकंप) आ जाए तो प्रशासन के पास सिवाय हाथ बांधकर खड़े होने के कोई ओर चारा ही नहीं है। कहने को अग्निशमन विभाग को कांबिंग टूल्स, मलबा तोड़ने के उपकरण व लिंटर आदि ऊपर उठाने के लिए जैक आदि मौजूद हैं, लेकिन बरसों से इनका इस्तेमाल ही नहीं हुआ है। ऐसे में ऐनवक्त पर इनके धोखा देने की स्थिति में प्रशासन के पास कोई अन्य विकल्प ही नहीं है, जिससे फौरी तौर पर आपदा में फंसे लोगों की मदद की जा सके।
बॉक्स .......
आपदा प्रबंधन के लिए दक्ष स्टाफ भी नहीं
मुजफ्फरनगर। जनपद में अग्निकांड को छोड़ दें तो किसी भी तरह की दैवीय आपदा होने की स्थिति में उस पर नियंत्रण के लिए दक्ष स्टाफ ही नहीं है। अग्निशमन विभाग खुद कर्मचारियों की कमी से जूझ रहा है, ऐसे में यदि कोई दैवीय आपदा आ जाए तो जिले के हालात भगवान भरोसे ही होंगे।
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भूकंपरोधी भवन निर्माण को लेकर जागरूकता नहीं
मुजफ्फरनगर। जनपद का प्रशासन नियमों का पालन कराने में कितना मुस्तैद है, इसका अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि जनपद में भूकंपरोधी मकान निर्माण के प्रति लोगों को जागरूक ही नहीं किया जा रहा। आज भी बड़ी तादाद में भवनों का निर्माण धड़ल्ले से हो रहा है, लेकिन जागरूकता के अभाव और अधिक खर्च से बचने के लिए इन्हें सामान्य तकनीक से ही निर्मित कराया जा रहा है।
इन्होंने कहा ..........
सीएफओ रमाशंकर तिवारी का कहना है कि शासन स्तर से लगातार संसाधन बढ़ाने की मांग की जाती रही है। विभाग के पास जो बड़ी गाडिय़ां हैं, वे काफी पुरानी हो चुकी हैं। फोम गाड़ी की भी डिमांड बरसों से की जा रही है, लेकिन कोई संभावना फिलहाल नहीं है।
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मुजफ्फरनगर। आपदा नियंत्रण के मामले में जनपद सबसे निचले स्तर पर है। शासकीय लिहाज से सी श्रेणी में सूचीबद्ध जिले में न तो बहुमंजिली इमारतों में अग्निशमन के पर्याप्त इंतजाम हैं और न ही भूकंप आदि आने की स्थिति में जल्द राहत कार्य शुरू करने के उपकरण। बेहद सीमित संसाधनों के दम पर अग्निशमन विभाग के कर्मचारी अग्निकांड से तो जूझ सकते हैं, लेकिन कभी कोई बड़ी आपदा आ जाए तो सब कुछ भगवान भरोसे ही है।
जनपद में आपदा नियंत्रण की स्थिति बदहाल है। जिला मुख्यालय होने के बावजूद न तो यहां आपदा प्रबंधन के समुचित इंतजाम हैं और न ही पर्याप्त स्टाफ। शासन स्तर पर सी श्रेणी में सूचीबद्ध जनपद में आपदा प्रबंधन की स्थिति में स्थानीय प्रशासन का रवैया भी बेपरवाह जैसा है। आपदा प्रबंधन में जिले की खस्ता हालत इसी से समझी जा सकती है कि यहां आपदाओं की प्रथम और अनिवार्य स्थिति अग्निकांड पर काबू पाने के लिए भी बेहद सीमित संसाधन हैं। अग्निशमन विभाग के पास नई गाड़ी आए बरसों बीत चुके हैं। सभी हाइड्रेंट पंप सड़कों के नीचे अथवा घनी आबादी में जमीन में दबकर नष्ट हो चुके हैं। संकरी गलियों में आग पर काबू पाने के लिए 400 लीटर क्षमता वाली एकमात्र हाईप्रेशर गाड़ी है, लेकिन बहुमंजिली इमारतों के लिए न तो किसी तरह की सुविधा है और न ही कारगर योजना। बेपरवाही का आलम यह कि जनपद में कुकुरमुत्तों की भांति खुल रहे होटल, रेस्टोरेंट व अन्य प्रतिष्ठानों तक में आग बुझ़ाने के पर्याप्त साधन उपलब्ध नहीं हैं। ऐसे में यदि कोई दैवीय आपदा (भूकंप) आ जाए तो प्रशासन के पास सिवाय हाथ बांधकर खड़े होने के कोई ओर चारा ही नहीं है। कहने को अग्निशमन विभाग को कांबिंग टूल्स, मलबा तोड़ने के उपकरण व लिंटर आदि ऊपर उठाने के लिए जैक आदि मौजूद हैं, लेकिन बरसों से इनका इस्तेमाल ही नहीं हुआ है। ऐसे में ऐनवक्त पर इनके धोखा देने की स्थिति में प्रशासन के पास कोई अन्य विकल्प ही नहीं है, जिससे फौरी तौर पर आपदा में फंसे लोगों की मदद की जा सके।
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आपदा प्रबंधन के लिए दक्ष स्टाफ भी नहीं
मुजफ्फरनगर। जनपद में अग्निकांड को छोड़ दें तो किसी भी तरह की दैवीय आपदा होने की स्थिति में उस पर नियंत्रण के लिए दक्ष स्टाफ ही नहीं है। अग्निशमन विभाग खुद कर्मचारियों की कमी से जूझ रहा है, ऐसे में यदि कोई दैवीय आपदा आ जाए तो जिले के हालात भगवान भरोसे ही होंगे।
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भूकंपरोधी भवन निर्माण को लेकर जागरूकता नहीं
मुजफ्फरनगर। जनपद का प्रशासन नियमों का पालन कराने में कितना मुस्तैद है, इसका अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि जनपद में भूकंपरोधी मकान निर्माण के प्रति लोगों को जागरूक ही नहीं किया जा रहा। आज भी बड़ी तादाद में भवनों का निर्माण धड़ल्ले से हो रहा है, लेकिन जागरूकता के अभाव और अधिक खर्च से बचने के लिए इन्हें सामान्य तकनीक से ही निर्मित कराया जा रहा है।
इन्होंने कहा ..........
सीएफओ रमाशंकर तिवारी का कहना है कि शासन स्तर से लगातार संसाधन बढ़ाने की मांग की जाती रही है। विभाग के पास जो बड़ी गाडिय़ां हैं, वे काफी पुरानी हो चुकी हैं। फोम गाड़ी की भी डिमांड बरसों से की जा रही है, लेकिन कोई संभावना फिलहाल नहीं है।