बचपन के दोस्त गिरिराज की यादों को सुनाते वक्त भावुक हुए साहित्यकार जेपी, पढ़िए- 68 साल की यादें
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‘गिरिराज का बचपन से ही साहित्यकार बनने और देश के सिरमौर उपन्यासकारों में शामिल होने का सपना था, जो पूरा किया। उनके चले जाने की खबर मिलते ही बचपन से लेकर अब तक 68 साल की दोस्ती का हर लम्हा यादों की पटल पर उतर आया। मैं उनकी हर खुशी का हिस्सा बना, मगर आज अंतिम सफर में शामिल नहीं होने का गम ताउम्र रहेगा। मेरा बचपन का दोस्त अब नहीं रहा, यकीन नहीं हो रहा, इस दुख को बयां करने के लिए शब्द नहीं है... ’यह सब बताते हुए विख्यात साहित्यकार पद्मश्री गिरिराज किशोर के परममित्र साहित्यकार डॉ. जेपी सविता की आंखें नम हो गई। गला भर आया, बोले- हर सप्ताह गिरिराज से फोन पर बातें होती थी। पांच दिन पहले ही बात हुई थी।
मुजफ्फरनगर शहर के भोपा रोड स्थित केडिया वाटिका निवासी एवं एसडी कॉलेज के पूर्व अंग्रेजी के प्रोफेसर 87 वर्षीय डॉ. जेपी सविता के दिल में अपने प्रिय दोस्त प्रख्यात साहित्यकार गिरिराज किशोर की तमाम यादें बसी हैं। बकौल उनके, गिरिराज से वर्ष 1952 में दोस्ती हुई, तब शिव चौक के पास एसडी इंटर और डिग्री कॉलेज एक ही कैंपस में थे। मैं बीए प्रथम वर्ष में था, गिरिराज इंटर में था। उसे बचपन से ही लेखन का शौक था। उसका सबसे बड़ा श्रोता और आलोचक मैं ही था। इसलिए वह जो भी लिखता वह मुझे पहले सुनता था। हमारी दोस्ती पूरे कॉलेज में प्रसिद्ध रही। दोनों का घरों में खूब आना जाना था। स्नातक करने के बाद वो एमएसडब्ल्यू करने आगरा चला गया।
इसके बाद सरकारी नौकरी लगी। अपने लेखन से तमाम वो उपलब्धि हासिल की, जो उसने बचपन में सोची थी। बीते 68 साल से लगातार उससे दोस्ती रही। दिल्ली में उसकी शादी से लेकर बेटियों जया, शिवा, बेटे अनीश की शादी में भी शामिल हुआ। ढाई घर से लेकर गिरमिटिया आदि तमाम अपनी कृति लिखने के बाद मैरे पास भेज कर समीक्षा कराता था। पद्मश्री, व्यास पुुरस्कार, साहित्य अकादमी अवार्ड मिला तो मुझे साथ रखा। जब भी दिल्ली में आया, बड़ी बहन सुभद्रा के यहां उत्तम नगर में उससे मुलाकात होती थी। चार साल पहले अंतिम बार भेंट दिल्ली में ही हुई थी। अब हर सप्ताह फोन पर बाते होती थी।
घर में मुन्ना जी, दोस्त कृष्णा मेनन कहते थे
बुजुर्ग डॉ. सविता बताते हैं कि गिरिराज किशोर जमींदार परिवार से थे। उनके दादा लाला हरिशंकर लाल सलेमपुर गांव के जमींदार थे। पिता लाला सूरजप्रकाश भी जमींदार रहे। शहर के मोती महल में हवेली थी। छह भाइयों और दो बहनों में गिरिराज सबसे बड़े थे। घर में सब उन्हें मुन्ना जी कहते थे, जबकि सावले होने और बाल घुंघराले होने पर दोस्तों में उनका निकनेम कृष्णा मेनन था।
वर्ष 2006 में भतीजी की शादी में आए थे
गिरिराज किशोर और उनकी पत्नी मीरा किशोर छह मई 2006 में अंतिम बार शहर में आए थे। तब अवसर उनकी भतीजी मेघा की शादी का था। शादी समारोह नई मंडी में गणपति पैलेस में हुआ था। शांतिनगर में रहने वाली भतीजी मेघा ने बताया कि वह छोटी बुआ उषा के साथ ही रहती हैं। उषा बुआ का बीमारी के चलते 11 जनवरी को निधन हो गया, ताऊजी को खबर की थी, मगर उनके कूल्हे की हड्डी टूटने के कारण वो बहन की मौत होने पर भी यहां नहीं आ सके।
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