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स्मृति दिवस : कल्याणदेव से रहा शास्त्री जी का अटूट नाता

Fri, 11 Jan 2019 12:21 AM IST
Deepak Kausik अमर उजाला ब्यूरो/ मुजफ्फरनगर
अमर उजाला ब्यूरो/ मुजफ्फरनगर Published by: Deepak Kausik Updated Fri, 11 Jan 2019 12:21 AM IST
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Memorial Day: Shastriji's unbreakable relationship with Kalyanadeva
शास्त्री जी द्वारा स्वामी कल्याणदेव को भेजा गया पत्र। - फोटो : अमर उजाला
जय जवान-जय किसान का नारा देकर देशभक्ति का जज्बा भर गए पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने आजादी के आंदोलन में जिले में तीन साल रहकर क्रांति की मशाल जलाई थी। लोक सेवा संघ ने शास्त्री और अलगू राय को  मुजफ्फरनगर का जिम्मा सौंपा था। वीतराग स्वामी कल्याणदेव के सानिध्य में शास्त्री ने गांवों में स्वाधीनता का संदेश फैलाया था।  
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देश के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की शुक्रवार को 53 वीं पूण्य तिथि है। ताशकंद में 11 जनवरी, 1966 को उनकी मृत्यु हो गई थी। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान वर्ष 1922 से 1924 तक वे जिले में रहे। पंडित मदन मोहन मालवीय और लाला लाजपत राय ने लोक सेवा संघ की स्थापना की थी। युवा कार्यकर्ता सदस्य बने, उनके लाल बहादुर शास्त्री और मऊ जिले के अलगू राय शास्त्री भी शामिल थे। उन्हें मुजफ्फरनगर में संघ के कार्यों का दायित्व दिया गया। शास्त्री काशी से शहर में आए और स्वामी कल्याणदेव से मिले।
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शिक्षा ऋषि ने उन्हें नई मंडी में वकील रोड पर पांच रुपये मासिक किराये पर एक कोठरी दिला दी। ढोलक, हारमोनियम के साथ उनकी टोली दिन में गांवों में खादी, हिंदी और स्वदेशी का प्रचार करती थी। एक बार मंसूरपुर की प्राइमरी पाठशाला में शास्त्री की सभा रखी गई। प्रधानाध्यापक रघुनंदन सिंह ने मुनादी करा दी। विरोध की वजह से उन्हें बिना प्रचार किए लौटना पड़ा। शास्त्री ने वीतराग संत से  जिक्र किया। अगले दिन स्वामी कल्याणदेव खुद उनके साथ मंसूरपुर गांव पहुंचे और सभा कराई। सदर ब्लाक के गांव  पचेंडा कलां में स्वामी ने दलितों के उद्धार को भव्य यज्ञ कराया था, जिसमें लाल बहादुर शास्त्री, अलगू राय और स्वतंत्रता सेनानी भाई परमानंद ने आहुति दी।
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जिले में उनकी सक्रियता एवं क्षमता देखने के बाद उन्हें प्रयागराज (इलाहाबाद) बुला लिया गया, जहां संघ सचिव की जिम्मेदारी दी गई थी। स्वामी कल्याणदेव प्रयाग जाते तो शास्त्री से अवश्य भेंट होती थी। उन्होंने 20 अप्रैल, 1948 को स्वामी कल्याणदेव को चिट्ठी भेजी थी। शास्त्री ने लिखा था कि पचेन्डॉ कलां यज्ञ मेरी यादों में बसा हैं। भागवत पीठ शुकदेव आश्रम , शुकतीर्थ के पीठाधीश्वर स्वामी ओमानंद बताते है कि गुरुदेव के संग्रहालय में रखी पत्रावलियों में शास्त्री के जीवन की अमिट बातें उनके आदर्श व्यक्तित्व को दर्शाती है। शास्त्री के निधन के बाद 5 फरवरी, 1966 को उनके बड़े पुत्र हरि किशन शास्त्री परिवार के साथ शुकतीर्थ आए थे। वीतराग संत ने देशभक्त वियोगी हरि के कर कमलों से शास्त्री धर्मार्थ औषधालय की स्थापना कराई थी।
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