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मातृभाषा को बढ़ावा देने के लिए दवाई हिंदी में लिखी
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डा.केपीएस मलिक
- फोटो : MUZAFFARNAGAR
मातृभाषा को बढ़ावा देने के लिए दवाई हिंदी में लिखी
मुजफ्फरनगर। हिंदी हैं हम भारतवासियों की पहचान है। हिंदी संस्कृति और संस्कारों का समावेश है। दुनिया में सबसे ज्यादा बोली जाने वाली हमारी राष्ट्रभाषा हिंदी पर हमें गर्व है। नेत्र रोग सर्जन डॉ. केपीएस मलिक का हिंदी से लगाव अभिभूत करने वाला है। उनका मानना है केंद्र सरकार के मंत्रालयों में तमाम फाइलों पर आदेश, दिशा-निर्देश और टिप्पणी की परंपरा हिंदी में लिखे जाने का आदेश सख्ती से लागू किया जाना जरूरी है, तभी हिंदी का महत्व बढ़ेगा। उन्होंने हिंदी में रक्तदान जीवनदान नामक पुस्तक लिखी और दिल्ली सफदरजंग हॉस्पिटल में हिंदी की प्रतियोगिताएं जीतीं।
मातृभाषा हिंदी से अनूठा लगाव रखते हैं डॉ. मलिक
जनपद के बधाई कलां निवासी डॉ. केपीएस मलिक सफदरजंग हॉस्पिटल से नेत्र विभागाध्यक्ष एवं केंद्र सरकार के स्वास्थ्य विभाग से एडिशनल डायरेक्टर के पद से रिटायर हुए हैं। हिंदी भाषा को बढ़ावा देने के लिए उन्होंने सार्थक प्रयास किए। उन्होंने सभी फाइलों पर टिप्पणी हिंदी में लिखना शुरू कराया था। दिल्ली हॉस्पिटल में हर वर्ष हिंदी प्रतियोगिता में वह हिंदी में प्रतियोगिता जीतते थे। मेडिकल कॉलेज रोहतक में असिस्टेंट प्रोफेसर पद पर रहते हुए वहां 19 बार रक्तदान करने के बाद उन्होंने ‘रक्तदान जीवन दान’ किताब हिंदी में लिखी, जो मेडिकल संस्थानों में सराही गई। दिल्ली हॉस्पिटल में मरीजों के पर्चें में हिंदी में भी दवाएं और हिदायतें लिखने का सफलतापूर्वक कार्य किया।
साहित्य सृजन से दे रहीं हिंदी को बढ़ावा
मुजफ्फरनगर। जैन कन्या पाठशाला पीजी कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. सविता वशिष्ठ का संस्कृत के अलावा हिंदी से अनूठा लगाव है। कहती हैं कि हिंदी हमारी पहचान, है, देश की शान है। दुनिया की सब भाषाओं की मां कहूं, तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। उन्होंने अनेक शोध पत्रों को हिंदी में प्रकाशित कराया। पुराण साहित्य का आविर्भाव और श्रीमद्भागवत महापुराण साहित्यों का सृजन कर समाज को नई दिशा दी। योग के स्वरूप और उसके भेद नाम पुस्तक काफी प्रचलित रही। हिंदी हमारे संस्कारों और संस्कृति की संवाहक, संप्रेषक और परिचायक है। अत्यंत सरल, सहज और सुगम भाषा होने के कारण हिंदी विश्व की वैज्ञानिक भाषा है।
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मुजफ्फरनगर। हिंदी हैं हम भारतवासियों की पहचान है। हिंदी संस्कृति और संस्कारों का समावेश है। दुनिया में सबसे ज्यादा बोली जाने वाली हमारी राष्ट्रभाषा हिंदी पर हमें गर्व है। नेत्र रोग सर्जन डॉ. केपीएस मलिक का हिंदी से लगाव अभिभूत करने वाला है। उनका मानना है केंद्र सरकार के मंत्रालयों में तमाम फाइलों पर आदेश, दिशा-निर्देश और टिप्पणी की परंपरा हिंदी में लिखे जाने का आदेश सख्ती से लागू किया जाना जरूरी है, तभी हिंदी का महत्व बढ़ेगा। उन्होंने हिंदी में रक्तदान जीवनदान नामक पुस्तक लिखी और दिल्ली सफदरजंग हॉस्पिटल में हिंदी की प्रतियोगिताएं जीतीं।
मातृभाषा हिंदी से अनूठा लगाव रखते हैं डॉ. मलिक
जनपद के बधाई कलां निवासी डॉ. केपीएस मलिक सफदरजंग हॉस्पिटल से नेत्र विभागाध्यक्ष एवं केंद्र सरकार के स्वास्थ्य विभाग से एडिशनल डायरेक्टर के पद से रिटायर हुए हैं। हिंदी भाषा को बढ़ावा देने के लिए उन्होंने सार्थक प्रयास किए। उन्होंने सभी फाइलों पर टिप्पणी हिंदी में लिखना शुरू कराया था। दिल्ली हॉस्पिटल में हर वर्ष हिंदी प्रतियोगिता में वह हिंदी में प्रतियोगिता जीतते थे। मेडिकल कॉलेज रोहतक में असिस्टेंट प्रोफेसर पद पर रहते हुए वहां 19 बार रक्तदान करने के बाद उन्होंने ‘रक्तदान जीवन दान’ किताब हिंदी में लिखी, जो मेडिकल संस्थानों में सराही गई। दिल्ली हॉस्पिटल में मरीजों के पर्चें में हिंदी में भी दवाएं और हिदायतें लिखने का सफलतापूर्वक कार्य किया।
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साहित्य सृजन से दे रहीं हिंदी को बढ़ावा
मुजफ्फरनगर। जैन कन्या पाठशाला पीजी कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. सविता वशिष्ठ का संस्कृत के अलावा हिंदी से अनूठा लगाव है। कहती हैं कि हिंदी हमारी पहचान, है, देश की शान है। दुनिया की सब भाषाओं की मां कहूं, तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। उन्होंने अनेक शोध पत्रों को हिंदी में प्रकाशित कराया। पुराण साहित्य का आविर्भाव और श्रीमद्भागवत महापुराण साहित्यों का सृजन कर समाज को नई दिशा दी। योग के स्वरूप और उसके भेद नाम पुस्तक काफी प्रचलित रही। हिंदी हमारे संस्कारों और संस्कृति की संवाहक, संप्रेषक और परिचायक है। अत्यंत सरल, सहज और सुगम भाषा होने के कारण हिंदी विश्व की वैज्ञानिक भाषा है।

डा.सविता वशिष्ठ असिस्टेंट प्रोफेसर- फोटो : MUZAFFARNAGAR
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