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भगवान परशुराम ने शुरू की जल लाने की परंपरा
अमर उजाला ब्यूरो/ मुजफ्फरनगर
Updated Sat, 30 Jul 2016 12:51 AM IST
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हरिद्वार से कांवड़ लेकर आते छोटे बच्चे।
- फोटो : अमर उजाला
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हरिद्वार से पवित्र गंगा जल लेकर कांवड़ियों की यात्रा आस्था और श्रद्धा का संगम है। श्रावण मास में हरिद्वार से लेकर जयपुर तक शिव भक्तों की कांवड़ यात्रा विराट कुंभ मेले के समान ही अविरल हो गई है, जिसमें भक्ति की गंगा बहती है। कांवड़ यात्रा एक विराट धार्मिक आयोजन बन गई है। मान्यता है कि कांवड़ की परंपरा भगवान परशुराम ने शुरू की थी
हर साल श्रावण मास में लाखों की तादाद में कांवड़िए सुदूर स्थानों से आकर हरिद्वार से पवित्र गंगा जल से भरी कांवड़ लेकर पद यात्रा कर गंतव्य को लौटते हैं, जो श्रावण की चतुर्दशी के दिन इस गंगा जल से शिवालयों में भगवान आशुतोष का अभिषेक करते हैं। इस बार भी लाखों शिवभक्त कांवड़ लेकर आए। जिनमें जयपुर तक के कांवड़िए भी शामिल रहे। जो हरिद्वार से करीब 500 किलोमीटर की यात्रा कर अपने आराध्य देव शिव का जलाभिषेक करेंगे।
हरिद्वार से लेकर जयपुर तक अनवरत भक्ति की यह धारा विराट कुंभ मेला बन गई है। कहने को तो कांवड़ यात्रा धार्मिक आयोजन भर है, लेकिन इसके सामाजिक सरोकार भी है। कांवड़ के माध्यम से जल की यात्रा का यह पर्व शिव की आराधना के लिए है। पंडित बाल कृष्ण सैमवाल के अनुसार कांवड़ का वेद और पुराणों में कोई जिक्र नहीं है।
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मान्यता है कि कांवड़ की परंपरा भगवान परशुराम ने शुरू की थी। भगवान परशुराम ने अपने आराध्य देव भगवान शिव की नियमित पूजा करने के लिए हरिद्वार से शिव लिंग लाकर पुरा महादेव में स्थापित किया। भगवान परशुराम श्रावण माह में प्रत्येक सोमवार को कांवड़ में गंगाजल लाकर शिव की पूजा अर्चना करते थे। तभी से कांवड़ की परंपरा शुरू हुई। यह भी मान्यता है कि पितृभक्त श्रवण कुमार को पहली कांवड़ लाने का श्रेय है।
हर साल श्रावण मास में दस दिनों से चलनी वाली कांवड़ यात्रा अब एक पर्व बन गया है। कांवड़ यात्रा में बस भगवान शिव की भक्ति की धारा बहती है। कांवड़ यात्रा में न तो नाम, न ही जाति और न ही ऊंच-नीच का भेदभाव होता है, कांवड़ लाने वाले केवल भोला होता है। प्रशासन भी इस धार्मिक आयोजन को पर्व के समान सम्पन्न कराने में शांति और कानून व्यवस्था के पुख्ता इंतजाम करता है।
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हर साल श्रावण मास में लाखों की तादाद में कांवड़िए सुदूर स्थानों से आकर हरिद्वार से पवित्र गंगा जल से भरी कांवड़ लेकर पद यात्रा कर गंतव्य को लौटते हैं, जो श्रावण की चतुर्दशी के दिन इस गंगा जल से शिवालयों में भगवान आशुतोष का अभिषेक करते हैं। इस बार भी लाखों शिवभक्त कांवड़ लेकर आए। जिनमें जयपुर तक के कांवड़िए भी शामिल रहे। जो हरिद्वार से करीब 500 किलोमीटर की यात्रा कर अपने आराध्य देव शिव का जलाभिषेक करेंगे।
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हरिद्वार से लेकर जयपुर तक अनवरत भक्ति की यह धारा विराट कुंभ मेला बन गई है। कहने को तो कांवड़ यात्रा धार्मिक आयोजन भर है, लेकिन इसके सामाजिक सरोकार भी है। कांवड़ के माध्यम से जल की यात्रा का यह पर्व शिव की आराधना के लिए है। पंडित बाल कृष्ण सैमवाल के अनुसार कांवड़ का वेद और पुराणों में कोई जिक्र नहीं है।
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मान्यता है कि कांवड़ की परंपरा भगवान परशुराम ने शुरू की थी। भगवान परशुराम ने अपने आराध्य देव भगवान शिव की नियमित पूजा करने के लिए हरिद्वार से शिव लिंग लाकर पुरा महादेव में स्थापित किया। भगवान परशुराम श्रावण माह में प्रत्येक सोमवार को कांवड़ में गंगाजल लाकर शिव की पूजा अर्चना करते थे। तभी से कांवड़ की परंपरा शुरू हुई। यह भी मान्यता है कि पितृभक्त श्रवण कुमार को पहली कांवड़ लाने का श्रेय है।
हर साल श्रावण मास में दस दिनों से चलनी वाली कांवड़ यात्रा अब एक पर्व बन गया है। कांवड़ यात्रा में बस भगवान शिव की भक्ति की धारा बहती है। कांवड़ यात्रा में न तो नाम, न ही जाति और न ही ऊंच-नीच का भेदभाव होता है, कांवड़ लाने वाले केवल भोला होता है। प्रशासन भी इस धार्मिक आयोजन को पर्व के समान सम्पन्न कराने में शांति और कानून व्यवस्था के पुख्ता इंतजाम करता है।