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कुंवर बेचैन ने गीत की खनक और गजल की चमक को बरकरार रखा: देवबंदी
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देवबंद। उत्तर प्रदेश उर्दू अकादमी के पूर्व चेयरमैन व शायर डॉ. नवाज देवबंदी ने सुप्रसिद्ध गीत व गजलकार डॉ. कुंवर बेचैन के निधन पर गहरे दुख का इजहार किया है। देवबंदी ने कहा कि कुंवर बेचैन एक कवि और एक शायर का ही नाम नहीं बल्कि गीत और ग़जल की उज्ज्वल परंपरा के भरे पूरे अध्याय का नाम है।
प्रसिद्ध शायर डॉ. नवाज देवबंदी ने कुंवर बेचैन के साथ गुजारे समय को याद करते हुए कहा कि अकसर देखा गया है कि अगर कोई शायर या कवि दो विधाओं में एक साथ लिखता है तो किसी का गीत कमजोर हो जाता है या ग़जल, लेकिन कुंवर बेचैन का कमाल यह था कि उन्होंने गीत की खनक और गजल की चमक के माथे पर कामयाबी का झूमर एक साथ टांगा है। उन्होंने कहा कि वह दोनों विधाओं के कामयाब और जिम्मेदार रचनाकार थे। मंच हो या किताब कुंवर बेेचैन के गीत और गजलें एक साथ जिंदगी की आंखों में आंखें डालकर बातें करते थे। उनके गीतों के शीर्षक, विषय और शब्दावली अपनी अलग पहचान रखते हैं। मंच पर साथ गुजारे समय को याद कर डॉ. नवाज कहते हैं कि कुंवर बेचैन अपने सभ्य और मधुर तरन्नुम में डूब कर गीत पढ़ते थे, तो ऐसा लगता था कि जैसे नदी बेचैन लहरों को लोरियां सुना रही हो। उन्होंने जो गीत लिखे हैं वह सदियों तक गुनगुनाए जाएंगे। उन्होंने कहा कि कुंवर बेचैन ने जब गजल की नब्ज पर हाथ रखा तो उसकी धड़कने ही नहीं गिनीं बल्कि गजल की अंतर आत्मा की बेचैनी को भी महसूस किया। उनकी गजलें जिंदगी का आइना हैं। नवाज देवबंदी ने कहा कि आज के युग में ऐसे लोग बहुत कम हैं। यह गीत गजल का ही नुकसान नहीं, बल्कि मेरा व्यक्तिगत नुकसान भी है। कुंवर बेचैन के गीत, उनकी गजल और उनकी शराफत हमेशा याद की जाती रहेगी।
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प्रसिद्ध शायर डॉ. नवाज देवबंदी ने कुंवर बेचैन के साथ गुजारे समय को याद करते हुए कहा कि अकसर देखा गया है कि अगर कोई शायर या कवि दो विधाओं में एक साथ लिखता है तो किसी का गीत कमजोर हो जाता है या ग़जल, लेकिन कुंवर बेचैन का कमाल यह था कि उन्होंने गीत की खनक और गजल की चमक के माथे पर कामयाबी का झूमर एक साथ टांगा है। उन्होंने कहा कि वह दोनों विधाओं के कामयाब और जिम्मेदार रचनाकार थे। मंच हो या किताब कुंवर बेेचैन के गीत और गजलें एक साथ जिंदगी की आंखों में आंखें डालकर बातें करते थे। उनके गीतों के शीर्षक, विषय और शब्दावली अपनी अलग पहचान रखते हैं। मंच पर साथ गुजारे समय को याद कर डॉ. नवाज कहते हैं कि कुंवर बेचैन अपने सभ्य और मधुर तरन्नुम में डूब कर गीत पढ़ते थे, तो ऐसा लगता था कि जैसे नदी बेचैन लहरों को लोरियां सुना रही हो। उन्होंने जो गीत लिखे हैं वह सदियों तक गुनगुनाए जाएंगे। उन्होंने कहा कि कुंवर बेचैन ने जब गजल की नब्ज पर हाथ रखा तो उसकी धड़कने ही नहीं गिनीं बल्कि गजल की अंतर आत्मा की बेचैनी को भी महसूस किया। उनकी गजलें जिंदगी का आइना हैं। नवाज देवबंदी ने कहा कि आज के युग में ऐसे लोग बहुत कम हैं। यह गीत गजल का ही नुकसान नहीं, बल्कि मेरा व्यक्तिगत नुकसान भी है। कुंवर बेचैन के गीत, उनकी गजल और उनकी शराफत हमेशा याद की जाती रहेगी।
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