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Muzaffarnagar News: आग की लपटों में घिरी अबला का जीवन खो देना त्रासदी, धाराओं और साक्ष्य की भाषा में पीड़ा व्यक्त करना कठिन

Tue, 08 Sep 2026 01:04 AM IST
Meerut Bureau मेरठ ब्यूरो
Updated Tue, 08 Sep 2026 01:04 AM IST
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It is a tragedy for a helpless woman to lose her life amidst the flames; it is difficult to articulate the anguish within the language of legal sections and evidence.
बागपत के निवाड़ा में शहजादी के पिता दिलशाद, मां मुना और बेटा शादान : संवाद
मुजफ्फरनगर। अपर जिला एवं सत्र न्यायालय/फास्ट ट्रैक कोर्ट संख्या-3 के पीठासीन अधिकारी रवि कुमार दिवाकर ने लिखा कि कुछ अपराध ऐसे होते हैं, जिनकी गंभीरता को केवल कानूनी धाराओं और साक्ष्य की भाषा में पूरी तरह व्यक्त करना कठिन होता है। जीवित अबला महिला का आग की लपटों में घिरना, सहायता के लिए संघर्ष करना और अंतत जीवन खो देना ऐसी मानवीय त्रासदी है जो अपराध के परिणाम से कहीं अधिक व्यापक पीड़ा को दर्शाती है।
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अदालत ने 77 पेज के फैसले में लिखा कि जनता से पूछना चाहते हैं कि यह आग कब बुझेगी। कब तक अबला महिलाओं को जलाकर मारा जाता रहेगा और पूरा सिस्टम सिर्फ वादकारी का हित सर्वोपरि में सिर्फ अभियुक्त का ही हित और अधिकार देखेगा। स्वयं को बचाने की असहायता इस अपराध को साधारण हत्या से कहीं अधिक जघन्य बनाती है।
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यह कृत्य न केवल पीड़िता के जीवन और गरिमा पर आघात है, बल्कि वैवाहिक विश्वास एवं उस सामाजिक संस्था के प्रति भी गंभीर आघात है, जिसमें पति-पत्नी एक-दूसरे की सुरक्षा और सहारे के लिए अपेक्षित होते हैं। पीड़िता की असहाय स्थिति और समाज पर उसके प्रभाव को समग्रता में देखते हुए यह न्यायालय इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि यह मामला अति-दुर्लभतम में दुर्लभ श्रेणी में आता है।
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हत्या का यह तरीका अत्यंत निर्मम एवं पाश्विक है। यदि दंड देते समय ऐसे सिद्धदोष के प्रति सहानुभूति दर्शित की जाएगी तो यह भविष्य में इस बात की मिसाल बन जाएगा कि कोई भी विवाहित पति अपनी पत्नी को जिन्दा जलाकर मार दे और न्यायालय उसके साथ सहानुभूति प्रदर्शित करे। इसलिए प्रश्नगत प्रकरण में सिद्धदोष नदीम को मृत्युदंड दिया जाना ही एकमात्र विकल्प है।
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निकाह सुन्नत...माना गया है पवित्र कार्य
मुस्लिम समाज में निकाह नामक संस्था का बड़ा महत्व है। हजरत मोहम्मद साहब का कथन है कि निकाह मेरी सुन्नत है। जो लोग जीवन के इस ढंग को नहीं अपनाते हैं वह मेरे अनुयायी नहीं हैं। निकाह को पुण्य कार्य माना गया है। मुस्लिम विधि की प्रसिद्ध पुस्तक रघुल मोहतार में यह कहा गया है कि बाबा आदम के समय से आज तक हम लोगों के लिए रखा गया और जन्नत में भी होने वाला कोई ऐसा इबादत का कार्य नहीं है, सिवाय निकाह और इमान के।

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बाबा आदम से लेकर लिखी लैला-मंजनू और शीरी-फरहाद की दास्तां
मुजफ्फरनगर। अदालत ने फैसले में खुदा की ओर से बाबा आदम को बनाने और अजाजील की कहानी भी लिखी। उदास बाबा आदम की बाईं पसली से नारी के जन्म को बयान किया, जिसका नाम हव्वा रखा गया। गेहूं का दाना खाने के कारण आदम-हव्वा को खुदा ने पृथ्वी पर भेज दिया। दोनों पति-पत्नी एक-दूसरे से प्यार करते थे। मुसीबत सहते हुए धरती पर रहे। इस्लामी मान्यता के अनुसार जो व्यक्ति अपनी पत्नी की हत्या करेगा वह दोजख में भेजा जाएगा। पति-पत्नी का संबंध प्यार-मोहब्बत पर आधारित होता है। लैला-मंजनू और शीरी-फरहाद के प्यार-मोहब्बत के किस्सों का उल्लेख किया जाना आवश्यक है। प्रेम संबंधों के संबंध में यह बताते हैं कि प्रेम अर्थात् मोहब्बत में किसी की जान ली नहीं जाती है, ऐसा होता है प्रेम का संबंध अथवा पति-पत्नी का संबंध। ब्यूरो
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