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दंगे के लापता मिले नहीं, बांट दिया 15-15 लाख का मुआवजा
अमर उजाला/ब्यूरो, मुजफ्फरनगर
Updated Fri, 07 Sep 2018 12:25 AM IST
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दंगे के दौरान शिवचौक पर तैनात पुलिस।
- फोटो : अमर उजाला
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तत्कालीन अखिलेश सरकार ने दंगे में मुजफ्फरनगर और शामली के लापता 20 लोगों में सेे 15 के परिवारों को सिर्फ शपथ पत्र लेकर 15-15 लाख रुपयेे का मुआवजा दे दिया। यह लापता लोग आज तक नहीं मिल पाए हैं। न ही सरकार ने उन्हें मृत घोषित किया है। ऐसे में कानूनी प्रक्रिया नहीं अपनाए जाने की वजह से इन पीड़ित परिवारों को नौकरी का लाभ नहीं मिल पाया है। शामली के लिसाढ़ गांव के 11 लोगों की हत्या का मुकदमा फुगाना थाने में दर्ज किया गया था, जबकि नौ लापता की मुजफ्फरनगर के थानों में गुमशुदगी दर्ज है।
सात सितंबर, 2013 को भड़की हिंसा में 65 से ज्यादा बेगुनाहों की मौत हो गई थी। दंगे के दौरान 20 नागरिक लापता हो गए। बीते पांच साल में एसआईटी और पुलिस प्रशासन उन्हें तलाश नहीं पाया। लापता लोगों में शामली जिले के लिसाढ़ गांव के 11 तथा मुजफ्फरनगर जिले के नौ लोग शामिल है। पुलिस न उनकी लाशें बरामद कर पाई और न ही उन्हें जिंदा खोज सकी। जब हो हल्ला मचा तो एसआईटी ने फुगाना थाने में लिसाढ़ के लापता 11 लोगों की हत्या का मुकदमा दर्ज करा दिया, जबकि मुजफ्फरनगर के विभिन्न थानों में नौ लापता लोगों की गुमशुदगी लिखा दी गई।
दंगे के बाद डेमेज कंट्रोल के लिए तत्कालीन सपा सरकार ने हिंसा में मारे गए मृतकों के परिवारों को 15-15 लाख रुपये तथा समूह ग में नौकरी दी। मृतक और पीड़ित परिवारों को कुल 94 करोड़ रुपये मुआवजा दिया गया। लापता लोगों के परिजनों ने आवाज उठाई तो प्रशासन ने हाथ खड़े कर दिए। शव नहीं मिलने पर पुलिस प्रशासन समझ चुका था कि लापता लोगों की हिंसा की भेंट चढ़ चुके हैं, मगर शव नहीं मिलने पर कैसे मृतक माना जाए। गुमशुदगी में मुकदमा दर्ज होने पर सात साल बाद ही लापता को मृतक माना जाता है।
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लापता के पीड़ित परिवारों को कोई राह नहीं सूझी तो उन्होंने दिसंबर 2016 में तत्कालीन सीएम अखिलेश यादव से लखनऊ में मुलाकात की। नौकरी और मुआवजे की उनकी मांग पर सीएम ने शपथ पत्र लेकर दोनो जिलों के डीएम को 15-15 लाख रुपये लापता लोगों के परिवारों को देने का आदेश दे दिया। बीस लापता लोगों में से केवल 15 पीड़ितों को यह मुआवजा मिला है, जबकि पांच परिवारों को कोई राशि नहीं मिली।
जिन 15 पीड़ितों को यह रकम दी गई वो सब एक ही समुदाय के हैं। लिसाढ़ गांव के 11 तथा मुजफ्फरनगर के चार परिवारों को यह मुआवजा दे दिया गया। शपथ पत्र में पीड़ित परिवारों से यह स्पष्ट लिखवाया गया है कि यदि लापता में से कोई लौट आता है तो 15 लाख रुपये का मुआवजा लौटाना होगा। सरकार ने सात साल की गुमशुदगी की प्रक्रिया अपनाए बिना मुआवजा तो दे दिया, लेकिन लापता के आश्रितों को नौकरी नहीं दे पाई। सरकार ने अभी तक दंगे में लापता हुए बीस लोगों को मृत घोषित नहीं किया है।
नौकरी नहीं मिली तो चले गए कोर्ट
मुजफ्फरनगर। सदर तहसील के न्याजूपुरा का आसिफ पुत्र मौहम्मद हयात दंगे में लापता हो गया था। उसके भाई अयाज के मुताबिक 15 लाख का मुआवजा मिल गया। नौकरी नहीं मिली तो उन्होंने एसीजेएम प्रथम के यहां वाद दायर कर दिया है, जिस तरह दंगे में मृतक के परिवारों को नौकरी दी गई, उसी तरह लापता लोगों के आश्रितों को भी सरकारी नौकरी मिले। अयाज ने कहा कि भाई आसिफ दंगे के दिन जानसठ रोड स्थित फैक्ट्री से आ रहा था, लेकिन घर नहीं पहुंचा। उसके गम में पहले मॉ हसीबा खातून चल बसी। गत माह पिता मौहम्मद हयात का भी इंतकाल हो गया।
लिसाढ़ के 11 लापता के परिजनों को मिली मदद
मुजफ्फरनगर। शामली के लिसाढ़ गांव के जिन 11 लापता लोगों के परिवारों को तत्कालीन सपा सरकार ने 15-15 लाख का मुआवजा दिया है, उनमें अजमूदीन और उसकी पत्नी हलीमन, वकील पत्नी यामीन, करमूदीन पुत्र कमालूदीन, सिराजुदीन पुत्र इददू, हमीदन पत्नी सिराजुदीन, उमरदीन पुत्र सददीक, हकीमुददीन पुत्र बंदा, उसकी मां छोटी, हाजी नब्बू पुत्र नकली तथा नसीरुददीन पुत्र करीमुददीन शामिल हैं। इनकी हत्या का मुकदमा फुगाना थाने में दर्ज है।
जिले में पांच को मिला मुआवजा
मुजफ्फरनगर। दंगे में लापता हुए जिले के नौ लोगों में केवल पांच को शपथ पत्र लेकर प्रति परिवार 15 लाख का मुआवजा दिया गया है। प्रशासन के रिकार्ड के मुताबिक न्याजूपुरा के आसिफ पुत्र हयात, जानसठ के काटका गांव के नजीर पुत्र नसीर, बिलासपुर गांव निवासी शौकीन पुत्र लाशीम तथा भोपा के गांव किशनपुर निवासी निसार पुत्र हसन अली लापता हैं, जिन्हें मुआवजा दे दिया गया है।
मुआवजे से वंचित पांच लापता के आश्रित
मुजफ्फरनगर। लापता लोगों के इन परिवारों ने पैरवी नहीं की या प्रशासन ने लापरवाही बरती। मुआवजे से वंचित पीड़ितों में खालापार के किदवई नगर निवासी आसिमा पत्नी इसराइल, भौराकलां थाने के गंाव हड़ौली निवासी जुम्मा पुत्र दीन मोहम्मद, शाहपुर के गांव शौरा निवासी गुलफाम पुत्र मेहरदीन, गांव सिम्भालका निवासी अब्दुल हमीद पुत्र मकबूल, चांदपुर गांव के चंद्रपाल शर्मा शामिल हैं।
पांच साल बाद भी सदमे से नहीं उबर पाए अपनों को खो चुके लोग
शाहपुर। पांच साल पूर्व सात सितंबर 2013 को हुए सांप्रदायिक दंगे में अपने परिजनों को खो चुके लोग अब तक सदमे से नहीं उबर सके हैं। दंगे की यादें आज भी इतनी कष्टकारी व असहनीय हैं कि वो लम्हें याद कर आज भी पीड़ितों के रौंगटे खड़े हो जाते हैं। नंगला मंदौड़ की पंचायत से लौटते समय पुरबालियान में हुए हमले में गांव काकड़ा के तीन व सोरम के एक व्यक्ति की मौत हुई थी, वहीं गांव कुटबा के आठ लोगों ने भी हिंसा में जान गंवाई थी।
पांच वर्ष पहले सात सितंबर 2013 को नंगला मंदौड़ में आयोजित पंचायत में जाते क्षेत्र के लोगों पर गांव बसीकलां में हमला कर दिया गया था। पंचायत खत्म होने के बाद घरों को लौट रहे लोगों पर गांव पुरबालियान में हजारों लोगों की भीड़ ने धारदार हथियारों से हमला कर दिया था, जिसमें गांव काकड़ा निवासी विकास, महेंद्र व राजवीर के साथ ही सोरम निवासी विपिन की मौत हो गई थी। इस हमले के बाद गांव काकड़ा के साथ ही गांव कुटबा व कुटबी में भी हिंसा भड़क उठी थी।
इसमें गांव कुटबा में ही आठ महिला व पुरुषों की मौत हुई। इसके बाद इन गांवों से बड़े पैमाने पर पलायन हुआ। कुटबा में मारे गए लोगों में से एक का परिवार मोहल्ला कस्सावान की नई बस्ती व दूसरा परिवार गांव पलड़ी स्थित अहमदनगर कॉलोनी में रह रहा है। वहीं, एक परिवार बुढ़ाना, तीन परिवार कांधला और एक परिवार कैराना में रह रहा है।
गांव पलड़ा स्थित अहमदनगर कॉलोनी में रह रहे दंगा पीड़ित कदमूद्दीन ने बताया कि दंगे में उन्होंने पत्नी खातून को खो दिया था, जिसके बाद उन्होंने गांव छोड़ दिया। इसके बाद से आज तक परिवार की आर्थिक हालत बेहद खराब है। पांच वर्ष बीत जाने के बाद भी उन्हें अभी तक न्याय नहीं मिला है। मोहल्ला कस्सावान स्थित नई बस्ती में रह रही दंगा पीड़िता गांव कुटबा निवासी संजीदा ने बताया कि दंगे में उसके पति तराबुद्दीन की मौत हुई थी।
पति की मौत के बाद वह यहां आकर रहने लगी, जिसके बाद से उसके बेटे मजदूरी कर परिवार की गुजर-बसर कर रहे हैं। तब से आज तक पूरा परिवार इस सदमे से उबर नहीं पाया है। पुरबालियान में भीड़ के हमले में 21 साल के बेटे विकास को खोने वाले गांव काकड़ा के जवाहर सिंह ने रूंधे गले से बताया कि वे भी बेटे के साथ पंचायत से लौट रहे थे।
हमले में विकास समेत कई लोग गंभीर रूप से घायल हुए। विकास को नाजुक हालत में मेरठ के अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां उसकी मौत हो गई थी। विकास की मां सुरेश देवी रोते हुए कहती है कि वे अपने पुत्र को याद कर जीवन काट रहे हैं। पुरबालियान हमले में मारे गए इसी गांव निवासी महेंद्र व राजवीर के परिवार भी आज तक इस सदमे से उबर नहीं पाए हैं।
पांच साल बाद भी नहीं मिली सरकारी सुविधाएं
शाहपुर। दंगा पीड़ित संघर्ष समिति के अध्यक्ष मोहम्मद सलीम का कहना है कि दंगे के पांच साल बाद भी जिन लोगों ने गांव से पलायन कर कस्बे में शरण ली थी, उन्हें सरकारी सुविधाएं मुहैया नहीं हैं। कस्बे में स्थित दंगा पीड़ितों की बस्ती फिदाई-ए-मिल्लत कॉलोनी निवासी ताजुद्दीन, उस्मान, जमील व इलियास का कहना है कि उन्होंने विद्युत विभाग से कनेक्शन तो लिए हैं, लेकिन बस्ती में खंभे न होने के कारण उन्हें करीब तीन सौ मीटर दूर से केबल डालने पड़ रहे हैं।
पीने के पानी की भी कोई व्यवस्था नहीं है। वहीं, गांव पलड़ी स्थित दंगा पीड़ितों की बस्ती में रह रहे लोगों का कहना है कि कुछ लोगों को अब तक मुआवजा नहीं मिला है। बस्ती में सड़क भी नहीं है, जिससे लोगों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।
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सात सितंबर, 2013 को भड़की हिंसा में 65 से ज्यादा बेगुनाहों की मौत हो गई थी। दंगे के दौरान 20 नागरिक लापता हो गए। बीते पांच साल में एसआईटी और पुलिस प्रशासन उन्हें तलाश नहीं पाया। लापता लोगों में शामली जिले के लिसाढ़ गांव के 11 तथा मुजफ्फरनगर जिले के नौ लोग शामिल है। पुलिस न उनकी लाशें बरामद कर पाई और न ही उन्हें जिंदा खोज सकी। जब हो हल्ला मचा तो एसआईटी ने फुगाना थाने में लिसाढ़ के लापता 11 लोगों की हत्या का मुकदमा दर्ज करा दिया, जबकि मुजफ्फरनगर के विभिन्न थानों में नौ लापता लोगों की गुमशुदगी लिखा दी गई।
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दंगे के बाद डेमेज कंट्रोल के लिए तत्कालीन सपा सरकार ने हिंसा में मारे गए मृतकों के परिवारों को 15-15 लाख रुपये तथा समूह ग में नौकरी दी। मृतक और पीड़ित परिवारों को कुल 94 करोड़ रुपये मुआवजा दिया गया। लापता लोगों के परिजनों ने आवाज उठाई तो प्रशासन ने हाथ खड़े कर दिए। शव नहीं मिलने पर पुलिस प्रशासन समझ चुका था कि लापता लोगों की हिंसा की भेंट चढ़ चुके हैं, मगर शव नहीं मिलने पर कैसे मृतक माना जाए। गुमशुदगी में मुकदमा दर्ज होने पर सात साल बाद ही लापता को मृतक माना जाता है।
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लापता के पीड़ित परिवारों को कोई राह नहीं सूझी तो उन्होंने दिसंबर 2016 में तत्कालीन सीएम अखिलेश यादव से लखनऊ में मुलाकात की। नौकरी और मुआवजे की उनकी मांग पर सीएम ने शपथ पत्र लेकर दोनो जिलों के डीएम को 15-15 लाख रुपये लापता लोगों के परिवारों को देने का आदेश दे दिया। बीस लापता लोगों में से केवल 15 पीड़ितों को यह मुआवजा मिला है, जबकि पांच परिवारों को कोई राशि नहीं मिली।
जिन 15 पीड़ितों को यह रकम दी गई वो सब एक ही समुदाय के हैं। लिसाढ़ गांव के 11 तथा मुजफ्फरनगर के चार परिवारों को यह मुआवजा दे दिया गया। शपथ पत्र में पीड़ित परिवारों से यह स्पष्ट लिखवाया गया है कि यदि लापता में से कोई लौट आता है तो 15 लाख रुपये का मुआवजा लौटाना होगा। सरकार ने सात साल की गुमशुदगी की प्रक्रिया अपनाए बिना मुआवजा तो दे दिया, लेकिन लापता के आश्रितों को नौकरी नहीं दे पाई। सरकार ने अभी तक दंगे में लापता हुए बीस लोगों को मृत घोषित नहीं किया है।
नौकरी नहीं मिली तो चले गए कोर्ट
मुजफ्फरनगर। सदर तहसील के न्याजूपुरा का आसिफ पुत्र मौहम्मद हयात दंगे में लापता हो गया था। उसके भाई अयाज के मुताबिक 15 लाख का मुआवजा मिल गया। नौकरी नहीं मिली तो उन्होंने एसीजेएम प्रथम के यहां वाद दायर कर दिया है, जिस तरह दंगे में मृतक के परिवारों को नौकरी दी गई, उसी तरह लापता लोगों के आश्रितों को भी सरकारी नौकरी मिले। अयाज ने कहा कि भाई आसिफ दंगे के दिन जानसठ रोड स्थित फैक्ट्री से आ रहा था, लेकिन घर नहीं पहुंचा। उसके गम में पहले मॉ हसीबा खातून चल बसी। गत माह पिता मौहम्मद हयात का भी इंतकाल हो गया।
लिसाढ़ के 11 लापता के परिजनों को मिली मदद
मुजफ्फरनगर। शामली के लिसाढ़ गांव के जिन 11 लापता लोगों के परिवारों को तत्कालीन सपा सरकार ने 15-15 लाख का मुआवजा दिया है, उनमें अजमूदीन और उसकी पत्नी हलीमन, वकील पत्नी यामीन, करमूदीन पुत्र कमालूदीन, सिराजुदीन पुत्र इददू, हमीदन पत्नी सिराजुदीन, उमरदीन पुत्र सददीक, हकीमुददीन पुत्र बंदा, उसकी मां छोटी, हाजी नब्बू पुत्र नकली तथा नसीरुददीन पुत्र करीमुददीन शामिल हैं। इनकी हत्या का मुकदमा फुगाना थाने में दर्ज है।
जिले में पांच को मिला मुआवजा
मुजफ्फरनगर। दंगे में लापता हुए जिले के नौ लोगों में केवल पांच को शपथ पत्र लेकर प्रति परिवार 15 लाख का मुआवजा दिया गया है। प्रशासन के रिकार्ड के मुताबिक न्याजूपुरा के आसिफ पुत्र हयात, जानसठ के काटका गांव के नजीर पुत्र नसीर, बिलासपुर गांव निवासी शौकीन पुत्र लाशीम तथा भोपा के गांव किशनपुर निवासी निसार पुत्र हसन अली लापता हैं, जिन्हें मुआवजा दे दिया गया है।
मुआवजे से वंचित पांच लापता के आश्रित
मुजफ्फरनगर। लापता लोगों के इन परिवारों ने पैरवी नहीं की या प्रशासन ने लापरवाही बरती। मुआवजे से वंचित पीड़ितों में खालापार के किदवई नगर निवासी आसिमा पत्नी इसराइल, भौराकलां थाने के गंाव हड़ौली निवासी जुम्मा पुत्र दीन मोहम्मद, शाहपुर के गांव शौरा निवासी गुलफाम पुत्र मेहरदीन, गांव सिम्भालका निवासी अब्दुल हमीद पुत्र मकबूल, चांदपुर गांव के चंद्रपाल शर्मा शामिल हैं।
पांच साल बाद भी सदमे से नहीं उबर पाए अपनों को खो चुके लोग
शाहपुर। पांच साल पूर्व सात सितंबर 2013 को हुए सांप्रदायिक दंगे में अपने परिजनों को खो चुके लोग अब तक सदमे से नहीं उबर सके हैं। दंगे की यादें आज भी इतनी कष्टकारी व असहनीय हैं कि वो लम्हें याद कर आज भी पीड़ितों के रौंगटे खड़े हो जाते हैं। नंगला मंदौड़ की पंचायत से लौटते समय पुरबालियान में हुए हमले में गांव काकड़ा के तीन व सोरम के एक व्यक्ति की मौत हुई थी, वहीं गांव कुटबा के आठ लोगों ने भी हिंसा में जान गंवाई थी।
पांच वर्ष पहले सात सितंबर 2013 को नंगला मंदौड़ में आयोजित पंचायत में जाते क्षेत्र के लोगों पर गांव बसीकलां में हमला कर दिया गया था। पंचायत खत्म होने के बाद घरों को लौट रहे लोगों पर गांव पुरबालियान में हजारों लोगों की भीड़ ने धारदार हथियारों से हमला कर दिया था, जिसमें गांव काकड़ा निवासी विकास, महेंद्र व राजवीर के साथ ही सोरम निवासी विपिन की मौत हो गई थी। इस हमले के बाद गांव काकड़ा के साथ ही गांव कुटबा व कुटबी में भी हिंसा भड़क उठी थी।
इसमें गांव कुटबा में ही आठ महिला व पुरुषों की मौत हुई। इसके बाद इन गांवों से बड़े पैमाने पर पलायन हुआ। कुटबा में मारे गए लोगों में से एक का परिवार मोहल्ला कस्सावान की नई बस्ती व दूसरा परिवार गांव पलड़ी स्थित अहमदनगर कॉलोनी में रह रहा है। वहीं, एक परिवार बुढ़ाना, तीन परिवार कांधला और एक परिवार कैराना में रह रहा है।
गांव पलड़ा स्थित अहमदनगर कॉलोनी में रह रहे दंगा पीड़ित कदमूद्दीन ने बताया कि दंगे में उन्होंने पत्नी खातून को खो दिया था, जिसके बाद उन्होंने गांव छोड़ दिया। इसके बाद से आज तक परिवार की आर्थिक हालत बेहद खराब है। पांच वर्ष बीत जाने के बाद भी उन्हें अभी तक न्याय नहीं मिला है। मोहल्ला कस्सावान स्थित नई बस्ती में रह रही दंगा पीड़िता गांव कुटबा निवासी संजीदा ने बताया कि दंगे में उसके पति तराबुद्दीन की मौत हुई थी।
पति की मौत के बाद वह यहां आकर रहने लगी, जिसके बाद से उसके बेटे मजदूरी कर परिवार की गुजर-बसर कर रहे हैं। तब से आज तक पूरा परिवार इस सदमे से उबर नहीं पाया है। पुरबालियान में भीड़ के हमले में 21 साल के बेटे विकास को खोने वाले गांव काकड़ा के जवाहर सिंह ने रूंधे गले से बताया कि वे भी बेटे के साथ पंचायत से लौट रहे थे।
हमले में विकास समेत कई लोग गंभीर रूप से घायल हुए। विकास को नाजुक हालत में मेरठ के अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां उसकी मौत हो गई थी। विकास की मां सुरेश देवी रोते हुए कहती है कि वे अपने पुत्र को याद कर जीवन काट रहे हैं। पुरबालियान हमले में मारे गए इसी गांव निवासी महेंद्र व राजवीर के परिवार भी आज तक इस सदमे से उबर नहीं पाए हैं।
पांच साल बाद भी नहीं मिली सरकारी सुविधाएं
शाहपुर। दंगा पीड़ित संघर्ष समिति के अध्यक्ष मोहम्मद सलीम का कहना है कि दंगे के पांच साल बाद भी जिन लोगों ने गांव से पलायन कर कस्बे में शरण ली थी, उन्हें सरकारी सुविधाएं मुहैया नहीं हैं। कस्बे में स्थित दंगा पीड़ितों की बस्ती फिदाई-ए-मिल्लत कॉलोनी निवासी ताजुद्दीन, उस्मान, जमील व इलियास का कहना है कि उन्होंने विद्युत विभाग से कनेक्शन तो लिए हैं, लेकिन बस्ती में खंभे न होने के कारण उन्हें करीब तीन सौ मीटर दूर से केबल डालने पड़ रहे हैं।
पीने के पानी की भी कोई व्यवस्था नहीं है। वहीं, गांव पलड़ी स्थित दंगा पीड़ितों की बस्ती में रह रहे लोगों का कहना है कि कुछ लोगों को अब तक मुआवजा नहीं मिला है। बस्ती में सड़क भी नहीं है, जिससे लोगों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।