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कोरोना का कहर: उजड़ गए हंसते-खेलते परिवार, सिर से उठा माता-पिता का साया, अनाथ हुए बच्चे, अमर उजाला ने शुरू किया ये अभियान

Sat, 29 May 2021 05:30 PM IST
कपिल kapil न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मुजफ्फरनगर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मुजफ्फरनगर Published by: कपिल kapil Updated Sat, 29 May 2021 05:30 PM IST
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Amar Ujala Apanatva Abhiyan: many children have become orphan and the families ruined in many district of Uttar Pradesh
गमजदा परिजन। - फोटो : amar ujala

खतौली के श्यामपुरी निवासी 12 साल की ईशा के सिर से पिता का साया साढ़े तीन साल पहले उठ गया था, अब कोरोना ने मां का आंचल भी छीन लिया। ऐसे कई हंसते-खेलते परिवारों पर कोरोना महामारी कहर बनकर टूटी है। बहुत सारे बच्चे अनाथ हो गए हैं। किसी के सिर से पिता का साया उठा तो किसी परिवार का कमाने वाला ही चला गया। कई मामलों में माता-पिता दोनों की मौत हो गई। अमर उजाला अपनत्व अभियान के तहत हम ऐसे बच्चों को इस अपेक्षा के साथ सामने ला रहे हैं ताकि प्रशासनिक तंत्र संज्ञान लेकर इनकी सहायता करें और योजनाओं का लाभ इन्हें मिलें। 

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वृद्ध और बीमार दादा के कंधों पर आ गई मासूम ईशा की बड़ी जिम्मेदारी
12 साल की ईशा के पिता खतौली के श्यामपुरी पंजाबी कॉलोनी निवासी मनोज बटला उर्फ बॉबी पंजाब से हौजरी का सामान लाकर कस्बे में दुकानदारों को बेचते थे। परिवार में पत्नी नीलिमा, बेटी ईशा और वृद्ध मां फूला-पिता सोमनाथ थे। साढ़े तीन साल पहले अचानक ह्दयाघात से मनोज का निधन हो गया था। ढाई साल पहले फूला का भी निधन हो गया। नीलिमा ही घर पर कपड़ों की सिलाई करके बेटी और ससुर सोमनाथ के भरण पोषण की जिम्मेदारी निभा रही थी। नीलिमा कक्षा सात में बढ़ रही बेटी ईशा को उच्च शिक्षा दिलाना चाहती थी। गत 12 मई को नीलिमा की तबीयत खराब हो गई। उनकी रिपोर्ट कोरोना पॉजिटिव आने और हालत बिगड़ने पर बेगराजपुर मुजफ्फरनगर मेडिकल कॉलेज में भर्ती कराया गया, 25 मई को नीलिमा की मौत हो गई। ईशा की देखभाल की जिम्मेदारी उसके दादा सोमनाथ (75 वर्ष) के कंधों पर आ गई। वह भी बीमार है और उनके पास कोई रोजगार भी नहीं है।

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अपने दादा के साथ ईशा। - फोटो : amar ujala

13 बच्चे हो गए हैं अनाथ
मुजफ्फरनगर में जिला प्रोबेशन विभाग के सर्वे में जनपद में 141 बच्चे ऐसे मिले हैं जो अपनों को खोने का गम झेल रहे हैं। 13 बच्चे ऐसे हैं जिनके मॉ-बाप दोनों नहीं हैं। 83 बच्चे ऐसे हैं जिनके सिर से पिता का साया उठा है। 46 ने अपनी मां को खोया है। जिला प्रोबेशन अधिकारी मुशफेकीन ने बताया कि जो बच्चे अनाथ हैं उन्हें सरकार की प्रतिमाह छात्रवृत्ति की स्कीम में शामिल किया जाएगा। जिन बच्चों के पिता का निधन हुआ है, उन परिवारों में महिलाओं की विधवा पेंशन शुरू कराई जा रही है। पारिवारिक लाभ योजना में समाज कल्याण से आर्थिक मदद कराई जाएगी। गरीबी रेखा का राशन कार्ड बनवाया जाएगा। प्रतिमाह वाली छात्रवृत्ति में भी बच्चों को चिन्हित किया जाएगा।

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गमजदा परिजन। - फोटो : amar ujala

बेटे-बेटियों की पढ़ाई और परवरिश की चिंता
बड़ौत में आनंद गंज मंडी निवासी 46 वर्षीय संगीता का हंसता-खेलता परिवार उजड़ गया है। कोरोना से पति मनोज गोयल उर्फ पिंटू पुत्र स्व. मित्रसैन गोयल की मृत्यु हो गई। मनोज गोयल उर्फ पिंटू घर में अकेले कमाने वाले थे। पिंटू के तीन बच्चे हैं, जिनमें दो बेटियां आयुषी (20) व राशि (19) व एक बेटा उज्ज्वल (12) है। पत्नी संगीता जिसके कंधे पर अब परिवार की पूरी जिम्मेदारी है, वह भी लंबे समय से कई बीमारियों से ग्रस्त है। ऐसी हालत में अब मासूम बच्चों की परवरिश कैसे होगी, यह बड़ा सवाल है। जिस पर नियति के सामने क्या किया सकता है, यह कहकर संगीता खामोश हो जाती हैं। संगीता ने रोते हुए बताया कि उनके पति का सपना बेटी आयुषी को प्रोफेसर बनाने का सपना था, जबकि दूसरी बेटी राशि को सीए बनाने का। बेटे उज्जवल को इंजीनियर बनाने का सपना संजोया था। अब परिवार में न तो कोई कमाने वाला है और न ही बेटियों को पढ़ाने वाला है। पति के साथ उनका सपना भी खत्म हो गया।

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गमजदा परिजन। - फोटो : amar ujala

सात सदस्यों के परिवार का इकलौता सहारा था योगेश
शामली के गांव खोड़समा निवासी योगेश कुमार की बुखार से मौत हो जाने के बाद उसका पूरा परिवार भी बेसहारा हो गया है। उनकी पत्नी, दो बहनों और तीन मासूम बच्चों वाले इस परिवार के लिए अब आजीविका का कोई साधन नहीं है। फैक्टरी में मजदूरी करने वाले योगेश कुमार को 26 अप्रैल को बुखार आया था और चार मई की रात उसकी तबीयत ज्यादा खराब हो गई थी। परिजन शामली एल-2 अस्पताल में लेकर गए, लेकिन वहां से सहारनपुर ले जाते समय योगेश ने दम तोड़ दिया। परिवार में पत्नी शिखा और दो बेटी अराध्या (6), नित्या (4) और पुत्र ऋषांक (2) हैं। दो बहनें संयोगिता और पूजा हैं। पिता कुशलपाल बुजुर्ग होने के कारण कुछ काम नहीं कर पाते। 

वह बताते हैं कि परिवार में कोई कमाने वाला नहीं रहा। दो बेटियों की शादी के साथ ही परिवार के पालन पोषण की चिंता उन्हें सता रही है। उनके पास खेती की जमीन भी नहीं है। पूरा परिवार सदमे में हैं। कोरोना की दूसरी लहर में शायद ही कोई गांव ऐसा बचा हो जिसमें किसी की मौत न हुई हो। लेकिन विभाग अब तक एक भी ऐसे बच्चे की तलाश नहीं कर पाया। जिला कार्यक्रम अधिकारी संतोष कुमार श्रीवास्तव ने बताया कि जिले में माता-पिता की मौत के बाद अनाथ हुआ कोई बच्चा नहीं मिला है।

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अपनी माता के साथ बच्चे। - फोटो : amar ujala

पिता की मौत के बाद बच्चों के सामने भरण पोषण का संकट
सहारनपुर के देवबंद के छुटमुलपुर क्षेत्र में गांव साखन खुर्द निवासी उमेश शर्मा (46) देवबंद सिविल कोर्ट में अधिवक्ता थे। 15 अप्रैल को उन्हें खांसी, जुकाम व बुखार आया। 28 अप्रैल को सांस लेने में दिक्कत आने पर चिकित्सक ने कोरोना के लक्षण बताकर सरकारी अस्पताल ले जाने की सलाह दी। सीएचसी में कोविड टेस्ट हुआ और एंटीजन रिपोर्ट निगेटिव आई, लेकिन उमेश शर्मा की स्थिति बिगड़ती चली गई। फिर उन्हें जिला अस्पताल रेफर कर दिया गया। परिजन 29 अप्रैल को ऑक्सीजनयुक्त गाड़ी से उन्हें यमुनानगर लेकर चल पड़े, लेकिन रास्ते में ही उनकी मौत हो गई। अब परिवार में दो बच्चों अंशित (15) और बेटी छवि (14) के पालन पोषण की जिम्मेदारी उनकी पत्नी उमा शर्मा के कंधों पर आ गई। 

उमा शर्मा ने बताया कि परिवार में अब कमाने वाला कोई नहीं है। उनके हिस्से में सिर्फ तीन बीघा जमीन आती है, जबकि बच्चे 12वीं कक्षा में पढ़ रहे हैं। गुजर बसर कैसे होगी, यही चिंता रहती है। गांव गदरहेड़ी निवासी नवीन गोयल (32) पुत्र फूल सिंह इंडेन गैस एजेंसी पर डिलीवरी मैन का काम करते थे। अप्रैल के आखिरी सप्ताह में उन्हें बुखार हुआ। जिला अस्पताल में उन्हें कोरोना संक्रमण की पुष्टि हुई। हालत बिगड़ने पर उन्हें हरियाणा के जगाधरी स्थित अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां 10 मई को उनकी मौत हो गई।। नवीन की मौत के बाद उसकी पत्नी कामेश उर्फ रीना और दो छोटे बच्चों गोरी (12) और कन्हैया (9) के सामने भरण पोषण का संकट खड़ा हो गया। पिता कमा कर लाते थे तो परिवार की गुजर बसर होती थी। गोरी कक्षा आठ और कन्हैया कक्षा तीन में पढ़ता है। 

Amar Ujala Apanatva Abhiyan: many children have become orphan and the families ruined in many district of Uttar Pradesh
गमजदा परिजन। - फोटो : amar ujala

रीना बताती हैं कि जो जमा पूंजी थी, वह तो खत्म हो ही गई। घर में रखा अनाज तक बेचकर बीमारी में लगा दिया था। परिवार के पास आय का कोई साधन नहीं है। जमीन भी उनके पास नहीं है। ऐसे में दो वक्त की रोटी जुटानी भी मुश्किल हो रही है। घर के नाम पर भी टीन शेड पड़ा है।

चिह्नित हुए हैं ऐसे 15 बच्चे
सहारनपुर में कोरोना काल में जिन बच्चों के माता-पिता का निधन हो गया है या फिर माता पिता में से किसी एक का निधन हुआ है, उनको प्रोबेशन विभाग भी चिह्नित कर रहा है। जिले में अभी तक ऐसे 15 बच्चे चिह्नित हुए हैं, जिनके सिर से माता-पिता का साया उठ चुका है। इसके अलावा 288 बच्चे ऐसे हैं, जिनके माता या पिता किसी एक की मृत्यु हो चुकी है।

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