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कानून ऐसा बने, तलाक शब्द से भी कांपें लोग
Updated Wed, 23 Aug 2017 01:07 AM IST
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कानून ऐसा बने, तलाक शब्द से भी कांपें लोग
मुजफ्फरनगर। खालापार की शबाना परवीन की शादी दो साल पहले मेरठ में हुई थी। उसका पहले दिन से ही ससुराल में उत्पीड़न होने लगा। उसने जैसे-तैसे कर परिवार की इज्जत के लिए एक साल गुजार दिया। हालांकि ससुरालियों की ज्यादती से वह तंग आ गई। आखिरकार एक रोज ऐसा आया कि जिसने शबाना को दोराहे पर लाकर खड़ा कर दिया। तलाश का दंश झेल रही शबाना ने साफ कहा कि कानून दीनी एतबार से बने और ऐसी सजा रखी जाए, जिससे लोग तलाक देना तो दूर इस शब्द से भी कांप उठें।
खालापार निवासी हाजी शकील ने बताया कि बेटी शबाना परवीन का निकाह दो साल पहले मेरठ के बुढ़ाना गेट पर रसद इलियास से किया था। अब शबाना अपने माता-पिता के पास है। तलाक का दंश झेल रही पीड़िता शबाना ज्यादती और जुल्म की कहानी बताते हुए सुबक पड़ी, पिता की भी आंखें नम हो गईं। शबाना ने कहा कि मजहब के एतबार से उसको तलाक हो गया, लेकिन उसकी जिंदगी अब दोराहे पर है। माता-पिता के घर पर शबाना ने एक बेटी को जन्म दिया। पति रसद ने उसे तलाक देकर अलग कर दिया। कहती है कि वह मजहब के कानून के खिलाफ नहीं है, लेकिन शरीयत के कानून का दुरुपयोग भी नहीं होना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट का फैसले सही है या गलत, यह सब कानून बनने के बाद साफ होगा। हालांकि तीन तलाक पर ऐसा कानून बनाया जाए, जिसमें तलाक देने वालों को कड़ी सजा मिले, ताकि किसी की बेटी की जिंदगी बर्बाद न हो सके।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का स्वागत
ऑल इंडिया इमाम काउंसिल के प्रदेशाध्यक्ष मुफ्ती जुल्फिकार ने कहा कि तीन तलाक की आड़ में मजहबी कानून का मजाक बनाया जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले का स्वागत है, लेकिन सरकार जो भी कानून तैयार करे, उसमें उलमा, इस्लाम मजहब के बड़े मौअज्जिजों को साथ लिया जाए। तीन तलाक पूरी तरह से गलत प्रथा है। मजहब-ए-इस्लाम में तीन तलाक का तरीका अलग है। लोगों ने उसे अपने तरीके से इस्तेमाल करने का जरिया मान लिया है। इससे ही समाज में बिगाड़ पैदा हो रहे हैं।
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फक्करशाह चौक मस्जिद के इमाम खालिद जाहिद ने कहा कि किसी व्यक्ति ने बीवी को एक साथ तीन तलाक कह दिया तो वह हो जाएगा। केंद्र सरकार को तलाक से अलग भी मुस्लिम महिलाओं के अन्य हकों पर भी बात करने के साथ कानून बनाए। शरीयत के कानून में तब्दीली की गुंजाइश बनती है, तो उसके लिए उलमा से राय लेकर केंद्र सरकार अपना कदम उठाए। सीधे कोई कानून थोपा जाएगा तो उसे मंजूर नहीं करेगा।
जमीयत ए-उलमा के महासचिव कारी जाकिर हुसैन ने कहा कि तीन तलाक इस्लाम धर्म में पैगंबर साहब के दौर से ही प्रथा बनी है। यह दीनी एतबार से 1400 साल पुरानी व्यवस्था है, जिसमें तब्दीली नहीं की जा सकती है। सुप्रीम कोर्ट को चाहिए की खुद ऐसा नियम बनाए कि दीन और कानून का कोई उल्लंघन न हो सके। फिलहाल मामला केंद्र सरकार के ऊपर डाला गया है। मामले को लेकर उलमा से बातचीत इस पर आगे कुछ कहा जा सकता है।
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मुजफ्फरनगर। खालापार की शबाना परवीन की शादी दो साल पहले मेरठ में हुई थी। उसका पहले दिन से ही ससुराल में उत्पीड़न होने लगा। उसने जैसे-तैसे कर परिवार की इज्जत के लिए एक साल गुजार दिया। हालांकि ससुरालियों की ज्यादती से वह तंग आ गई। आखिरकार एक रोज ऐसा आया कि जिसने शबाना को दोराहे पर लाकर खड़ा कर दिया। तलाश का दंश झेल रही शबाना ने साफ कहा कि कानून दीनी एतबार से बने और ऐसी सजा रखी जाए, जिससे लोग तलाक देना तो दूर इस शब्द से भी कांप उठें।
खालापार निवासी हाजी शकील ने बताया कि बेटी शबाना परवीन का निकाह दो साल पहले मेरठ के बुढ़ाना गेट पर रसद इलियास से किया था। अब शबाना अपने माता-पिता के पास है। तलाक का दंश झेल रही पीड़िता शबाना ज्यादती और जुल्म की कहानी बताते हुए सुबक पड़ी, पिता की भी आंखें नम हो गईं। शबाना ने कहा कि मजहब के एतबार से उसको तलाक हो गया, लेकिन उसकी जिंदगी अब दोराहे पर है। माता-पिता के घर पर शबाना ने एक बेटी को जन्म दिया। पति रसद ने उसे तलाक देकर अलग कर दिया। कहती है कि वह मजहब के कानून के खिलाफ नहीं है, लेकिन शरीयत के कानून का दुरुपयोग भी नहीं होना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट का फैसले सही है या गलत, यह सब कानून बनने के बाद साफ होगा। हालांकि तीन तलाक पर ऐसा कानून बनाया जाए, जिसमें तलाक देने वालों को कड़ी सजा मिले, ताकि किसी की बेटी की जिंदगी बर्बाद न हो सके।
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सुप्रीम कोर्ट के फैसले का स्वागत
ऑल इंडिया इमाम काउंसिल के प्रदेशाध्यक्ष मुफ्ती जुल्फिकार ने कहा कि तीन तलाक की आड़ में मजहबी कानून का मजाक बनाया जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले का स्वागत है, लेकिन सरकार जो भी कानून तैयार करे, उसमें उलमा, इस्लाम मजहब के बड़े मौअज्जिजों को साथ लिया जाए। तीन तलाक पूरी तरह से गलत प्रथा है। मजहब-ए-इस्लाम में तीन तलाक का तरीका अलग है। लोगों ने उसे अपने तरीके से इस्तेमाल करने का जरिया मान लिया है। इससे ही समाज में बिगाड़ पैदा हो रहे हैं।
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फक्करशाह चौक मस्जिद के इमाम खालिद जाहिद ने कहा कि किसी व्यक्ति ने बीवी को एक साथ तीन तलाक कह दिया तो वह हो जाएगा। केंद्र सरकार को तलाक से अलग भी मुस्लिम महिलाओं के अन्य हकों पर भी बात करने के साथ कानून बनाए। शरीयत के कानून में तब्दीली की गुंजाइश बनती है, तो उसके लिए उलमा से राय लेकर केंद्र सरकार अपना कदम उठाए। सीधे कोई कानून थोपा जाएगा तो उसे मंजूर नहीं करेगा।
जमीयत ए-उलमा के महासचिव कारी जाकिर हुसैन ने कहा कि तीन तलाक इस्लाम धर्म में पैगंबर साहब के दौर से ही प्रथा बनी है। यह दीनी एतबार से 1400 साल पुरानी व्यवस्था है, जिसमें तब्दीली नहीं की जा सकती है। सुप्रीम कोर्ट को चाहिए की खुद ऐसा नियम बनाए कि दीन और कानून का कोई उल्लंघन न हो सके। फिलहाल मामला केंद्र सरकार के ऊपर डाला गया है। मामले को लेकर उलमा से बातचीत इस पर आगे कुछ कहा जा सकता है।