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25 साल बाद जेल से लौटा बेगुनाह
ब्यूरो / अमर उजाला, मुजफ्फरनगर
Updated Wed, 27 Jan 2016 11:46 PM IST
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मुजफ्फरनगर। राज्यपाल के आदेश के 46 दिन बाद आखिरकार 25 साल से जेल की सलाखों के पीछे कैद नसीम को आजादी मिल गई।
उत्तराखंड के उधमसिंहनगर की सितारगंज जेल से 26 जनवरी की रात दस बजे उसे जेल अधीक्षक ने रिहा कर दिया। बुधवार को नसीम गांव बसधाड़ा लौटा तो परिवार में खुशियों के आंसू बहने लगे। गांव में मिठाई बांटी गई।
राज्यपाल के आदेश पर प्रदेश के कारागार प्रशासन एवं सुधार अनुभाग-2 ने जिला प्रशासन से प्राप्त पत्रावलियों की जांच के बाद दस दिसंबर 2015 को कैदी नसीम को कारागार से मुक्त करने पर मुहर लगा दी थी। वर्ष 2013 में मुकदमे की वादी जाहिदा और उसके बेटे नजर ने शपथपत्र देकर प्रतिवादी नसीम को बेगुनाह बताया।
अमर उजाला बेगुनाह नसीम के परिवार की आवाज बना। इस पर तत्कालीन डीएम सुरेंद्र सिंह और एसएसपी मंजिल सैनी ने आजीवन कारावास की सजा भुगत रहे कैदी नसीम पुत्र दीनमोहम्मद की रिहाई के लिए रिपोर्ट शासन को भेजी।
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नसीम की बीवी तहमीना और बेटा मोहसिन अफसरों के दरवाजे पर रिहाई के लिए संघर्ष करते रहे। जिस केस में नसीम को सजा हुई, वो 40 साल पुराना केस है। तीन अप्रैल 1975 को मंसूरपुर थाने के अलियारपुर गांव में इकबाल नाम के व्यक्ति का कत्ल हुआ था।
हत्या के आरोप में पकड़े गए फैय्याज ने दूध बिक्री की रंजिश में नसीम का नाम घसीटा। केस की सुनवाई के बाद 24 अप्रैल 1979 को फैय्याज और नसीम को एडीजे फर्स्ट बीके राठी ने उम्रकैद की सजा सुना दी। हाईकोर्ट से जमानत मिलने के बाद 11 साल तक यह मामला लंबित रहा। इस बीच नसीम ने घर गृहस्थी बसा ली।
हाईकोर्ट ने सजा को बरकरार रखा तो उसे वर्ष 1990 में जेल जाना पड़ा। जिला कारागार से फतेहगढ़ और आगरा सेंट्रल जेल से नसीम को सितारगंज जेल भेजा । 40 दिन रिहाई लटकी रही।
बुधवार को नसीम गांव बसधाड़ा लौटा। गांव में ईद जैसी खुशियां मनाई। पत्नी तहमीना, बेटे मोहसीन, बेटी आयशा, निखत आशमा ने अमर उजाला का शुक्रिया अदा किया। नसीम ने कहा 25 साल जेल में रहने के बाद घर लौटा हूं, विश्वास नहीं हो पा रहा है। लोगों की दुआएं और बच्चों की आश ने जिंदगी बख्शी है।
रिश्तेदारों का तांता
शाहपुर। बसधाड़ा की मस्जिद के आगे एक गली में नसीम का आशियाना है। छोटे से कच्चे घर में दो कमरे हैं। रिश्तेदारों का तांता लगा है।
दोपहर एक बजे नसीम सितार गंज से गांव पहुंचा। इस दौरान पूर्व प्रधान दिलशाद त्यागी, नूरा, अब्दुल कादिर, सरफराज, मोहसीन, आशिफ त्यागी, मुस्तफा, गय्यूर, शाहिद, नदीम, मुजफ्फर, तैय्यब, उम्मेद, जुनेद, आरिफ त्यागी, इदरीस आदि सैकड़ों ग्रामीणों ने नसीम को बधाई दी।
दरोगा जी की 'कलम' ने बर्बाद कर दी जिंदगी
बसधाड़ा। मंसूरपुर थाने का गांव अलियारपुर उस समय बुढ़ाना कोतवाली का हिस्सा हुआ करता था। तीन अप्रैल 1975 को पुलिस को इत्तला मिली कि जंगल के नाले में एक लाश पड़ी है।
एसओ चंद्रपाल सिंह और एसआई धीरजपाल सिंह घटनास्थल पर पहुंचे। लाश कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए भिजवाई गई। पहचान हुई तो वह अलियारपुर का इकबाल निकला। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में डॉक्टर एससी गुप्ता ने बंदूक की गोली से मौत होना बताया।
पुलिस ने हत्या के आरोप में बसधाड़ा के फैय्याज को हिरासत में ले लिया। पुलिस ने मामले की गहराई में जाने के बजाय फैय्याज के कहने पर ही नसीम को आरोपी बना दिया। नसीम को कानून पर भरोसा था, लेकिन न्याय नहीं मिला। वह कहता है कि दो साल पहले 'अमर उजाला' ने मेरे परिवार की आवाज उठाई तो उम्मीदें जगी और आज वह अपनों के बीच पहुंच गया है।
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उत्तराखंड के उधमसिंहनगर की सितारगंज जेल से 26 जनवरी की रात दस बजे उसे जेल अधीक्षक ने रिहा कर दिया। बुधवार को नसीम गांव बसधाड़ा लौटा तो परिवार में खुशियों के आंसू बहने लगे। गांव में मिठाई बांटी गई।
राज्यपाल के आदेश पर प्रदेश के कारागार प्रशासन एवं सुधार अनुभाग-2 ने जिला प्रशासन से प्राप्त पत्रावलियों की जांच के बाद दस दिसंबर 2015 को कैदी नसीम को कारागार से मुक्त करने पर मुहर लगा दी थी। वर्ष 2013 में मुकदमे की वादी जाहिदा और उसके बेटे नजर ने शपथपत्र देकर प्रतिवादी नसीम को बेगुनाह बताया।
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अमर उजाला बेगुनाह नसीम के परिवार की आवाज बना। इस पर तत्कालीन डीएम सुरेंद्र सिंह और एसएसपी मंजिल सैनी ने आजीवन कारावास की सजा भुगत रहे कैदी नसीम पुत्र दीनमोहम्मद की रिहाई के लिए रिपोर्ट शासन को भेजी।
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नसीम की बीवी तहमीना और बेटा मोहसिन अफसरों के दरवाजे पर रिहाई के लिए संघर्ष करते रहे। जिस केस में नसीम को सजा हुई, वो 40 साल पुराना केस है। तीन अप्रैल 1975 को मंसूरपुर थाने के अलियारपुर गांव में इकबाल नाम के व्यक्ति का कत्ल हुआ था।
हत्या के आरोप में पकड़े गए फैय्याज ने दूध बिक्री की रंजिश में नसीम का नाम घसीटा। केस की सुनवाई के बाद 24 अप्रैल 1979 को फैय्याज और नसीम को एडीजे फर्स्ट बीके राठी ने उम्रकैद की सजा सुना दी। हाईकोर्ट से जमानत मिलने के बाद 11 साल तक यह मामला लंबित रहा। इस बीच नसीम ने घर गृहस्थी बसा ली।
हाईकोर्ट ने सजा को बरकरार रखा तो उसे वर्ष 1990 में जेल जाना पड़ा। जिला कारागार से फतेहगढ़ और आगरा सेंट्रल जेल से नसीम को सितारगंज जेल भेजा । 40 दिन रिहाई लटकी रही।
बुधवार को नसीम गांव बसधाड़ा लौटा। गांव में ईद जैसी खुशियां मनाई। पत्नी तहमीना, बेटे मोहसीन, बेटी आयशा, निखत आशमा ने अमर उजाला का शुक्रिया अदा किया। नसीम ने कहा 25 साल जेल में रहने के बाद घर लौटा हूं, विश्वास नहीं हो पा रहा है। लोगों की दुआएं और बच्चों की आश ने जिंदगी बख्शी है।
रिश्तेदारों का तांता
शाहपुर। बसधाड़ा की मस्जिद के आगे एक गली में नसीम का आशियाना है। छोटे से कच्चे घर में दो कमरे हैं। रिश्तेदारों का तांता लगा है।
दोपहर एक बजे नसीम सितार गंज से गांव पहुंचा। इस दौरान पूर्व प्रधान दिलशाद त्यागी, नूरा, अब्दुल कादिर, सरफराज, मोहसीन, आशिफ त्यागी, मुस्तफा, गय्यूर, शाहिद, नदीम, मुजफ्फर, तैय्यब, उम्मेद, जुनेद, आरिफ त्यागी, इदरीस आदि सैकड़ों ग्रामीणों ने नसीम को बधाई दी।
दरोगा जी की 'कलम' ने बर्बाद कर दी जिंदगी
बसधाड़ा। मंसूरपुर थाने का गांव अलियारपुर उस समय बुढ़ाना कोतवाली का हिस्सा हुआ करता था। तीन अप्रैल 1975 को पुलिस को इत्तला मिली कि जंगल के नाले में एक लाश पड़ी है।
एसओ चंद्रपाल सिंह और एसआई धीरजपाल सिंह घटनास्थल पर पहुंचे। लाश कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए भिजवाई गई। पहचान हुई तो वह अलियारपुर का इकबाल निकला। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में डॉक्टर एससी गुप्ता ने बंदूक की गोली से मौत होना बताया।
पुलिस ने हत्या के आरोप में बसधाड़ा के फैय्याज को हिरासत में ले लिया। पुलिस ने मामले की गहराई में जाने के बजाय फैय्याज के कहने पर ही नसीम को आरोपी बना दिया। नसीम को कानून पर भरोसा था, लेकिन न्याय नहीं मिला। वह कहता है कि दो साल पहले 'अमर उजाला' ने मेरे परिवार की आवाज उठाई तो उम्मीदें जगी और आज वह अपनों के बीच पहुंच गया है।