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समाज उत्थान को बच्चें संस्कारवान हो: शास्त्री
Updated Tue, 24 Apr 2018 12:56 AM IST
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समाज उत्थान को बच्चे संस्कारवान हो: शास्त्री
मुजफ्फरनगर। टाउन हाल के मैदान में चल रही श्रीमद्भागवत कथा के तीसरे दिन कथा व्यास पंडित हिमेश शास्त्री ने कहा कि भक्त ध्रुव का चरित्र ही यह दर्शाता है कि भक्ति मार्ग के लिए बाल्य काल ही श्रेष्ठ समय है।
उन्होंने कहा कि बच्चे की बुद्धि कोमल होती है, छल कपट से दूर यदि उस पर संस्कार स्थापित किए जाए तो वह आसानी से संस्कारवान युवा बन सकता है। इससे समाज की बुराइयों से बचा जा सकेगा। उन्होंने बर्तन बनाने वाले कुम्हार का उदाहरण देते हुए बताया कि जिस प्रकार से वह कच्ची मिट्टी को सांचे में ढाल देता है, बर्तन वैसी ही शक्ल के बन जाते हैं। यदि हमारा बाल्यकाल सुधर जाता है तो बुढ़ापा भी बढ़िया होगा और मृत्यु भी कष्टदायक नहीं होगी। इसी प्रकार कपिल ने भी अपनी माता को कल्याण का मार्ग तब दिखाया, जब वे शरणागत होकर उनसे याचना करने लगी। इसी प्रकार महाभारत काल में श्रीकृष्ण अर्जुन के सखा जरूर थे, लेकिन जब अर्जुन उनकी शरण में आया, तभी उन्होंने उसे शिष्य के रूप में स्वीकार कर कल्याण का मार्ग दिखाया। मनुष्य को चाहिए कि अपने अहंकार व ममत्व को त्यागकर, सब कुछ प्रभु को सौंपकर उसकी शरण में जाकर मात्र अपने को देखभाल करने वाला सेवक समझना चाहिए, तभी उसे मुक्ति मिलेगी। इससे पूर्व अनुष्ठान और पूजन सनातन धर्म सभा भवन में हुआ। मुख्य यजमान अर्जुन अग्रवाल,अवनीश गर्ग, संजीव कमल, संजीव कंसल, विकास बंसल, डॉ सतीश वत्स, संतोष मिश्रा रहे। कथा समिति की ओर से भीमसेन कंसल, सतीश गर्ग, सुशील शर्मा, राजीव जैन, संजय शर्मा, बाबूराम कौशल, अमित गर्ग, अंजुल भूषण, लक्ष्मीनारायण शर्मा, सुशील गोयल, संदीप जैन, ब्रज कुॅवर गर्ग, अर्पित गुप्ता, गौरव कौशिक, राघव गुप्ता आदि मौजूद रहे।
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मुजफ्फरनगर। टाउन हाल के मैदान में चल रही श्रीमद्भागवत कथा के तीसरे दिन कथा व्यास पंडित हिमेश शास्त्री ने कहा कि भक्त ध्रुव का चरित्र ही यह दर्शाता है कि भक्ति मार्ग के लिए बाल्य काल ही श्रेष्ठ समय है।
उन्होंने कहा कि बच्चे की बुद्धि कोमल होती है, छल कपट से दूर यदि उस पर संस्कार स्थापित किए जाए तो वह आसानी से संस्कारवान युवा बन सकता है। इससे समाज की बुराइयों से बचा जा सकेगा। उन्होंने बर्तन बनाने वाले कुम्हार का उदाहरण देते हुए बताया कि जिस प्रकार से वह कच्ची मिट्टी को सांचे में ढाल देता है, बर्तन वैसी ही शक्ल के बन जाते हैं। यदि हमारा बाल्यकाल सुधर जाता है तो बुढ़ापा भी बढ़िया होगा और मृत्यु भी कष्टदायक नहीं होगी। इसी प्रकार कपिल ने भी अपनी माता को कल्याण का मार्ग तब दिखाया, जब वे शरणागत होकर उनसे याचना करने लगी। इसी प्रकार महाभारत काल में श्रीकृष्ण अर्जुन के सखा जरूर थे, लेकिन जब अर्जुन उनकी शरण में आया, तभी उन्होंने उसे शिष्य के रूप में स्वीकार कर कल्याण का मार्ग दिखाया। मनुष्य को चाहिए कि अपने अहंकार व ममत्व को त्यागकर, सब कुछ प्रभु को सौंपकर उसकी शरण में जाकर मात्र अपने को देखभाल करने वाला सेवक समझना चाहिए, तभी उसे मुक्ति मिलेगी। इससे पूर्व अनुष्ठान और पूजन सनातन धर्म सभा भवन में हुआ। मुख्य यजमान अर्जुन अग्रवाल,अवनीश गर्ग, संजीव कमल, संजीव कंसल, विकास बंसल, डॉ सतीश वत्स, संतोष मिश्रा रहे। कथा समिति की ओर से भीमसेन कंसल, सतीश गर्ग, सुशील शर्मा, राजीव जैन, संजय शर्मा, बाबूराम कौशल, अमित गर्ग, अंजुल भूषण, लक्ष्मीनारायण शर्मा, सुशील गोयल, संदीप जैन, ब्रज कुॅवर गर्ग, अर्पित गुप्ता, गौरव कौशिक, राघव गुप्ता आदि मौजूद रहे।
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