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जो झेला वही लिखते चले गए ओमप्रकाश वाल्मीकि
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जो झेला वही लिखते चले गए ओमप्रकाश वाल्मीकि
मुजफ्फरनगर। ओमप्रकाश वाल्मीकि परिचय के मोहताज नहीं है। 30 जून 1950 को बरला में जन्मे इस लेखक की कलम समाज की विद्रूपताओं के खिलाफ जीवन भर चली, लेकिन वर्ष 1997 में आई उनकी आत्मकथा ‘जूठन’ ने तहलका मचा दिया। दरअसल, जूठन उनके व उनके समाज के लोगों की जिंदगी का सच है। उन्होंने जीवन भर जो झेला उसी को लिखते चले गए।
बरला में अपनी शिक्षा खत्म करने के बाद ओमप्रकाश वाल्मीकि देहरादून जाकर बस गए थे। उन्होंने कुछ समय तक महाराष्ट्र में रहकर आंबेडकर पर अध्ययन भी किया। उनकी आत्मकथा जूठन को आलोचकों ने दलित साहित्य का दहकता दस्तावेज कहा है। स्वयं ओमप्रकाश वाल्मीकि ने लिखा है ‘दलित जीवन की पीड़ाएं असहनीय हैं। ऐसे अनुभव जो साहित्य अभिव्यक्ति में स्थान नहीं पा सके। एक ऐसी समाज व्यवस्था में हमने सासें ली हैं, जो बेहद अमानवीय है। इन अनुभवों में लिखने में कई प्रकार के खतरे थे। एक लंबी जद्दोजहद के बाद, मैंने सिलसिलेवार लिखना शुरू किया।
अपनों में ही होना पड़ा भेदभाव का शिकार
मुजफ्फरनगर। साहित्य के आसमान पर चमकने के बावजूद ओमप्रकाश वाल्मीकि को मुजफ्फरनगर की एक साहित्य संस्था के कार्यक्रम में भेदभाव का शिकार होना पड़ा था। जानसठ रोड स्थित हरि वृंदावन सिटी निवासी साहित्यकार हरपाल सिंह आरुष बताते हैं कि साहित्यिक संस्था के कार्यक्रम में ओमप्रकाश वाल्मीकि को मुख्य अतिथि के रूप में बुलाना तय हुआ था। उनका नाम सुझाते ही संस्था से जुड़े लोगों ने उनके रहने की व्यवस्था होटल में करने की बात कही, जबकि पूर्व में कार्यक्रमों में आने वाले अतिथि संस्था से जुड़े साहित्यकारों के घर पर रुकते थे। आरुष बताते हैं कि उन्होंने इसका विरोध किया तो सबने कह दिया कि वह अपने घर पर उनके ठहरने का प्रबंध कर दें। उन्होंने बताया कि मैं सहमत हो गया। ओमप्रकाश कार्यक्रम से एक दिन पूर्व मेरे घर पर सपत्नीक आ गए। कार्यक्रम में शामिल होने के बाद भी रुके और फिर चले गए।
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तंग गलियों में है छोटा सा कमरा
साहित्यकार ओमप्रकाश वाल्मीकि की मृत्यु 17 नवंबर 2013 में हो गई थी। उनके भाई के पौत्र विकास कुमार बताते हैं कि करीब 15 वर्ष पहले वे बरला आए थे। उनकी मृत्यु के बाद पत्नी देहरादून में ही रहती हैं। दोनों की कोई संतान नहीं है। बरला में वाल्मीकि बस्ती की तंग गलियों में स्थित पुश्तैनी घर में उनका भी एक कमरा बना है।
कई सम्मान मिले
ओमप्रकाश वाल्मीकि ने दलित साहित्य पर एक दर्जन से ज्यादा पुस्तकें लिखीं। इनमें उनकी आत्मकथा जूठन के अलावा घुसपैठिए, अब और नहीं, सलाम, सदियों का संताप, बस बहुत हो चुका, सफाई देवता, दलित साहित्य का सौंदर्यशास्त्र, मैं हिंदू क्यों नहीं आदि शामिल हैं। उनकी रचनाओं के लिए ओमप्रकाश को डा. आंबेडकर राष्ट्रीय पुरस्कार, साहित्य भूषण पुरस्कार तथा परिवेश सम्मान से सम्मानित किया गया। जूठन का विश्व की सबसे ज्यादा भाषाओं में अनुवाद हुआ। दिल्ली समेत कई विश्व विद्यालयों में उनका साहित्य पाठ्यक्रम में शामिल है।
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मुजफ्फरनगर। ओमप्रकाश वाल्मीकि परिचय के मोहताज नहीं है। 30 जून 1950 को बरला में जन्मे इस लेखक की कलम समाज की विद्रूपताओं के खिलाफ जीवन भर चली, लेकिन वर्ष 1997 में आई उनकी आत्मकथा ‘जूठन’ ने तहलका मचा दिया। दरअसल, जूठन उनके व उनके समाज के लोगों की जिंदगी का सच है। उन्होंने जीवन भर जो झेला उसी को लिखते चले गए।
बरला में अपनी शिक्षा खत्म करने के बाद ओमप्रकाश वाल्मीकि देहरादून जाकर बस गए थे। उन्होंने कुछ समय तक महाराष्ट्र में रहकर आंबेडकर पर अध्ययन भी किया। उनकी आत्मकथा जूठन को आलोचकों ने दलित साहित्य का दहकता दस्तावेज कहा है। स्वयं ओमप्रकाश वाल्मीकि ने लिखा है ‘दलित जीवन की पीड़ाएं असहनीय हैं। ऐसे अनुभव जो साहित्य अभिव्यक्ति में स्थान नहीं पा सके। एक ऐसी समाज व्यवस्था में हमने सासें ली हैं, जो बेहद अमानवीय है। इन अनुभवों में लिखने में कई प्रकार के खतरे थे। एक लंबी जद्दोजहद के बाद, मैंने सिलसिलेवार लिखना शुरू किया।
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अपनों में ही होना पड़ा भेदभाव का शिकार
मुजफ्फरनगर। साहित्य के आसमान पर चमकने के बावजूद ओमप्रकाश वाल्मीकि को मुजफ्फरनगर की एक साहित्य संस्था के कार्यक्रम में भेदभाव का शिकार होना पड़ा था। जानसठ रोड स्थित हरि वृंदावन सिटी निवासी साहित्यकार हरपाल सिंह आरुष बताते हैं कि साहित्यिक संस्था के कार्यक्रम में ओमप्रकाश वाल्मीकि को मुख्य अतिथि के रूप में बुलाना तय हुआ था। उनका नाम सुझाते ही संस्था से जुड़े लोगों ने उनके रहने की व्यवस्था होटल में करने की बात कही, जबकि पूर्व में कार्यक्रमों में आने वाले अतिथि संस्था से जुड़े साहित्यकारों के घर पर रुकते थे। आरुष बताते हैं कि उन्होंने इसका विरोध किया तो सबने कह दिया कि वह अपने घर पर उनके ठहरने का प्रबंध कर दें। उन्होंने बताया कि मैं सहमत हो गया। ओमप्रकाश कार्यक्रम से एक दिन पूर्व मेरे घर पर सपत्नीक आ गए। कार्यक्रम में शामिल होने के बाद भी रुके और फिर चले गए।
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तंग गलियों में है छोटा सा कमरा
साहित्यकार ओमप्रकाश वाल्मीकि की मृत्यु 17 नवंबर 2013 में हो गई थी। उनके भाई के पौत्र विकास कुमार बताते हैं कि करीब 15 वर्ष पहले वे बरला आए थे। उनकी मृत्यु के बाद पत्नी देहरादून में ही रहती हैं। दोनों की कोई संतान नहीं है। बरला में वाल्मीकि बस्ती की तंग गलियों में स्थित पुश्तैनी घर में उनका भी एक कमरा बना है।
कई सम्मान मिले
ओमप्रकाश वाल्मीकि ने दलित साहित्य पर एक दर्जन से ज्यादा पुस्तकें लिखीं। इनमें उनकी आत्मकथा जूठन के अलावा घुसपैठिए, अब और नहीं, सलाम, सदियों का संताप, बस बहुत हो चुका, सफाई देवता, दलित साहित्य का सौंदर्यशास्त्र, मैं हिंदू क्यों नहीं आदि शामिल हैं। उनकी रचनाओं के लिए ओमप्रकाश को डा. आंबेडकर राष्ट्रीय पुरस्कार, साहित्य भूषण पुरस्कार तथा परिवेश सम्मान से सम्मानित किया गया। जूठन का विश्व की सबसे ज्यादा भाषाओं में अनुवाद हुआ। दिल्ली समेत कई विश्व विद्यालयों में उनका साहित्य पाठ्यक्रम में शामिल है।