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धरातल पर नहीं आ पा रही खुले में शौच मुक्त योजना
Updated Tue, 18 Jul 2017 12:31 AM IST
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धरातल पर नहीं आ पा रही ओडीएफ योजना
मुजफ्फरनगर। भारत और प्रदेश सरकार की प्राथमिकता वाले गांवों को खुले में शौच मुक्त करने की योजना धरातल पर नहीं आ पा रही है। एनजीओ और प्रशासनिक अधिकारी कागजी कार्रवाई तो पूरी कर रहे हैं, लेकिन गांवों में उस पैमाने पर जागरूकता अभियान नहीं चला पा रहे हैं, जिसकी आवश्यकता है। डीएम जीएस प्रियदर्शी डीपीआरओ और योजना में लगे एनजीओ से नाराज हैं।
जिले के 498 गांवों को 31 दिसंबर 2017 तक खुले में शौच से मुक्त करना है। प्रदेश सरकार ने यह समय तय किया है। जिले में जिस तरह गांवों को खुले में शौच मुक्त करने के कार्यक्रम चल रहे हैं। इससे लगता है कि प्रदेश सरकार की मंशा पूरी नहीं हो पाएगी। अभियान को सफल बनाने के लिए एनजीओ को जिम्मेदारी दी गई है। टाटा रिसर्च ने भी अपनी एक अधिकारी को यहां भेजा। प्रत्येक ब्लाक में दो प्रेरक लगाए गए हैं। डीपीआरओ और सीडीओ को मुख्य जिम्मेदारी दी गई है। गांवों में जिस तरह जागरूकता अभियान चलाया जाना चाहिए, वह नहीं चल पा रहा है। कागजी कार्रवाई तो पूरी हो रही हैं, लेकिन व्यवहार में कुछ नहीं है। डीपीआरओ अफसरशाही के हिसाब से लगे हैं। गांवों में लोगों को समझाने का जो जुनून होना चाहिए, वह उनमें दिखाई नहीं देता है। सोमवार को डीएम जीएस प्रियदर्शी ने अभियान से जुड़ी फाइलें मंगवाई तो दंग रह गए। व्यवहारिक रूप से कुछ भी न होता देख उन्होंने अभियान से जुड़े एनजीओ के अधिकारियों की जमकर क्लास ली। डीएम ने बताया कि जल्द ही सीडीओ के नेतृत्व में गांव-गांव जागरूकता का अभियान चलाया जाएगा।
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मुजफ्फरनगर। भारत और प्रदेश सरकार की प्राथमिकता वाले गांवों को खुले में शौच मुक्त करने की योजना धरातल पर नहीं आ पा रही है। एनजीओ और प्रशासनिक अधिकारी कागजी कार्रवाई तो पूरी कर रहे हैं, लेकिन गांवों में उस पैमाने पर जागरूकता अभियान नहीं चला पा रहे हैं, जिसकी आवश्यकता है। डीएम जीएस प्रियदर्शी डीपीआरओ और योजना में लगे एनजीओ से नाराज हैं।
जिले के 498 गांवों को 31 दिसंबर 2017 तक खुले में शौच से मुक्त करना है। प्रदेश सरकार ने यह समय तय किया है। जिले में जिस तरह गांवों को खुले में शौच मुक्त करने के कार्यक्रम चल रहे हैं। इससे लगता है कि प्रदेश सरकार की मंशा पूरी नहीं हो पाएगी। अभियान को सफल बनाने के लिए एनजीओ को जिम्मेदारी दी गई है। टाटा रिसर्च ने भी अपनी एक अधिकारी को यहां भेजा। प्रत्येक ब्लाक में दो प्रेरक लगाए गए हैं। डीपीआरओ और सीडीओ को मुख्य जिम्मेदारी दी गई है। गांवों में जिस तरह जागरूकता अभियान चलाया जाना चाहिए, वह नहीं चल पा रहा है। कागजी कार्रवाई तो पूरी हो रही हैं, लेकिन व्यवहार में कुछ नहीं है। डीपीआरओ अफसरशाही के हिसाब से लगे हैं। गांवों में लोगों को समझाने का जो जुनून होना चाहिए, वह उनमें दिखाई नहीं देता है। सोमवार को डीएम जीएस प्रियदर्शी ने अभियान से जुड़ी फाइलें मंगवाई तो दंग रह गए। व्यवहारिक रूप से कुछ भी न होता देख उन्होंने अभियान से जुड़े एनजीओ के अधिकारियों की जमकर क्लास ली। डीएम ने बताया कि जल्द ही सीडीओ के नेतृत्व में गांव-गांव जागरूकता का अभियान चलाया जाएगा।
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