फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   muzaffarnagar riots victims

‘असली’ दंगा पीड़ितों की मदद में फंसा पेंच

Wed, 30 Oct 2013 01:08 AM IST
कपिल कुमार/मुजफ्फरनगर
कपिल कुमार/मुजफ्फरनगर Updated Wed, 30 Oct 2013 01:08 AM IST
विज्ञापन
muzaffarnagar riots victims

शिविरों में रह रहे दंगा पीड़ित परिवारों के पुनर्वास के लिए पांच लाख के मुआवजे की सरकारी घोषणा के बाद इन शिविरों में अचानक चहल-पहल बढ़ गई है। लंबा वक्त गुजरने के बाद अपने गांव लौट गए कई परिवारों ने फिर से शिविरों का रुख किया तो तंबुओं की तादाद में भी एक बार फिर अच्छा-खासा इजाफा नजर आ रहा है।

विज्ञापन


मुआवजे के लिए दावेदारी ने जहां इन परिवारों को फिर से शरणार्थी बनने के लिए मजबूर किया है, वहीं इन हालात में ‘असली’ पीड़ितों की पहचान करना प्रशासन के लिए भी मुश्किल साबित होने जा रहा है। जाहिर है, मुआवजे के लिए सामूहिक कुनबे भी एकल परिवार में बंट गए हैं।
विज्ञापन


मुजफ्फरनगर दंगे के बाद बेकाबू हुए हालात में दबाव में आई अखिलेश सरकार का हर दांव उलटा ही साबित हुआ है। सरकार ने ‘डैमेज कंट्रोल’ के लिए खजाने का मुंह खोला, तो उसने नई मुश्किल ला खड़ी की है।
विज्ञापन
विज्ञापन


मृतक आश्रितों को 10-10 लाख और सरकारी नौकरी दी जा चुकी है। दंगे के बाद 42 राहत शिविरों में 41 हजार शरणार्थी पहुंच गए थे। प्रशासन की कोशिशें रंग लाती नजर आई और यह संख्या घटकर 7,732 हो गई।

इधर, दंगे पर सियासत भी जोर मारने लगी। संकट से घिरी सरकार ने विस्थापितों को बसाने के लिए 90 करोड़ खर्च करने का फैसला ले लिया। पांच लाख के मुआवजे की हालिया घोषणा के बाद कैंपों में शरणार्थियों की संख्या बढ़ती जा रही है। हर रोज नए तंबू खड़े हो जाते हैं।

मान-मनौवल के बाद जो पीड़ित गांव चले गए थे, अब वो भी शिविरों में लौट आए हैं। अकेले बसीकलां कैंप में जहां 30-35 तंबू थे, अब वहां 170 तंबुओं की बस्ती नजर आ रही है। यहां तक कि छतों पर भी तंबू लगे हैं। चूल्हों पर रोटियां सिक रही हैं और बच्चे उछल-कूद में मशगूल हैं। हर कोई नई उम्मीदों की आस में है।

सरकारी कर्मचारी पहुंचते हैं तो सब एकत्र होकर परिवारों के नाम और संख्या गिनाने लगते हैं। बहरहाल पीड़ितों को चेहरों पर मायूसी तो है, लेकिन पहले जैसा खौफ नहीं। कुटबा गांव के बुजुर्ग वकीलुद्दीन से बात हुई। बोले, चार बेटे शादीशुदा हैं। कैंप में चार तंबू मिले हैं। वापस लौटने के सवाल पर कहते हैं कहां जाएं? सब कुछ आग में जल गया।


हाजी नूर मोहम्मद कुछ पड़ोसियों के साथ कैंप के बाहर हुक्का गुड़गुड़ा रहे हैं। कहते हैं सरकार को बेघरों को जल्द बसाना चाहिए। सर्दी बढ़ने लगी है, तंबुओं में जीना मुश्किल है। बच्चे और महिलाएं बीमार पड़ रहे हैं। प्रशासन के लिए चुनौती यह भी है कि शिविरों में बढ़ गई संख्या में असली पीड़ितों कैसे पहचाना जाए।

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed