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क्रांतिकारियों के गांव से अमन का पैगाम
अवधेश पचौरी/बागपत
Updated Fri, 13 Sep 2013 08:33 AM IST
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क्रांतिकारियों के गांव के रूप में पहचान रखने वाला बसौद सांप्रदायिक तनाव के इस माहौल में अमन का पैगाम दे रहा है। जब कई गांवों में टकराव सामने आ रहे हैं, तब यहां हिंदू और मुस्लिम भाइयों की तरह रह रहे हैं।
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इस मुस्लिम बाहुल्य गांव ने प्रधान के चुनाव में भी भाईचारे का नारा बुलंद किया गया था। यहां जाट बिरादरी का सिर्फ एक परिवार है और डेढ़ हजार परिवारों वाले इस गांव में ग्राम प्रधान इस अकेले घर से हैं।
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मास्टर सत्तार बताते हैं कि गांव के शिव मंदिर की बुनियाद मुस्लिमों ने रखी थी। मंदिर पर कलश भी मुस्लिमों ने स्थापित किया।
मस्जिद बनाने में हिंदू भाइयों ने पूरा सहयोग किया। जब 1947 में गदर हुआ तो हिंदुओं ने मुस्लिमों और मुस्लिमों ने हिंदुओं को अपने घरों में शरण दी।
अब आज का नजारा देखिए। कई गांवों में एक-दूसरे समुदाय से डरकर लोग पलायन कर रहे हैं। बसौद में बृहस्पतिवार की दोपहर हिंदू-मुस्लिम साथ-साथ ताश खेलते हंसते नजर आए।
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यहां ऐसे भी उदाहरण हैं, जब मुस्लिमों की शादी में हिंदू ने दावत दी। ट्योढ़ी गांव में जाकर हिंदू बेटी के घर शादी में सत्तार ने भात भरा। गांव में जाट बिरादरी का सिर्फ एक परिवार है। इसी से सतीश चौधरी प्रधान हैं।
77 वर्षीय आत्माराम कहते हैं यहां हिंदू-मुस्लिम में कोई भेद न था, न है, और न कभी होगा। बाकी गांवों को भी ऐसा ही करना चाहिए, इसी में सबकी भलाई है।
60 साल के ओमपाल कहते हैं कि यहां कभी ऐसा नहीं लगा कि कौन किस कौम का है। 78 साल के अब्दुल कादिर कहते हैं कि हिंदू और मुस्लिम का भेद बसौद में नहीं होता, यहां तो सुबह से शाम तक एक साथ बैठकर हुक्का चलता है।