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दंगा: हमले इत्तेफाक थे या सुनियोजित?
अमर उजाला, मुजफ्फरनगर
Updated Wed, 25 Sep 2013 11:36 AM IST
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दंगे की तफ्तीश में कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आ रहे हैं। मसलन, कई गांवों में एकसाथ खून खराबा हुआ, ये इत्तेफाक था या कुछ और। कुछ ही देर में उन्माद की आग कैसे गांव-गांव तक पहुंच गई? हमले सुनियोजित थे या नहीं, यह भी पुलिस जांच का अहम हिस्सा है?
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नंगला मंदौड़ की पंचायत खत्म हुई तो एक घंटे के भीतर ही नफरत के शोले भड़कने लगे। सिखेड़ा थाने के निकट कांधला के इसरार की हत्या की भनक इर्द-गिर्द खड़ी पुलिस को भी नहीं लगी। यहीं पेट्रोल पंप पर एक एसपी की तैनाती थी, वो भी हत्या से अनजान थे।
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प्रशासन ने आनन-फानन में शव को उठाकर मामला रफा-दफा कर दिया। पंचायत की भीड़ लौटने लगी, तभी पहली खबर मीरापुर के मुझेड़ा से आई। यहां हमला कर पंचायत समर्थक बहसूमा के दो ग्रामीणों की हत्या कर दी गई।
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पुलिस उधर दौड़ी तो दूसरी खबर पुरबालियान से आई। यहां ट्रैक्टर-ट्रॉली सवार लोगों को घेरकर हमला किया गया। जिसमें काकड़ा और शोरम के चार की मौत हो चुकी है।
इसी बीच जौली गंगनहर पर खून-खराबा शुरू हो गया। इसमें दोनों तरफ से तीन-तीन लोगों की मौत हो गई। यहां पुलिस को खुद की जान के लाले पड़ गए। बुलंदशहर के एसपी क्राइम त्रिभुवन सिंह की खौफ से हालत ऐसी बिगड़ी कि अभी तक हॉस्पिटल में हैं।
बसधाड़ा में भी लौटते लोगों पर फायरिंग की गई। यह सभी हमले वहां हुए, जहां एक समुदाय की बहुलता है और पंचायत में गए लोगों को उधर से गुजरना था। जांच का बिंदु यह भी है कि सभी जगह एक ही समय पर और एक ही तरीके से हमले कैसे हुए। क्या ये इत्तेफाक था या फिर सुनियोजित हमलों की साजिश रची गई?
ऐसा ही सात सितंबर के हमलों के बाद हुआ। अगली सुबह ऐसी खबर फैली कि कई गांवों में मारकाट मच गई। यह इलाका बहुसंख्यक आबादी का है। शाहपुर के कुटबा में आठ लोग मारे गए।
उन्माद बढ़ता गया और बहावड़ी, लिसाढ़, लांक, मोहम्मदपुर राय सिंह, खरड़ और अटाली आदि में दर्जनों जिंदगियां हिंसा की भेंट चढ़ गईं। बस्तियां राख में तब्दील हो गईं और 50 हजार लोग भागकर शरणार्थी शिविरों में पहुंच गए।
जांच का यह भी पहलू है कि इन गांवों में एकसाथ कैसे दंगाइयों ने कहर बरपाया। सर्विलांस के जरिए जुटाए गए तथ्य साजिश को बेनकाब करने में अहम साबित हो सकते हैं।
अफवाहों ने भी बिगाड़ा माहौल
जौली की घटना के तथ्य बेहद उलझे हुए हैं। घायल प्रत्यक्षदर्शी हमले को सुनियोजित बताते हैं, जबकि दूसरे पक्ष का कहना है कि पंचायत से लौटते लोगों ने खेड़ी के दो लोगों की हत्या की, तभी बवाल भड़का। अफवाह उड़ गई कि कई लाशें नहर में फेंक दी गईं, लेकिन नहर बंद होने के बाद भी कोई लाश नहीं मिली।