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इच्छा शक्ति के बल पर कुछ कर गुजरने के जज्बे से दें दिव्यांगता को मात

Moradabad  Bureau मुरादाबाद ब्यूरो
Updated Fri, 03 Dec 2021 12:39 AM IST
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Overcome disability with the spirit of doing something on the strength of will power
मुरादाबाद। जिले में कई ऐसे दिव्यांग हैं, जिन्होंने इसे अपनी कमजोरी नहीं मानी। मेहनत, लगन और कुछ सीखने व कर दिखाने के जज्बे ने दिव्यांगता को अपने ऊपर हावी होने नहीं दिया। लोगों की दया के पात्र बनने के बजाय खुद को इतना अधिक मजबूत किया कि आज न सिर्फ वह खुद रोजगार कर रहे हैं, बल्कि अन्य दिव्यांग ही नहीं, सामान्य लोगों को भी रोजगार व उसके अवसर प्रदान कर मिसाल बन रहे हैं।
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खुद दिव्यांग, पांच सलामत लोगों को दे रहे रोजगार
मुरादाबाद। डिलारी विकास खंड की ग्राम पंचायत चंदुपुरा गुलड़िया निवासी ओमपाल यादव 70 फीसदी दिव्यांग हैं। गांव में कक्षा पांच तक की शिक्षा पूरी की, लेकिन आगे की पढ़ाई नहीं कर सके। बचपन में तमाम बच्चे उन्हें चिढ़ाते भी रहे पर परवाह नहीं की। 45 वर्षीय ओमपाल ने बताया कि 15 साल की उम्र में जब पिता का सिर से साया उठ गया, तो उसके बाद से ही उन्होंने ठान लिया कि अब वह आगे का जीवन किसी पर आश्रित रह कर नहीं गुजारेंगे। इसके बाद पड़ोस के ग्राम करनपुर में एक टेलर के यहां रह कर टेलरिंग का काम सीखा। तीन साल की मेहनत के बाद वह खुद कारीगर हो गए। कारीगरी से एकत्र धनराशि से मशीन खरीदी और दुकान किराये की ली। अब करनपुर में दर्जी हैं। साथ में टेंट हाउस का भी व्यवसाय कर रहे हैं। अब वह पांच सामान्य लोगों को भी रोजगार दे रहे हैं।
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विदेश तक जाता है दिव्यांग कासिम का बफ
मुरादाबाद। दिव्यांग शहर निवासी कासिम के हाथ से तैयार बफ पीतलनगरी में तैयार पीतल के सामानों को चमक तो देते ही हैं, उनके हाथ से तैयार बफ की विदेशों में भी अब डिमांड होने लगी है। खुद के साथ दो अन्य दिव्यांगों को भी रोजगार दे रहे हैं।
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जामा मस्जिद निवासी बफ कारीगर मोहम्मद नजाकत के दो बेटों में छोटे कासिम डेढ़ साल की उम्र में आए बुखार के बाद पैरों से दिव्यांग हो गए, पर हिम्मत नहीं हारी। बैसाखी के सहारे शहर में ही बीए तक शिक्षा ग्रहण की। वह चाहते थे कि कोई सरकारी नौकरी मिल जाए। इसके लिए वह जद्दोजहद कर रहे थे। मौका मिलने पर पिता की दुकान जाकर हाथ भी बंटाते थे। दो साल पहले पिता का इंतकाल हुआ तो दुकान की सारी जिम्मेदारी कासिम पर ही आ गई। कुछ ही दिन के मेहनत में वह भी बफ के अच्छे कारीगर बन गए। अब उनके द्वारा तैयार बफ सिर्फ मुरादाबाद और आसपास के जिलों में ही नहीं जाता, बल्कि नेपाल, भूटान तक में उनके वह बफ सप्लाई कर रहे हैं। वह अपने साथ दो अन्य दिव्यांगों नवाब और अनवर हुसैन को भी रोजगार दे रहे हैं, जबकि अप्रत्यक्ष रूप से कई अन्य सामान्य लोग भी रोजगार पा रहे हैं। उनकी दिव्यांग पत्नी भी हाथ बंटाती है। दो छोटे बच्चे भी हैं।
दिव्यांग बच्चों को नि:शुल्क कंप्यूटर सिखा रहीं नजमा
मुरादाबाद। दिव्यांग नजमा ने न सिर्फ खुद पर दिव्यांगता को मात देकर कंप्यूटर, ब्यूटीशियन आदि की शिक्षा ग्रहण की, बल्कि अब वह पिछले कई सालों से इसकी कोचिंग भी लड़कियों को कराती हैं। इसमें वह दिव्यांग बच्चों को निशुल्क शिक्षा दे रही हैं।

झब्बू के नाला निवासी मोहम्मद नसीम के दो बेटी व एक बेटे में बड़ी नजमा बचपन से ही दोनों पैरों से दिव्यांग हैं। मजदूरी पेशा नसीम चाहते थे कि उनकी बेटी पढ़ लिख कर कुछ आगे बढ़े। हाईस्कूल तक नजमा ने शिक्षा ग्रहण की, लेकिन आगे की पढ़ाई वह नहीं करा सके, तब नजमा ने महिला पॉलीटेक्निक से कटिंग एंड टेलरिंग का कोर्स किया। फिर कौशल विकास प्रशिक्षण के जरिये ब्यूटीशियन का कोर्स किया। दस साल पहले पिता का सिर से साया उठ गया। तीन साल पहले कंप्यूटर का कोर्स किया। भाई छोटा है। छोटी बहन की शादी हो चुकी है। 40 वर्षीय नजमा अब अपने इस हुनर से अन्य दिव्यांग बच्चों की जिंदगी में उजियारा ला रही हैं। वर्ष 2008 में उन्होंने एक एनजीओ का गठन किया। उसके माध्यम से वह कटिंग एंड टेलरिंग, ब्यूटीशियन और कंप्यूटर का प्रशिक्षण प्रदान करती हैं। तीनों कोर्स में वर्तमान में करीब 45 बच्चे शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। इसमें 10 दिव्यांग बच्चे भी शामिल हैं। दिव्यांग बच्चे और बच्चियों से वह किसी तरह का कोई शुल्क नहीं लेती हैं। उनका कहना है कि अगर उन्हें सरकार मदद करे तो वह जिले के सभी दिव्यांगों को रोजगार के अवसर प्रदान करना चाहती हैं।
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