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1857 में 15 मई को गागन नदी के तट पर हुआ था भीषण संग्राम
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मुरादाबाद। जंग-ए-आजादी में मुरादाबाद का इतिहास गौरवशाली रहा है। भारत का पहला स्वाधीनता संग्राम, जिसकी पहली चिंगारी 10 मई को मेरठ से उठी थी। वह आज ही के दिन यानी 15 मई को मुरादाबाद में शोला बन गई थी। यहां गांगन नदी के तट पर क्रांतिकारियों और अंग्रेजों के बीच भीषण लड़ाई लड़ी गई। माना कि यहां अंग्रेज क्रांतिकारियों पर भारी पड़ गए थे, लेकिन तीन दिन बाद ही क्रांतिकारियों ने फिर से हुंकार भरी थी और नवाब मज्जू खां के नेतृत्व में अंग्रेजों को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया था।
बात 10 मई 1857 की है, कुछ क्रांतिकारी सैनिक मेरठ से मुरादाबाद की ओर बढ़ते हुए 15 मई को गांगन नदी तक पहुंच गए थे। मुरादाबाद में अंग्रेज सेना भी पूरी तरह तैयार थी और सूचना मिलते ही जेसी विल्सन, डा. के नन सेना सहित गांगन नदी पर पहुंच गए थे। यहां क्रांतिकारियों और अंग्रेजों के बीच भीषण युद्ध हुआ था। इसमें एक क्रांतिकारी शहीद हो गया था, आठ बंदी बना लिए गए थे। क्रांतिकारियों को यहां हार का सामना करना पड़ा था, कई क्रांतिकारी स्थानीय लोगों की मदद से बच गए थे। उनके पास मुजफ्फरनगर के सरकारी खजाने से लूटा गया काफी रुपया भी था। जेसी विल्सन ने हाथियों पर लदवाकर वह रुपया सेंडर्स के साथ मेरठ भिजवा दिया था।
संसार सिंह ने हिंदुस्तानी सैनिकों को एकत्र कर जेल पर किया था हमला
हार का सामना करने के बाद भी क्रांतिकारियों का हौसला कम नहीं हुआ था। तीन दिन बाद ही 19 मई को पांच क्रांतिकारी सैनिक अंग्रेजों की मुरादाबाद छावनी में घुस गए थे, लेकिन वह अपने उद्देश्य में सफल नहीं हो सके थे। इनमें से एक को गोली मार दी गई थी और तीन पकड़े गए थे, जबकि एक क्रांतिकारी बच गया था। मरने वाला क्रांतिकारी यहां अंग्रेज सेना में शामिल संसार सिंह का साला था। इस घटना से संसार सिंह के अंदर भी विद्रोह की ज्वाला धधकने लगी थी। उन्होंने तमाम सैनिकों को एकत्र कर जेल पर हमला बोल दिया था। यह देख जेल गार्ड ने समस्त बंदियों को छोड़ दिया था। इसके बाद यहां क्रांति की आग चारों ओर फैल गई थी।
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31 मई को फिर हुआ था युद्ध, शहादत देकर अंग्रेजों को खदेड़ा
रामगंगा नदी के किनारे अंग्रेजी सेना और क्रांतिकारियों में कई घंटे युद्ध हुआ था। क्रांतिकारियों ने कई अंग्रेज सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया था तो वहीं क्रांतिकारियों का नेतृत्व कर रहे मौलवी मन्नू भी अंग्रेजों की गोली से शहीद हो गए थे। इसके बाद मुरादाबाद में क्रांति की कमान नवाब मज्जू खां के हाथ में आ गई थी। उनके नेतृत्व में दो जून को क्रांतिकारियों ने सरकारी खजाना लूट लिया था और अंग्रेजों को शहर से खदेड़ दिया था। अंग्रेजों ने मुरादाबाद छोड़ दिया था, लेकिन रामपुर के नवाब से मुरादाबाद पर कब्जा करने के लिए कहा था। रामपुर के नवाब ने चार जून को अपने चाचा अब्दुल वली खां को सेना सहित मुरादाबाद पर कब्जा करने के लिए भेजा पर वह सफल न हो सका था। क्रांतिकारियों ने उनके चालीस सैनिक मार गिराए थे। बाद में नवाब मज्जू खां और रामपुर नवाब में संधि हो गई थी।
एक साल बाद फिर लौटे थे अंग्रेज, गोली लगने से नवाब मज्जू खां हुए थे शहीद
25 अप्रैल 1858 को ब्रिगेडियर जोंस सेना सहित मुरादाबाद पहुंचा था। इसके बाद अंग्रेजों ने क्रूरतापूर्वक क्रांति का दमन किया था। क्रांतिकारियों को बेरहमी से फांसी पर लटका दिया गया था। नवाब मज्जू खां को भी गोली मार दी गई थी और उनकी लाश को हाथी के पैरों से बांधकर शहर में घुमा कर चूने की भट्टी में डाल दिया गया था। 30 अप्रैल को जिला फिर से अंग्रेजों के अधिकार में आ गया था। वहीं क्रांति के दमन में जिन लोगों ने अंग्रेजों का साथ दिया था, उन्हें जागीरें, पद व पुरस्कार प्रदान किए गए थे।
शहादत का गवाह है मोहल्ला गलशहीद में खड़ा इमली का पेड़
गलशहीद में इमली का पेड़ तमाम क्रांतिकारियों की शहादत का गवाह बनकर आज भी खड़ा है। अंग्रेजों ने नवाब मज्जू खां की लाश को इसी पेड़ से लटका दिया था। इसकेे अलावा भी सैकड़ों क्रांतिकारियों की लाशों को इस पेड़ पर लटकाया गया था। उनके शवों को उतारने वालों को गोली मार दी गई थी। क्रांतिकारियों की शहादत के बाद से ही इस जगह का नाम गलशहीद पड़ गया थी। यहां स्थित नवाब मज्जू खां की मजार से स्थानीय लोगों का बेहद जुड़ाव है। मजार की देखरेख व संरक्षण को लिए लोग हमेशा प्रयासरत रहते हैं।
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बात 10 मई 1857 की है, कुछ क्रांतिकारी सैनिक मेरठ से मुरादाबाद की ओर बढ़ते हुए 15 मई को गांगन नदी तक पहुंच गए थे। मुरादाबाद में अंग्रेज सेना भी पूरी तरह तैयार थी और सूचना मिलते ही जेसी विल्सन, डा. के नन सेना सहित गांगन नदी पर पहुंच गए थे। यहां क्रांतिकारियों और अंग्रेजों के बीच भीषण युद्ध हुआ था। इसमें एक क्रांतिकारी शहीद हो गया था, आठ बंदी बना लिए गए थे। क्रांतिकारियों को यहां हार का सामना करना पड़ा था, कई क्रांतिकारी स्थानीय लोगों की मदद से बच गए थे। उनके पास मुजफ्फरनगर के सरकारी खजाने से लूटा गया काफी रुपया भी था। जेसी विल्सन ने हाथियों पर लदवाकर वह रुपया सेंडर्स के साथ मेरठ भिजवा दिया था।
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संसार सिंह ने हिंदुस्तानी सैनिकों को एकत्र कर जेल पर किया था हमला
हार का सामना करने के बाद भी क्रांतिकारियों का हौसला कम नहीं हुआ था। तीन दिन बाद ही 19 मई को पांच क्रांतिकारी सैनिक अंग्रेजों की मुरादाबाद छावनी में घुस गए थे, लेकिन वह अपने उद्देश्य में सफल नहीं हो सके थे। इनमें से एक को गोली मार दी गई थी और तीन पकड़े गए थे, जबकि एक क्रांतिकारी बच गया था। मरने वाला क्रांतिकारी यहां अंग्रेज सेना में शामिल संसार सिंह का साला था। इस घटना से संसार सिंह के अंदर भी विद्रोह की ज्वाला धधकने लगी थी। उन्होंने तमाम सैनिकों को एकत्र कर जेल पर हमला बोल दिया था। यह देख जेल गार्ड ने समस्त बंदियों को छोड़ दिया था। इसके बाद यहां क्रांति की आग चारों ओर फैल गई थी।
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31 मई को फिर हुआ था युद्ध, शहादत देकर अंग्रेजों को खदेड़ा
रामगंगा नदी के किनारे अंग्रेजी सेना और क्रांतिकारियों में कई घंटे युद्ध हुआ था। क्रांतिकारियों ने कई अंग्रेज सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया था तो वहीं क्रांतिकारियों का नेतृत्व कर रहे मौलवी मन्नू भी अंग्रेजों की गोली से शहीद हो गए थे। इसके बाद मुरादाबाद में क्रांति की कमान नवाब मज्जू खां के हाथ में आ गई थी। उनके नेतृत्व में दो जून को क्रांतिकारियों ने सरकारी खजाना लूट लिया था और अंग्रेजों को शहर से खदेड़ दिया था। अंग्रेजों ने मुरादाबाद छोड़ दिया था, लेकिन रामपुर के नवाब से मुरादाबाद पर कब्जा करने के लिए कहा था। रामपुर के नवाब ने चार जून को अपने चाचा अब्दुल वली खां को सेना सहित मुरादाबाद पर कब्जा करने के लिए भेजा पर वह सफल न हो सका था। क्रांतिकारियों ने उनके चालीस सैनिक मार गिराए थे। बाद में नवाब मज्जू खां और रामपुर नवाब में संधि हो गई थी।
एक साल बाद फिर लौटे थे अंग्रेज, गोली लगने से नवाब मज्जू खां हुए थे शहीद
25 अप्रैल 1858 को ब्रिगेडियर जोंस सेना सहित मुरादाबाद पहुंचा था। इसके बाद अंग्रेजों ने क्रूरतापूर्वक क्रांति का दमन किया था। क्रांतिकारियों को बेरहमी से फांसी पर लटका दिया गया था। नवाब मज्जू खां को भी गोली मार दी गई थी और उनकी लाश को हाथी के पैरों से बांधकर शहर में घुमा कर चूने की भट्टी में डाल दिया गया था। 30 अप्रैल को जिला फिर से अंग्रेजों के अधिकार में आ गया था। वहीं क्रांति के दमन में जिन लोगों ने अंग्रेजों का साथ दिया था, उन्हें जागीरें, पद व पुरस्कार प्रदान किए गए थे।
शहादत का गवाह है मोहल्ला गलशहीद में खड़ा इमली का पेड़
गलशहीद में इमली का पेड़ तमाम क्रांतिकारियों की शहादत का गवाह बनकर आज भी खड़ा है। अंग्रेजों ने नवाब मज्जू खां की लाश को इसी पेड़ से लटका दिया था। इसकेे अलावा भी सैकड़ों क्रांतिकारियों की लाशों को इस पेड़ पर लटकाया गया था। उनके शवों को उतारने वालों को गोली मार दी गई थी। क्रांतिकारियों की शहादत के बाद से ही इस जगह का नाम गलशहीद पड़ गया थी। यहां स्थित नवाब मज्जू खां की मजार से स्थानीय लोगों का बेहद जुड़ाव है। मजार की देखरेख व संरक्षण को लिए लोग हमेशा प्रयासरत रहते हैं।