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संघर्षों के सफर में दो भाइयों ने हर कदम पर मिलीं चुनौतियां को किया पार
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यूक्रेन में फंसे दो सगे भाई भी सारी बाधाओं को पार कर सोमवार को अपने घर लौट आए। भाइयों के लौटने से परिवार में खुशियां छा गईं। अधिकारियों के मुताबिक यूक्रेन से छात्रों सहित 63 लोगों में अभी तक 54 लोग वापस आ गए हैं। केंद्र सरकार की ओर से नौ लोगों की वापसी के लिए प्रयास किए जा रहे हैं। सभी यूक्रेन में सुरक्षित हैं।
लालबाग निवासी मोहम्मद अरीब और मोहम्मद फाइक ने वतन वापसी के लिए संघर्षों से भरे सफर में हर कदम पर मिली चुनौतियों को पार किया। मोहम्मद फाइक ने बताया कि विनित्सिया में एमबीबीएस के छात्र हैं। 24 फरवरी को मिसाइल का धमाका सुनकर जगे थे। उनके पास दो सप्ताह का राशन था, इसलिए खाने के लिए परेशानी नहीं हुई। जैसे ही सायरन बजता था वह बंकर में चले जाते थे। दोनों भाई दो मार्च को विनित्सिया से देश लौटने के लिए स्टेशन पर पहुंचे। ट्रेन कीव से आ रही थी। ट्रेन में ज्यादातर छात्र ही थे। स्टेशन पर ट्रेन का किसी ने गेट नहीं खोला। इसके बाद वह लौट आए। दूसरे दिन बस से वापसी के लिए वह निकले, लेकिन बस खराब हो गई। तीसरे दिन फिर वह बस से आए। चालक रास्ते में रांग साइड से बस चला रहा था। इसलिए लोग आक्रोशित हो गए और बस पर बोतलें फेंकने लगे। मौके पर पुलिस आ गई और उसने बस का चालान काट दिया। इससे नाराज चालक छात्रों को स्टेशन पर उतारकर चला गया। वहां आठ घंटे इंतजार किया। फिर एक स्थानीय नागरिक से मदद मांगी। उसने अपनी गाड़ी से नि:शुल्क छात्रों को हंगरी बॉर्डर पर पहुंचाया। बॉर्डर पार करने के बाद भारतीय दूतावास के अधिकारियों को फोन किया, लेकिन मदद नहीं मिली। हंगरी की पुलिस ने स्टेशन पहुंचाया। इसके बाद वह शेल्टर होम पहुंचे। वहां पर केंद्रीय मंत्री हरदीप पुरी मिले। फाइक ने बताया कि बुडापेस्ट से उन्हें भारत के लिए फ्लाइट मिली। सोमवार को पहले मुंबई और फिर दिल्ली एयरपोर्ट पहुंचे, जहां उनके पिता डॉ. मोहम्मद सादिक मिले। पिता से मिलकर कुछ पल के लिए सफर के संघर्ष को भी भूल गए। फाइक ने यूक्रेन में रह रहे मुरादाबाद के ज्ञानपुर निवासी विजयपाल सिंह का आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि विजयपाल सिंह ने देश लौटने में बहुत मदद की। दिन में दो से तीन बार फोन कर हाल पूछते थे और परेशानियों से निकलने का रास्ता भी बताते थे।
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लालबाग निवासी मोहम्मद अरीब और मोहम्मद फाइक ने वतन वापसी के लिए संघर्षों से भरे सफर में हर कदम पर मिली चुनौतियों को पार किया। मोहम्मद फाइक ने बताया कि विनित्सिया में एमबीबीएस के छात्र हैं। 24 फरवरी को मिसाइल का धमाका सुनकर जगे थे। उनके पास दो सप्ताह का राशन था, इसलिए खाने के लिए परेशानी नहीं हुई। जैसे ही सायरन बजता था वह बंकर में चले जाते थे। दोनों भाई दो मार्च को विनित्सिया से देश लौटने के लिए स्टेशन पर पहुंचे। ट्रेन कीव से आ रही थी। ट्रेन में ज्यादातर छात्र ही थे। स्टेशन पर ट्रेन का किसी ने गेट नहीं खोला। इसके बाद वह लौट आए। दूसरे दिन बस से वापसी के लिए वह निकले, लेकिन बस खराब हो गई। तीसरे दिन फिर वह बस से आए। चालक रास्ते में रांग साइड से बस चला रहा था। इसलिए लोग आक्रोशित हो गए और बस पर बोतलें फेंकने लगे। मौके पर पुलिस आ गई और उसने बस का चालान काट दिया। इससे नाराज चालक छात्रों को स्टेशन पर उतारकर चला गया। वहां आठ घंटे इंतजार किया। फिर एक स्थानीय नागरिक से मदद मांगी। उसने अपनी गाड़ी से नि:शुल्क छात्रों को हंगरी बॉर्डर पर पहुंचाया। बॉर्डर पार करने के बाद भारतीय दूतावास के अधिकारियों को फोन किया, लेकिन मदद नहीं मिली। हंगरी की पुलिस ने स्टेशन पहुंचाया। इसके बाद वह शेल्टर होम पहुंचे। वहां पर केंद्रीय मंत्री हरदीप पुरी मिले। फाइक ने बताया कि बुडापेस्ट से उन्हें भारत के लिए फ्लाइट मिली। सोमवार को पहले मुंबई और फिर दिल्ली एयरपोर्ट पहुंचे, जहां उनके पिता डॉ. मोहम्मद सादिक मिले। पिता से मिलकर कुछ पल के लिए सफर के संघर्ष को भी भूल गए। फाइक ने यूक्रेन में रह रहे मुरादाबाद के ज्ञानपुर निवासी विजयपाल सिंह का आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि विजयपाल सिंह ने देश लौटने में बहुत मदद की। दिन में दो से तीन बार फोन कर हाल पूछते थे और परेशानियों से निकलने का रास्ता भी बताते थे।
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