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इकराम ने छीना शमीमुल से विधायकी का हक
ब्यूरो/अमर उजाला/मुरादाबाद
Updated Sun, 12 Mar 2017 03:31 AM IST
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सपा के हाजी इकराम कुरैशी ने पीपलसाना के हक परिवार से इस बार विधायकी छीन ली। इस सीट पर हक परिवार से ही छह बार विधायक रहे हैं और पिछले पंद्रह साल से लगातार कब्जा रहा है।
हाजी इकराम कुरैशी पहली बार चुनाव मैदान में उतरे और उन्होंने रिकार्ड वोटों से जीत भी दर्ज कर ली है। मुरादाबाद देहात सीट पर हाजी रिजवानुलहक 1985 से 1991 तक तीन बार एमएलए रहे थे। उनके इंतकाल के बाद उनके बेटे उस्मानुलकहक ने 2002 में विधान सभा का चुनाव लड़ने की इच्छा जाहिर की थी।
लेकिन तब उस्मानुलहक की उम्र कम थी। लिहाजा उन्होंने अपने चाचा शमीमुलहक को कांग्रेस के टिकट पर विधान सभा चुनाव लड़ाया और उन्होंने रिकार्ड वोटों से जीत दर्ज की थी। 2007 में उस्मानुलक मुरादाबाद देहात सीट से सपा के टिकट पर चुनाव मैदान में उतरे और जीत भी हासिल कर ली।
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विधायक बनने के बाद ही उन्हें अदालत से हत्या के मामले में उम्रकैद की सजा हो गई थी। इसके बाद उन्होंने 2012 में फिर से अपने चाचा शमीमुलक को सपा के टिकट पर चुनाव लड़ाया। शमीमुलहक जीतकर विधान सभा में पहुंच गए। लेकिन पूर्व विधायक उस्मानुलक सलाखों से बाहर नहीं आ पाए।
पूर्व विधायक अपने भाई कामरानुलक को सपा के टिकट पर चुनाव लड़ाना चाहते थे। लेकिन समाजवादी कुनबे में विवाद शुरू हो गया। इसके बाद पहले सौलत अली को देहात सीट से टिकट दिया गया।
लेकिन बाद में अखिलेश यादव ने हाजी इकराम कुरैशी को इस सीट से लड़ाने का ऐलान किया। तब सलाखों में बंद पूर्व विधायक ने अपने भाई कामरानुलक को रालोद से टिकट दिलवाया उसे चुनाव मैदान में उतार दिया। लेकिन कामरानुलहक जीत दर्ज नहीं कर पाए।
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हाजी इकराम कुरैशी पहली बार चुनाव मैदान में उतरे और उन्होंने रिकार्ड वोटों से जीत भी दर्ज कर ली है। मुरादाबाद देहात सीट पर हाजी रिजवानुलहक 1985 से 1991 तक तीन बार एमएलए रहे थे। उनके इंतकाल के बाद उनके बेटे उस्मानुलकहक ने 2002 में विधान सभा का चुनाव लड़ने की इच्छा जाहिर की थी।
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लेकिन तब उस्मानुलहक की उम्र कम थी। लिहाजा उन्होंने अपने चाचा शमीमुलहक को कांग्रेस के टिकट पर विधान सभा चुनाव लड़ाया और उन्होंने रिकार्ड वोटों से जीत दर्ज की थी। 2007 में उस्मानुलक मुरादाबाद देहात सीट से सपा के टिकट पर चुनाव मैदान में उतरे और जीत भी हासिल कर ली।
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विधायक बनने के बाद ही उन्हें अदालत से हत्या के मामले में उम्रकैद की सजा हो गई थी। इसके बाद उन्होंने 2012 में फिर से अपने चाचा शमीमुलक को सपा के टिकट पर चुनाव लड़ाया। शमीमुलहक जीतकर विधान सभा में पहुंच गए। लेकिन पूर्व विधायक उस्मानुलक सलाखों से बाहर नहीं आ पाए।
पूर्व विधायक अपने भाई कामरानुलक को सपा के टिकट पर चुनाव लड़ाना चाहते थे। लेकिन समाजवादी कुनबे में विवाद शुरू हो गया। इसके बाद पहले सौलत अली को देहात सीट से टिकट दिया गया।
लेकिन बाद में अखिलेश यादव ने हाजी इकराम कुरैशी को इस सीट से लड़ाने का ऐलान किया। तब सलाखों में बंद पूर्व विधायक ने अपने भाई कामरानुलक को रालोद से टिकट दिलवाया उसे चुनाव मैदान में उतार दिया। लेकिन कामरानुलहक जीत दर्ज नहीं कर पाए।