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वर्चुअल वर्ल्ड की दुनिया में खो रहे बच्चे
ब्यूरो/अमर उजाला/मुरादाबाद
Updated Mon, 27 Jun 2016 11:14 AM IST
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वर्चुअल वर्ल्ड
- फोटो : demo
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घर पर मेहमान आए हुए हैं। रसोई में काम करते हुए मम्मी ने बेटे को आवाज लगाई कि बेटा जरा हेल्प कर दो। मम्मी के पास आकर बेटा कहता है आप कुछ करने नहीं देतीं। मैं नोविता की तरह गैजेट बनाऊंगा जिससे वो हर समय तुम्हारे साथ रहे और काम निपटा सके। ये एक उदाहरण कि कैसे बच्चों के दिमाग पर कार्टून कैरेक्टर हावी हो रहे हैं।
आजकल कार्टून देखकर देखकर बच्चे उठते बैठते, सोते जागते, खाते पीते उसी दुनिया में जी रहे हैं। एक सीमा तक तो बच्चों को अपनी काल्पनिक दुनिया में जीना ठीक है, लेकिन ज्यादा होने पर ये उन्हें बीमारी की ओर से ले जाता है।
गर्मियों की छुट्टियां बच्चों के लिए लाटरी के समान होती हैं। इन दिनों में पढ़ाई के अलावा खेलकूद, धमा चौकड़ी, मौज मस्ती ही है। खेलने और टीवी पर कार्टून देखने में ही दिन बीत जाता है। कार्टून के कैरेक्टरों की हीरोपंती उनके दिल और दिमाग में बैठने लगती है या यूं कहें कि हावी हो जाती है।
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बच्चे अपने मनपसंद कैरेक्टर के रूप में खुद को देखने लगते हैं। उसकी तरह बोल चाल और व्यवहार भी हो जाता है। हर काम को चुटकी बजाते ही करना ही उनका मकसद हो जाता है। वे हर समय एक काल्पनिक दुनिया में जीने लगते हैं। जो उनके लिए नुकसानदायक होता है।
करियर में बनता है रोड़ा
डा. नीरज गुप्ता कहते हैं कि इस प्रकार की दुनिया को वर्चुअल वर्ल्ड कहा जाता है। ऐसा उन बच्चों के साथ होता है जिन्हें परिवार में इमोशनल टच कम मिलता है। बच्चा न्यूक्लियर फैमिली से हो। वह वर्चुअल वर्ल्ड में अपनी दुनिया बनाता और उसमें इमोशनल टच खोजता है। जिससे ये कार्टून उसके दिमाग पर हावी होने लगते हैं। बड़े होने के साथ इससे छुटकारा तो पाते हैं, लेकिन इमोशनली कमजोर होने लगते है।
यह स्थिति भविष्य में भी परेशान करती है। किसी भी क्षेत्र में पिछड़ने पर नकारात्मक विचार उन पर हावी होने लगते हैं और किसी का छोटे से छोटा कमेंट भी उन्हें नागवार गुजरता है। छोटी छोटी बात पर रिएक्ट करने के साथ ही एग्रेसिव व्यवहार करते हैं। यह उनके करियर के लिहाज से भी घातक है। पिछले सात आठ सालों में इस प्रकार के केस बढ़े हैं। इसमें बच्चों के साथ अभिभावकों की काउंसिलिंग जरूरी होती है।
क्या है लक्षण
- सभी से अलग थलग रहना
- हर समय टीवी पर कार्टून देखने की जिद करना या फिर मोबाइल पर गेम खेलना।
- टोकने पर उल्टे जवाब देना।
- व्यवहार एग्रेसिव होना और बहुत जल्दी आपा खोना और गुस्सा करना।
- कुछ नया करने में रुचि नहीं दिखाना, मौैका पड़ने पर पीछे हटना
- एक्रागता की कमी और यादाश्त कमजोर होना।
- बात करने के तरीके में बनावटीपन और किसी कैरेक्टर की नकल करना।
अपनी जिम्मेदारी समझे अभिभावक
मुरादाबाद। आजकल माता पिता की जिम्मेदारी बढ़ जाती है। खासकर उन परिवारों में जहां माता पिता दोनों ही वर्किंग हों। समय न होने का बहाना नहीं किया जा सकता। बच्चों को हर हाल में समय देना होगा। बच्चा भी उनसे अपेक्षाएं रखता है। सभी अपेक्षाएं पूरी नहीं हो सकती, लेकिन कुछ को पूरा किया जा सकता है। इससे बच्चा का आत्मविश्वास बढ़ता है और क्रिएटिव कार्यों के प्रति उसका लगाव बढ़ता है।
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आजकल कार्टून देखकर देखकर बच्चे उठते बैठते, सोते जागते, खाते पीते उसी दुनिया में जी रहे हैं। एक सीमा तक तो बच्चों को अपनी काल्पनिक दुनिया में जीना ठीक है, लेकिन ज्यादा होने पर ये उन्हें बीमारी की ओर से ले जाता है।
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गर्मियों की छुट्टियां बच्चों के लिए लाटरी के समान होती हैं। इन दिनों में पढ़ाई के अलावा खेलकूद, धमा चौकड़ी, मौज मस्ती ही है। खेलने और टीवी पर कार्टून देखने में ही दिन बीत जाता है। कार्टून के कैरेक्टरों की हीरोपंती उनके दिल और दिमाग में बैठने लगती है या यूं कहें कि हावी हो जाती है।
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बच्चे अपने मनपसंद कैरेक्टर के रूप में खुद को देखने लगते हैं। उसकी तरह बोल चाल और व्यवहार भी हो जाता है। हर काम को चुटकी बजाते ही करना ही उनका मकसद हो जाता है। वे हर समय एक काल्पनिक दुनिया में जीने लगते हैं। जो उनके लिए नुकसानदायक होता है।
करियर में बनता है रोड़ा
डा. नीरज गुप्ता कहते हैं कि इस प्रकार की दुनिया को वर्चुअल वर्ल्ड कहा जाता है। ऐसा उन बच्चों के साथ होता है जिन्हें परिवार में इमोशनल टच कम मिलता है। बच्चा न्यूक्लियर फैमिली से हो। वह वर्चुअल वर्ल्ड में अपनी दुनिया बनाता और उसमें इमोशनल टच खोजता है। जिससे ये कार्टून उसके दिमाग पर हावी होने लगते हैं। बड़े होने के साथ इससे छुटकारा तो पाते हैं, लेकिन इमोशनली कमजोर होने लगते है।
यह स्थिति भविष्य में भी परेशान करती है। किसी भी क्षेत्र में पिछड़ने पर नकारात्मक विचार उन पर हावी होने लगते हैं और किसी का छोटे से छोटा कमेंट भी उन्हें नागवार गुजरता है। छोटी छोटी बात पर रिएक्ट करने के साथ ही एग्रेसिव व्यवहार करते हैं। यह उनके करियर के लिहाज से भी घातक है। पिछले सात आठ सालों में इस प्रकार के केस बढ़े हैं। इसमें बच्चों के साथ अभिभावकों की काउंसिलिंग जरूरी होती है।
क्या है लक्षण
- सभी से अलग थलग रहना
- हर समय टीवी पर कार्टून देखने की जिद करना या फिर मोबाइल पर गेम खेलना।
- टोकने पर उल्टे जवाब देना।
- व्यवहार एग्रेसिव होना और बहुत जल्दी आपा खोना और गुस्सा करना।
- कुछ नया करने में रुचि नहीं दिखाना, मौैका पड़ने पर पीछे हटना
- एक्रागता की कमी और यादाश्त कमजोर होना।
- बात करने के तरीके में बनावटीपन और किसी कैरेक्टर की नकल करना।
अपनी जिम्मेदारी समझे अभिभावक
मुरादाबाद। आजकल माता पिता की जिम्मेदारी बढ़ जाती है। खासकर उन परिवारों में जहां माता पिता दोनों ही वर्किंग हों। समय न होने का बहाना नहीं किया जा सकता। बच्चों को हर हाल में समय देना होगा। बच्चा भी उनसे अपेक्षाएं रखता है। सभी अपेक्षाएं पूरी नहीं हो सकती, लेकिन कुछ को पूरा किया जा सकता है। इससे बच्चा का आत्मविश्वास बढ़ता है और क्रिएटिव कार्यों के प्रति उसका लगाव बढ़ता है।