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धान की नर्सरी को मानसून की आस
ब्यूरो/अमर उजाला, मिर्जापुर।
Updated Wed, 04 May 2016 12:21 AM IST
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प्रचंड गर्मी और सूखे का असर खेती-किसानी पर भी पड़ेगा। चुनार तहसील का अहरौरा व जमालपुर क्षेत्र धान का कटोरा कहा जाता है, जिसकी सिंचाई अहरौरा और डोंगिया जलाशय से होती है। इस वर्ष सूखे के चलते दोनों जलाशयों में पानी नदारद है। इलाके के किसानों के माथे पर चिंता की लकीरें अभी से खिंच गई हैं।
अगर प्रकृति मेहरबान नहीं हुई तो नहरों के सहारे पड़ने वाली धान की नर्सरी नहीं डाली जा सकेगी।
गौरतलब है कि अहरौरा जलाशय में आधा फीट और डोंगिया जलाशय मात्र चार फीट बचा हुआ है। धान की नर्सरी डालने के लिए किसानों को जून के पहले पखवारे में ही पानी चाहिए, लेकिन धान के कटोरे के नाम से विख्यात इलाके की हजारों एकड़ नर्सरी को सींचने के लिए जलाशयों से छोड़ा जाने वाला पानी जलाशय से नदारद है। सूखे जलाशय की स्थिति इतनी विषम है कि रिजर्व में भी पानी मौजूद नहीं है, जिसके चलते धान की नर्सरी डालने के लिए मानसून की दरकार है।
अगर बारिश ने दस्तक नहीं दी और जलाशयों का जलस्तर नहीं बढ़ा तो जलाशय पर आश्रित किसान खेतों में धान की नर्सरी नहीं डाल पाएंगे।
बतातें चलें कि अहरौरा और डोंगिया जलाशय पर हजारों एकड़ धान की फसलों के सिंचाई का भार है, जहां से हाई चैनल, अहरौरा मेन कैनाल तथा गरई प्रणाली को सिंचाई के लिए पानी छोड़ा जाता है। हालात यह है कि अहरौरा जलाशय में मात्र आधा फीट तथा डोंगिया जलाशय में मात्र चार फीट ही पानी मौजूद है।
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धान की नर्सरी के लिए जलाशयों में कम से कम 25 से 35 फीट तक पानी होना आवश्यक है। किसानों को धान की नर्सरी डालने के लिए मानसून पर निर्भर होना पड़ेगा, जिसको लेकर किसानों के माथे पर चिंता की लकीरें बढ़ती ही चली जा रही हैं। विदित है कि अहरौरा तथा डोंगिया जलाशय में नवंबर 2015 से ही पानी की किल्लत बनी हुई है। लगभग 10 फीट रिजर्व में मौजूद पानी को भी किसानों की मांग के चलते विभाग ने छोड़ दिया, जिससे जलाशय का जलस्तर और भी खिसक गया।
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अगर प्रकृति मेहरबान नहीं हुई तो नहरों के सहारे पड़ने वाली धान की नर्सरी नहीं डाली जा सकेगी।
गौरतलब है कि अहरौरा जलाशय में आधा फीट और डोंगिया जलाशय मात्र चार फीट बचा हुआ है। धान की नर्सरी डालने के लिए किसानों को जून के पहले पखवारे में ही पानी चाहिए, लेकिन धान के कटोरे के नाम से विख्यात इलाके की हजारों एकड़ नर्सरी को सींचने के लिए जलाशयों से छोड़ा जाने वाला पानी जलाशय से नदारद है। सूखे जलाशय की स्थिति इतनी विषम है कि रिजर्व में भी पानी मौजूद नहीं है, जिसके चलते धान की नर्सरी डालने के लिए मानसून की दरकार है।
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अगर बारिश ने दस्तक नहीं दी और जलाशयों का जलस्तर नहीं बढ़ा तो जलाशय पर आश्रित किसान खेतों में धान की नर्सरी नहीं डाल पाएंगे।
बतातें चलें कि अहरौरा और डोंगिया जलाशय पर हजारों एकड़ धान की फसलों के सिंचाई का भार है, जहां से हाई चैनल, अहरौरा मेन कैनाल तथा गरई प्रणाली को सिंचाई के लिए पानी छोड़ा जाता है। हालात यह है कि अहरौरा जलाशय में मात्र आधा फीट तथा डोंगिया जलाशय में मात्र चार फीट ही पानी मौजूद है।
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धान की नर्सरी के लिए जलाशयों में कम से कम 25 से 35 फीट तक पानी होना आवश्यक है। किसानों को धान की नर्सरी डालने के लिए मानसून पर निर्भर होना पड़ेगा, जिसको लेकर किसानों के माथे पर चिंता की लकीरें बढ़ती ही चली जा रही हैं। विदित है कि अहरौरा तथा डोंगिया जलाशय में नवंबर 2015 से ही पानी की किल्लत बनी हुई है। लगभग 10 फीट रिजर्व में मौजूद पानी को भी किसानों की मांग के चलते विभाग ने छोड़ दिया, जिससे जलाशय का जलस्तर और भी खिसक गया।