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न्यायाधीशों की कुर्सी खाली, 43 हजार मुकदमे लंबित
ब्यूरो/अमर उजाला, मिर्जापुर।
Updated Wed, 27 Apr 2016 12:28 AM IST
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- फोटो : court
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कहा जाता है कि न्याय में देरी न्याय को नकारना है। कुछ ऐसे ही हालात जिले के न्याय विभाग में देखने को मिल रहे हैं। वर्षों से लंबित मुकदमों की पैरवी करते करते वादकारियों के जूते घिस जा रहे हैं लेकिन जनपद न्यायालय में मुकदमों की संख्या है कि कम होने का नाम ही नहीं ले रही है। न्यायाधीशों की संख्या में कमी भी इसके पीछे जिम्मेदार मानी जा रही है। जनपद न्यायालय में कुल 25 न्यायाधीश नियुक्त हैं जिसमें से पांच न्यायालयों में फैसला देने वाली कुर्सी खाली है।
हाल यह है कि दीवानी और फौजदारी के लंबित मुकदमों की संख्या लगभग साढ़े 43 हजार से अधिक हो चुकी है।
रविवार को प्रधानमंत्री के समक्ष भारत के प्रधान न्यायाधीश टीएस ठाकुर द्वारा न्यायाधीशों पर काम का बोझ कम करने की भावुक अपील के बाद न्यायालयों में काम की समीक्षा होने लगी है। स्थानीय अदालत की बात करें तो यहां न्याय देने के लिए कुल 25 न्यायाधीशों की नियुक्ति है।
इनमें से इन दिनों एडीजे चतुर्थ, अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वितीय, अपर सिविल जज जूनियर डिवीजन प्रथम, चतुर्थ एवं षष्ठम के पद रिक्त चल रहे हैं। इन अदालतों में कई महीनों से मुकदमों की सुनवाई नहीं हो रही है। वरिष्ठ अधिवक्ताओं का कहना है कि राजस्व न्यायालयों द्वारा भी अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन नहीं किया जा रहा है जिसके चलते मुकदमों की संख्या बढ़ती जा रही है। वहीं पुलिस गवाहों को न्यायालय में नहीं प्रस्तुत कर पा रही है इससे मुकदमे लंबित हो रहे हैं और डेट पर डेट पड़ता जा रहा है।
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कई मुकदमे तो बीस से तीस वर्ष पुराने हो चुके हैं । कई वादकारी तो मुकदमों में फैसले का इंतजार करते करते दिवंगत हो चुके हैं। वहीं कई मुकदमे ऐसे भी हैं जिनमें बाप दादा द्वारा दाखिल किए गए मुकदमों की पैरवी उनके नाती पोते कर रहे हैं।
लंबित मुकदमे
फौजदारी- लगभग 27500
दीवानी- लगभग 16000
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हाल यह है कि दीवानी और फौजदारी के लंबित मुकदमों की संख्या लगभग साढ़े 43 हजार से अधिक हो चुकी है।
रविवार को प्रधानमंत्री के समक्ष भारत के प्रधान न्यायाधीश टीएस ठाकुर द्वारा न्यायाधीशों पर काम का बोझ कम करने की भावुक अपील के बाद न्यायालयों में काम की समीक्षा होने लगी है। स्थानीय अदालत की बात करें तो यहां न्याय देने के लिए कुल 25 न्यायाधीशों की नियुक्ति है।
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इनमें से इन दिनों एडीजे चतुर्थ, अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वितीय, अपर सिविल जज जूनियर डिवीजन प्रथम, चतुर्थ एवं षष्ठम के पद रिक्त चल रहे हैं। इन अदालतों में कई महीनों से मुकदमों की सुनवाई नहीं हो रही है। वरिष्ठ अधिवक्ताओं का कहना है कि राजस्व न्यायालयों द्वारा भी अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन नहीं किया जा रहा है जिसके चलते मुकदमों की संख्या बढ़ती जा रही है। वहीं पुलिस गवाहों को न्यायालय में नहीं प्रस्तुत कर पा रही है इससे मुकदमे लंबित हो रहे हैं और डेट पर डेट पड़ता जा रहा है।
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कई मुकदमे तो बीस से तीस वर्ष पुराने हो चुके हैं । कई वादकारी तो मुकदमों में फैसले का इंतजार करते करते दिवंगत हो चुके हैं। वहीं कई मुकदमे ऐसे भी हैं जिनमें बाप दादा द्वारा दाखिल किए गए मुकदमों की पैरवी उनके नाती पोते कर रहे हैं।
लंबित मुकदमे
फौजदारी- लगभग 27500
दीवानी- लगभग 16000