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सभा कर अंग्रेजों के विरूद्घ भरी थी हुंकार
Updated Tue, 14 Aug 2018 12:28 AM IST
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लालगंज। नेता जी सुभाष चंद्र बोस से प्रभावित होकर स्वतंत्रता संग्राम में कूदे आदिवासी नेता सैठोले कोल ने अंग्रेजों के खिलाफ आदिवासी समाज को संगठित कर ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ विद्रोह किया था। लालगंज में दस हजार आदिवारियों की सभा कर उन्होंने अंग्रेजी सरकार को दहला दिया था। वे छिपते-छिपाते अलख जगाते रहे। बाद में उन्हें ब्रिटिश हुकूमत ने गिरफ्तार कर लिया था।
जिले के उपरौध क्षेत्र के महुलरिया गांव निवासी सैठोले कोल बचपन से विद्रोही थे। अंग्रेजों के अत्याचार को देख उन्होंने घर-घर संपर्क कर ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ कोल समुदाय को संगठित किया था। मिर्जापुर और सोनभद्र में उनकी अलग पहचान बन गई। उन्होंने आदिवासी समुदाय के साथ अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह किया। उनकी ताकत से अंग्रेज अधिकारियों में भी दहशत थी। अंग्रेज अधिकारियों ने सैठोले कोल को गिरफ्तार करने की जुगत लगाई लेकिन कई बार वे चकमा देकर वह निकल गए। सैठोले कोल ने महुलरिया के जंगल में 10 हजार कोल समुदाय के लोगों की सभा की थी और अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई लड़ने का आह्वान किया था। उन्होंने युवा आदिवासियों को ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ लड़ने का संकल्प दिलाया था। इसकी जानकारी पर बौखलाई अंग्रेजी फौज सैठोले कोल की गिरफ्तारी के लिए छापेमारी करने लगी थी। सैठोले कोल इकलौते आदिवासी नेता थे जिनकी अंग्रेजों में दहशत थी। उनकी लोकप्रियता का आलम ये था कि लालगंज की सभा को संबोधित करने को आए नेताजी सुभाष चंद्र बोस भी उनके तेवर से प्रभावित थे। लालगंज थाने पर लगे शिलापट्ट पर स्वतंत्रता संग्राम सेनानी सैठोले कोल का नाम अंकित है।
लालगंज थाने का किया था घेराव : सन 1941 में जब चहुंओर अंग्रेजों भारत छोड़ो का नारे के साथ नौजवान अंग्रेजों के विरोध में संगठित हो रहे थे। उसी दौरान लालगंज के कठवार निवासी रविनंदन दूबे ने पांच हजार आदिवासियों के साथ लालगंज थाने को घेर लिया था। इनके नेतृत्व में केदार नाथ तिवारी, केदार नाथ मालवीय एवं सैठोले कोल को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रविनंदन दूबे का परिवार सदियों से राजा-महाराजाओं एवं स्टेट से जुड़ा हुआ था लेकिन देश की आजादी के लिए उन्होंने सभी सुखों का त्याग कर दिया। लालगंज थाने के सामने एक लाट है जिसपर रविनंदन दूबे का नाम अंकित है। रविनंदन दुबे सच्चे गांधीवादी थे।
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जिले के उपरौध क्षेत्र के महुलरिया गांव निवासी सैठोले कोल बचपन से विद्रोही थे। अंग्रेजों के अत्याचार को देख उन्होंने घर-घर संपर्क कर ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ कोल समुदाय को संगठित किया था। मिर्जापुर और सोनभद्र में उनकी अलग पहचान बन गई। उन्होंने आदिवासी समुदाय के साथ अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह किया। उनकी ताकत से अंग्रेज अधिकारियों में भी दहशत थी। अंग्रेज अधिकारियों ने सैठोले कोल को गिरफ्तार करने की जुगत लगाई लेकिन कई बार वे चकमा देकर वह निकल गए। सैठोले कोल ने महुलरिया के जंगल में 10 हजार कोल समुदाय के लोगों की सभा की थी और अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई लड़ने का आह्वान किया था। उन्होंने युवा आदिवासियों को ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ लड़ने का संकल्प दिलाया था। इसकी जानकारी पर बौखलाई अंग्रेजी फौज सैठोले कोल की गिरफ्तारी के लिए छापेमारी करने लगी थी। सैठोले कोल इकलौते आदिवासी नेता थे जिनकी अंग्रेजों में दहशत थी। उनकी लोकप्रियता का आलम ये था कि लालगंज की सभा को संबोधित करने को आए नेताजी सुभाष चंद्र बोस भी उनके तेवर से प्रभावित थे। लालगंज थाने पर लगे शिलापट्ट पर स्वतंत्रता संग्राम सेनानी सैठोले कोल का नाम अंकित है।
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लालगंज थाने का किया था घेराव : सन 1941 में जब चहुंओर अंग्रेजों भारत छोड़ो का नारे के साथ नौजवान अंग्रेजों के विरोध में संगठित हो रहे थे। उसी दौरान लालगंज के कठवार निवासी रविनंदन दूबे ने पांच हजार आदिवासियों के साथ लालगंज थाने को घेर लिया था। इनके नेतृत्व में केदार नाथ तिवारी, केदार नाथ मालवीय एवं सैठोले कोल को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रविनंदन दूबे का परिवार सदियों से राजा-महाराजाओं एवं स्टेट से जुड़ा हुआ था लेकिन देश की आजादी के लिए उन्होंने सभी सुखों का त्याग कर दिया। लालगंज थाने के सामने एक लाट है जिसपर रविनंदन दूबे का नाम अंकित है। रविनंदन दुबे सच्चे गांधीवादी थे।
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