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शहीद स्मारक पर पुष्प अर्पित कर क्रांतिकारियों को नमन करें

Mon, 11 May 2020 01:00 AM IST
Meerut Bureau मेरठ ब्यूरो
Updated Mon, 11 May 2020 01:00 AM IST
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worshiped the revolutionaries by laying flowers on the marturs memorial
मेरठ। क्रांति दिवस के मौके पर रविवार को औघड़नाथ मंदिर स्थित शहीद स्मारक को फूलों से सजाकर दीपक जलाया गया। मुख्य पुजारी पंडित श्रीधर त्रिपाठी और समिति के पदाधिकारियों ने पुष्प अर्पित कर अमर शहीदों को नमन किया। ये पहला मौका रहा जब औघड़नाथ मंदिर में 10 मई को क्रांतिकारियों के साथ महामारी से बचाने में जुटाने कोरोना योद्धाओं की जय भी गूंजी।
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लॉकडाउन के चलते क्रांति दिवस पर भव्य आयोजन नहीं किया गया। प्रशासन की तरफ से भी औघड़नाथ मंदिर के मुख्य पुजारी श्रीधर त्रिपाठी, सारंगधर त्रिपाठी, चंदन त्रिपाठी, सूरज त्रिपाठी, श्यामधर त्रिपाठी, मनोज तिवारी, सतीश सिंघल, अशोक चौधरी और सुधीर गुप्ता ने शहीद स्मारक को फूलों से सजाया। इसके बाद दीपक जलाकर एवं पुष्प अर्पित कर अमर शहीदों को नमन किया गया। यहां हर-हर महादेव, क्रांतिकारी अमर रहे के जयकारे गूंजे। पहली बार ऐसा मौका रहा जब अमर शहीदों के साथ कोरोना योद्धाओं की भी जयकार की गई। पंडित श्रीधर त्रिपाठी ने ऐसे योद्धाओं के अच्छे स्वास्थ्य के लिए भगवान औघड़नाथ से प्रार्थना की।
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औघड़नाथ मंदिर के पुजारी ने जगाई थी क्रांति की भावना
1857 में देश दमनकारी शक्तियों के खिलाफ आवाज उठा रहा था। उस समय अंग्रेजों का अत्याचार चरम पर था। ऐसे में मेरठ से भड़की क्रांति की चिंगारी ने पूरे देश में अंग्रेजों के खिलाफ आवाज बुलंद कर दी। इस क्रांति में औघड़नाथ मंदिर का विशेष योगदान था। मंदिर तब छोटी सी जगह में था। इसके पीछे मैदान पर अंग्रेजों का सैनिक प्रशिक्षण केंद्र था। मंदिर स्थित कुएं पर सैनिक पानी पीते थे। उस समय मंदिर के पुजारी पंडित श्रीधर त्रिपाठी के पूर्वज पंडित शिवचरण दास उर्फ बाबा थे। वे बेहद कड़क स्वभाव के थे। वे कुएं पर सैनिकों को पानी पिलाने के साथ उनको अंग्रेजों की दास्ता छोड़ने के लिए प्रेरित करते थे। 10 मई 1857 से पहले एक समय ऐसा आया जब बाबा शिवचरण दास ने सैनिकों को कुएं का पानी पिलाने से इनकार कर दिया। उन्होंने कहा कि हिंदू सैनिक गाय और मुसलमान सैनिक सूअर की चर्बी से बने कारतूसों को मुंह से लगाते हैं। यह सुनकर सैनिकों का आत्मसम्मान जाग गया। इस पर 85 सैनिकों ने विद्रोह कर दिया। उन्होंने 10 मई को 50 से ज्यादा अंग्रेजों को मौत के घाट उतार दिया गया। इस ऐतिहासिक कुएं के ऊपर 14 अप्रैल 1972 को बांग्लादेश की आजादी के नायक रहे मेजर जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा द्वारा शहीद स्मारक उद्घाटन किया गया।
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