विश्व पर्यावरण दिवस: हरियाली से करें धरा का श्रृंगार, कम होगा प्रदूषण का वार
- 81 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर बढ़ गई वातावरण में आरएसपीएम की मात्रा
- 04 साल में सामान्य से कई गुना बढ़ा दिल्ली एनसीआर और वेस्ट में प्रदूषण का स्तर
- बढ़ता प्रदूषण बांट रहा सांस और फेफड़ों की बीमारी तो गड़बड़ा रहा मौसम चक्र
- मौसम और कृषि विज्ञानियों का कहना, ज्यादा से ज्यादा पेड़ पौधों से सुधरेगा पर्यावरण
- अभी भी नहीं जागरूक हुए तो और विकट हो जाएंगे शहर के हालात
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विस्तार
प्रदूषण की रोकथाम के लिए एनजीटी और केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड सख्त रुख अपना रहा है। लेकिन इसके बावजूद प्रदूषण की मात्रा में कहीं कमी होती नहीं दिख रही है। प्रदूषण नियंत्रण विभाग द्वारा शहर में बेगमपुल और केसरगंज पर प्रदूषण की जांच के साथ हर माह नमूनों की मॉनीटरिंग की जा रही है।
आंकड़ों की बात करें तो वातावरण में आरसीपीएम (रेसपेरेबल सस्पेंडेंड पर्टीकुलेट मैटर) की मात्रा लगातार बढ़ती जा रही है। वर्ष 2015 में आरएसपीएम की मात्रा 169.2 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर दर्ज की गई थी, जो वर्ष 2019 में बढ़कर 250 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर पहुंच गई है। जबकि स्टैंडर्ड लिमिट साल की 60 और चौबीस घंटे में 100 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर से अधिक नहीं होना चाहिए।
वर्ष - आरएसपीएम
2015 - 169.2
2016 171.9
2017 176.18
2018 190
2019 250
केसरगंज
वर्ष आरएसपीएम
2015 135.2
2016 144.8
2017 154.2
2018 170
2019 215
(मानक 60 है, आंकड़े माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर में)
यह एक वायु जनित कण है। सामान्यता इसका आकार 4-5 माइक्रोन से अधिक होता है। आरएसपीएम की प्रकृति धूल और धुएं के मिलने की होती है। धूल और मिट्टी के सूक्ष्म कण सांस के साथ फेफड़ों में प्रवेश करने के चलते सांस और कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों का कारक बनते हैं। यह इंडोर यानी घरों और ऑफिसों में ज्यादा मिलता है। प्लास्टिक, सिंथेटिक, सोफा कवर, पर्दे, पिक्चर ट्यूब, धूल, धुआं आदि इसके सोर्स होते है। धुएं से मिलकर यह कण भारी हो जाता है, जबकि दो से ढाई माइक्रॉन के कई कण बन जाते हैं। आकार में छोटे होने के करण ये हानिकारक कण आसानी से शरीर में प्रवेश कर जाते हैं।
ये उपाय अपनाएं
- हरियाली को बचाएं, ज्यादा से ज्यादा पौधे लगाएं
- वाहनों की संख्या पर नियंत्रण लगाया जाएगा
- डीजल की जगह सीएनजी के वाहनों का प्रयोग किया जाए
- बिल्डिंग मैटेरियल पर पानी का छिड़काव किए जाए, जिससे वह हवा में न उड़े
- कूड़ा या परीली न जलाएं, जल प्रदूषण पर भी नियंत्रण करें
ये पौधे लगाएं
वायु प्रदूषण कम करने के लिए सबसे ज्यादा ऑक्सीजन पीपल, बरगद, रबर प्लांट, बांस, पाम देते है। इल्गी (कवक) नेसटोक, एनाबीना, अझोला ऐसे कवक है जो जमीन के अंदर नाइट्रोजन को बढ़ाने का काम करते है। इससे यह वायु और जल प्रदूूषण को भी साफ करने का काम करते हैं। -डॉ. आरएस सेंगर, वैज्ञानिक कृषि विवि
जागरूक होना होगा
पर्यावरण की रक्षा के लिए सभी को जागरूक होना होगा। ज्यादा से ज्यादा पौधे लगाएं। वाहनों का प्रयोग कम करें। कूड़ा या परीली न जलाएं। -आरके त्यागी, क्षेत्रीय प्रदूषण नियंत्रण अधिकारी
बिगड़ रहा मौसम चक्र
बढ़ते प्रदूषण और पेड़ों के कटान से मौसम चक्र भी बिगड़ रहा है। ग्लोबल वार्मिंग का असर बढ़ रहा है। -डॉ. एन. सुभाष, मौसम वैज्ञानिक आईआईएफएसआर