वायरल बुखार का आंकड़ों की बाजीगरी से इलाज  

अमर उजाला ब्यूरो/मेरठ Updated Mon, 17 Oct 2016 02:16 AM IST
स्टैथस्कोप।
स्टैथस्कोप। - फोटो : अमर उजाला
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करीब ढाई महीने पहले शुरू हुआ बीमारी का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। कोई वायरल बुखार तो कोई चिकनगुनिया से पीड़ित है। अधिकांश लोग बुखार से निजात पाने के बावजूद शरीर के जोड़ों में दर्द से परेशान हैं तो रोजाना कुछ नए लोग वायरल की गिरफ्त में आ रहे हैं। कई घरों में 100 फीसदी वायरस पैर पसार चुका है तो कुछ में दो-चार सदस्य इसकी गिरफ्त में आ चुके हैं। जिले के करीब छह लाख परिवारों में बीमारी से ग्रस्त लोगों का सटीक आंकड़ा निकाल पाना मुश्किल है। लेकिन स्वास्थ्य विभाग अपनी डेली रिपोर्ट में जारी आंकड़ों की बाजीगरी से इलाज करते हुए बेफिक्र है।
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एक अनुमान के मुताबिक अगस्त के पहले सप्ताह से चल रही इस बीमारी की चपेट में लाखों लोग आ चुके हैं। जबकि स्वास्थ्य विभाग का आंकड़ा एक हजार से भी ऊपर नहीं गया है। साफ है कि सरकारी सिस्टम इस बाजीगरी के सहारे अपनी छवि को बचाने और बीमारी को नियंत्रण में दिखाने की कोशिशों में ही लगा है। जिले में कितने लोग बीमार हैं, इसकी सच्चाई सरकारी अस्पतालों और नर्सिंग होम में भर्ती लोगों की संख्या से सामने आ जाती है। जबकि उससे कई गुना ज्यादा लोग डॉक्टर की सलाह से घरों में ही इलाज करा रहे हैं। लेकिन स्वास्थ्य विभाग इसे मानने को तैयार ही नहीं है।


आंकड़ों की आड़ में फर्ज भूले
दरअस
ल जब सितंबर माह में वायरल बुखार, डेंगू और चिकनगुनिया ने कहर मचाया तो उससे निपटने के लिए स्वास्थ्य विभाग ने ठोस कदम उठाने के बजाय आंकड़ों का ही गला घोंटना शुरू कर दिया। विभाग ने सभी निजी लैब संचालकों को फरमान जारी कर दिया कि कोई भी लैब अपनी जांच के आधार पर डेंगू या चिकनगुनिया की पुष्टि नहीं करेगी। बल्कि लैबों को एक सैंपल मेडिकल कॉलेज स्थित माइक्रो बायोलॉजी विभाग भेजना होगा। जहां से जांच होने के बाद ही सरकारी पुष्टि की जाएगी। इसका असर हुआ है कि चिकित्सकों ने निजी लैब से जांच करानी कम कर दी। ज्यादा जरूरी हुआ तो प्लेटलेट्स काउंट कराया या फिर कुछ और जांच करा ली। जिसके आधार पर मरीज को ट्रीटमेंट देना शुरू कर दिया। यही कारण है कि स्वास्थ्य विभाग जिले में डेंगू के 169 और चिकनगुनिया के 763 मरीज होने का ही दावा कर रहा है। ये आंकड़े बताकर विभाग बीमारी काबू में होने की बात कहकर अपना फर्ज भूल गया है।

पहले दावा, फिर हाथ खड़े 
स्वास्थ्य
विभाग ने इन्हीं आंकड़ों की आड़ में हेल्थ कैंप लगाने भी बंद कर दिए। 25 सितंबर को पल्स पोलियो अभियान की शुरूआत के वक्त कहा गया कि इस अभियान के बाद फिर से  कैंप लगाये जाएंगे। लेकिन एक सप्ताह के पोलियो अभियान के बाद किसी कैंप की खबर नहीं है। वहीं, मलेरिया विभाग की दो फॉगिंग मशीनें 15 दिनों से खराब हैं। दो-चार दिन तो जिला मलेरिया अधिकारी ने मशीनें ठीक कराकर फॉगिंग कराने का दावा किया। लेकिन अब हाथ खड़े कर दिए। एंटी लार्वा दवा का छिड़काव कहां हो रहा है, यह भी कोई बताने को तैयार नहीं है। जबकि वायरल बुखार अभी भी जारी है। 

इस बुखार का तोड़ नहीं
हालत
यह हैं कि हर दूसरा-तीसरा व्यक्ति बुखार से परेशान है। किसी को बुखार ने छोड़ा तो साइड इफेक्ट ने घेर रखा है। जोड़ों में दर्द और कमजोरी के साथ चिड़चिड़ापन अलग से है। इस मर्ज की कोई सटीक दवा तक नहीं है। कोई डॉक्टर पेनकिलर लेने से मना कर रहा है तो कोई खाने के लिए कह रहा है। लोगों की समझ में नहीं आ रहा है कि ये बुखार और दर्द कैसे पीछा छोड़ेगा।

कोट
बीच
में बीमारी की स्थिति में सुधार के कारण चिकित्सा कैंप बंद कर दिए गए। मशीन खराब होने से दो हफ्तों से फॉगिंग नहीं हो पा रही है। हालांकि एक बड़ी से फॉगिंग की जा रही है। - योगेश सारस्वत, जिला मलेरिया अधिकारी

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