सहारनपुर में नहीं थम रहा बवाल, सोशल मीडिया पर फैलाई जा रही ये अफवाह
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सहारनपुर के गांव शब्बीरपुर में हुई घटना को लेकर लगातार भड़काऊ पोस्ट डालकर लोगों को उकसाने के आरोप में पुलिस ने दो लोगों को गिरफ्तार कर लिया है। पुलिस ऐसे ही अन्य शरारती तत्वों को चिह्नित कर रही है।
बता दें कि शब्बीरपुर में पांच मई को महाराणा प्रताप जयंती के उपलक्ष्य में निकाली जा रही शोभायात्रा के विरोध में हुए पथराव और आगजनी की घटना के मामले में कुछ लोगों ने सोशल मीडिया के जरिए लोगों को भड़काना शुरू कर दिया। सोशल मीडिया पर कुछ अराजक तत्वों भड़काऊ टिप्पणी पोस्ट कर समाज में भ्रांतियां एवं आपसी सौहार्द बिगाड़ने की कोशिश की गई। सोशल मीडिया पर ऐसी पोस्ट डालने वालों को पुलिस की साइबर क्राइम शाखा द्वारा मॉनीटरिंग करते हुए ऐसे अराजक तत्वों को चिह्नित कर उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई गई है।
फेसबुक और व्हाट्सएप पर लगातार भड़काऊ मेसेज चल रहे हैं
वहीं मंगलवार को सदर बाजार कोतवाली पुलिस एवं क्राइम ब्रांच की संयुक्त टीम ने दो आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया। इन आरोपियों में सचिन सिंह निवासी रजापुर थाना कविनगर जिला गाजियाबाद तथा राहुल गौतम उर्फ आर गौतम निवासी नंद वाटिका सहारनपुर शामिल हैं। इन्हें जेल भेज दिया गया है। उधर, पुलिस और प्रशासन की सोशल मीडिया पर नजर रखने की कवायद पूरी तरह से फेल हो गई है। फेसबुक और व्हाट्सएप पर लगातार भड़काऊ मेसेज चल रहे हैं। लेकिन पुलिस प्रशासन एक दो लोगों के सिवा कार्रवाई कर पाने में असमर्थ रहा। सड़क दूधली बवाल के बाद से ही सोशल मीडिया पर भड़काऊ मेसेज आने शुरू हो गए थे।
पुलिस ने इन दो लोगों को गिरफ्तार किया
इससे पहले दो समुदायों को लेकर सोशल मीडिया पर जमकर दुष्प्रचार कर माहौल खराब करने का प्रयास किया गया। शब्बीरपुर की घटना में हुए जातीय संघर्ष के बाद सोशल मीडिया पर एक दूसरे के लिए जमकर जहर उगला जा रहा है। कहीं किसी को गोली मारने की अफवाह फैलाई गई, तो कहीं किसी महिला के हाथ काटे जाने का फोटो पोस्ट कर माहौल को भड़काने का प्रयास किया गया। हालांकि पुलिस ने दो लोगों को गिरफ्तार भी कर लिया है, लेकिन ऐसे मेसेज सिर्फ एक दो नहीं बल्कि सोशल मीडिया पर पूरी तरह से छाए हुए हैं। मंगलवार को हुए बवाल को भी सोशल मीडिया के जरिए आसपास के जिलों में वायरल किया गया है।
ये है सहारनपुर बवाल के पीछे की सियासत
पार्ट-2
सियासत को लहू पीने की लत है, नहीं तो मुल्क में सब खैरियत है। मुनव्वर राणा का यह शेर सहारनपुर में उपजे बवाल पर बेहद सटीक बैठता है। बसपा का गढ़ और दलित बहुल सहारनपुर में फैल रही आक्रोश की ज्वाला अत्याचार की सियासत से भड़क रही है। सियासत दलित वोट बैंक को अपने पाले में करने के लिए अब छोटी-छोटी घटनाओं को तूल देकर न्याय के प्रतिकार के मुद्दे को हवा दे रहे हैं। इसी का नतीजा है कि दलितों के मन में यह बात घाव करने लगी है कि प्रशासन और पुलिस तटस्थ या पक्षपातपूर्ण हैं। यही कारण है कि इतना जल्दी दलित समाज लामबंद होकर हाथों में तलवार और तमंचा लेकर सड़कों पर उतर आया। इस पूरी घटना से एक बात साफ है कि अत्याचार की हवा बनाकर आक्रोश की ज्वाला भड़काई जा रही है। अगर इस हालात पर काबू नहीं किया गया तो सहारनपुर ही नहीं समूचे पश्चिमी यूपी दंगे से भी खराब हालात हो जाएंगे।
दलितों में ऐसा आक्रोश कभी नहीं देखा
बसपा के सबसे मजबूत किले में हमेशा हाथी की चिंघाड़ता था। मगर, पहले लोकसभा और फिर विधानसभा चुनाव में भाजपा की लहर में इसके महावत खुद नीचे उतर गए हैं। इसके बाद सड़क दूधली से लेकर शब्बीरपुर कांड में दलितों को निशाना बनाया गया तो समाज के लोगों में असुरक्षा की भावना आने लगी। सियासत का दौर भी यहीं से शुरू हुआ है। दलितों को अपने पाले में करने के लिए सियासी लोग उन घटनाओं को तूल देने के साथ ही उन्हें अत्याचार तक का अहसास कराने में जुट गए। इतना ही नहीं, पुलिस प्रशासन की कार्रवाइयों से भी उनका विश्वास हटाने की पुरजोर कोशिशें की गई हैं। यही कारण है कि लोकसभा और विधानसभा चुुनाव में खुद को हिंदुत्व के पाले में खड़ा करने वाला दलित एक झटके में अलग-थलग सा महसूस करने लगा।
सड़क दूधली कांड में नहीं भड़के थे दलित
सड़क दूधली में बिना अनुमति अंबेडकर जयंती की शोभायात्रा निकालने पर दलित-मुस्लिम संघर्ष हुआ। उस वक्त दलितों ने आक्रोश जरूर दिखाया, मगर, सड़कों पर नहीं उतरे। हालांकि उस वक्त इस मुद्दे को भाजपा भुनाना चाहती थी। दूसरे दल इस मुद्दे पर तटस्थ ही रहे थे। शब्बीरपुर की घटना के बाद भाजपा भले ही बैकफुट पर रही, मगर दूसरे दल दलितों के समर्थन में उतरने से गुरेज नहीं किया। ऐसे में अब तक पनप रहे आक्रोश पर सियासी हवा से इनकार नहीं किया जा सकता। आने वाले निकाय और इसके बाद लोकसभा चुनाव के नए समीकरणों पर भी नजर है। भाजपा हमेशा दलितों को हिंदू बनाकर रखना चाहेगी। जबकि बसपा अपने बेस वोट दलित के साथ मुस्लिम और अन्य जातियों का गठजोड़ चाहेगी। कांग्रेस भी मुस्लिम के साथ दलितों को अपने पाले में करना चाहेगी। उधर, सपा दलित तो अलग कर अपने पाले को मजबूत करने की कोशिश करेगी। ऐसे में इन बवालों के जरिए सियासी सूरमा नए समीकरण पर नजरें गड़ाए हुए है।