पुरुष तो ‘पोस्टर ब्वॉय’, नसबंदी में आगे महिलाएं, रिपोर्ट में हुआ खुलासा
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हाल ही में सनी-बॉबी देओल अभिनीत फिल्म आई थी ‘पोस्टर ब्वॉय।’ इसमें उनके फर्जी तरीके से पोस्टर छप जाते हैं कि उन्होंने नसबंदी ऑपरेशन करा लिया है। इसे लेकर वे खुद को बेइज्जत महसूस करते हैं और उन्हें क्या-क्या परेशानियां झेलनी पड़ती हैं, इसी पर पूरी फिल्म है। आंकड़े गवाही दे रहे हैं कि मेरठ जिले की सच्चाई भी इससे जुदा नहीं है। स्वास्थ्य विभाग की पिछले पांच साल की रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि यहां भी नसंबदी ऑपरेशन का सारा जिम्मा महिलाओं पर ही है। इस दौरान जो नसंबदी ऑपरेशन हुए हैं, उनमें महिलाओं की भागीदारी करीब 96 प्रतिशत है, जबकि पुरुष को महज चार प्रतिशत।
तमाम संसाधन व तकनीक उपलब्ध उपलब्ध होने के बाद भी परिवार नियोजन का भार महिलाओं के कंधों पर है। वर्ष 2013 एक अप्रैल से 30 नवंबर 2017 तक मेरठ जिले में 20 हजार 348 नसबंदी ऑपरेशन हुए हैं, इनमें 19 हजार 538 महिलाओं ने कराई है, जबकि नसबंदी कराने वाले पुरुष महज 810 हैं। नसबंदी के लिए अधिकतर पुरुष प्रोत्साहन के लालच से आते हैं, इनमें ज्यादातर मजदूर या गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले होते हैं। इसके लिए शासन ने प्रोत्साहन राशि में बढ़ोतरी भी की है, पहले के मुकाबले एक हजार रुपये बढ़ाए हैं, मगर फिर भी ज्यादा फर्क नहीं पड़ा है।
प्रोत्साहन राशि में भी परेशानी
नसबंदी ऑपरेशन के लिए मिलने वाली प्रोत्साहन राशि को लेकर भी तमाम तरह की दिक्कतें हैं। दरअसल, योजना के तहत जिनका खाता आधार से जुड़ा हुआ है, सिर्फ उन्हीं के खाते में प्रोत्साहन राशि जाती है, ऐसे में काफी लोग ऐेसे रह जाते हैं, जिन्हें प्रोत्साहन का पैसा नहीं मिल पाता है। इससे भी नसबंदी ऑपरेशन से लोग कतराते हैं। दूसरी तरफ, स्वास्थ्य विभाग के अफसर पुरुषों में नसबंदी कम होने की वजह यह भी मानते हैं कि अब परिवार नियोजन के लिए और भी कई विकल्प हैं, इसलिए नसबंदी को पुरुष सबसे आखिर में अपनाते हैं।
नसबंदी ऑपरेशन का हाल
वर्ष पुरुष महिला
2013-14 199 4668
2014-15 279 4602
2015-16 108 3846
2016-17 119 3924
2017-18 105 2498
(2017-18 के आंकड़े नवंबर तक के हैं।)
जागरूकता का अभाव है वजह
महिला चिकित्सालय, मेडिकल कॉलेज, मवाना, सरधना और दौराला सीएचसी पर नसंबदी कराई जाती है। इसके लिए जागरूकता अभियान चलाए जाते हैं, मगर पुरुषों में इसे लेकर उत्साह नहीं है। कई भ्रांतियां हैं और जागरूकता का अभाव है। इसके लिए लाभार्थी को तीन हजार रुपये और प्रेरक को चार सौ रुपये दिए जाते हैं, पहले यह क्रमश: दो हजार और तीन सौ रुपये था। - डॉ. राजकुमार, मुख्य चिकित्सा अधिकारी
स्वास्थ्य विभाग टारगेट नहीं कर पा रहा पूरा
स्वास्थ्य विभाग अपना टारगेट पूरा नहीं कर पाता है। पिछले पांच सालों से महिलाओं और पुरुषों का टारगेट फिक्स है, मगर एक भी साल यह पूरा नहीं हो पाया है। मेरठ में प्रतिवर्ष नसबंदी ऑपरेशन का टारगेट करीब 16 हजार है।
ये हैं गलतफहमी
शारीरिक रूप से कमजोर कर देती है।
भूख कम लगती है।
सिर्फ सर्दी में करवानी चाहिए।
ये है हकीकत
शारीरिक रूप से कमजोरी नहीं आती है।
भूख और वजन पर कोई फर्क नहीं पड़ता है।
किसी भी मौसम में कराई जा सकती है।
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