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हस्तिनापुर से शुरु हुआ था अक्षय तृतीया का पर्व

Wed, 30 Apr 2025 02:03 AM IST
Meerut Bureau मेरठ ब्यूरो
Updated Wed, 30 Apr 2025 02:03 AM IST
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The festival of Akshaya Tritiya started from Hastinapur
अक्षय तृतीया के अवसर पर भव्य रूप से सजाया गया श्री श्वेतांबर मंदिर स्रोत संवाद
हस्तिनापुर। अक्षय तृतीया का प्राचीन इतिहास हस्तिनापुर तीर्थ से ही प्रारंभ हुआ है। वैशाख सुदी तीज को अक्षय तृतीय के नाम से जाना जाता है। अक्षय का अर्थ है, जिस वस्तु का कभी क्षय न हो अर्थात वस्तु समाप्त न हो और वह महीना वैशाख का है। जिसकी तिथि तृतीया थी। इसलिए इसका नाम अक्षय तृतीया पड़ा।
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जंबूदीप के प्रबंधक विजय कुमार जैन ने बताया कि अक्षय तृतीया पर्व का इतिहास जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव से जुड़ा है। भगवान ऋषभदेव ने अयोध्या में जन्म लिया एवं प्रयाग की धरती पर जैनेश्वरी दीक्षा को धारण किया। जो कि इस युग की प्रथम दीक्षा थी। क्योंकि भगवान ऋषभदेव वर्तमान चौबीसी के प्रथम तीर्थंकर हैं। दीक्षा को धारण करते ही ध्यान लगाकर बैठ गए। भगवान के साथ चार हजार राजाओं ने दीक्षा ग्रहण की। छह माह पश्चात भगवान ऋषभदेव आहारचर्या बताने के लिए निकल गए।
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इस पर्व को लेकर जैन धर्म के लोगों का मानना है कि इस दिवस किए जाने वाला कार्य वृद्धि को प्राप्त होता है। भगवान ऋषभदेव को हुए करोड़ों साल व्यतीत हो गए, लेकिन आज भी अक्षय तृतीया का पर्व मनाने के लिए देश एवं विदेश से जैन श्रद्धालु हस्तिनापुर की धरती पर आते हैं। जैन श्रद्धालु आहार दान की महिमा का वर्णन करते हुए इस पवित्र धरती पर आते हैं। इस पवित्र दिवस का ये महत्व है कि बिना मुहूर्त हजारों विवाह संपन्न होते हैं। अगणित ग्रह प्रवेश आदि मांगलिक कार्य संपन्न किए जाते हैं। इसे सर्वश्रेष्ठ मूहूर्त माना जाता है।
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हस्तिनापुर से जुड़ा है अक्षय तृतीया का इतिहास

प्राचीन दिगंबर जैन बड़े मंदिर के महाप्रबंधक मुकेश जैन ने बताया कि हस्तिनापुर नगरी के शासक राजा सोमप्रभ और उनके भाई श्रेयांस कुमार थे। पिछली रात्रि में राजा श्रेयांस को उत्तम सात स्वप्न दिखाई देते हैं। इन स्वप्नों का उत्तम फल जानकर अति प्रसन्न चित्त होकर चिंतन ही कर रहे होते हैं कि तभी सुनने में आता है कि तीर्थंकर ऋषभदेव हस्तिनापुर में प्रवेश कर चुके हैं। चारों ओर जन समुदाय एकत्र होकर भगवान के दर्शन करता है, उनके चरणों की पूजन करता है। इसके बाद हस्तिनापुर की धरती पर गन्ने की खेती हो गई। अक्षय राजा श्रेयांस ने प्रथम आहार में गन्ने का रस दान दिया। इस युग के प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव थे। इससे पूर्व दान देने की प्रथा इस धरती पर नहीं थी। इसका शुभारंभ राजा श्रेयांस द्वारा ही किया गया। इसके बाद यह पावन भूमि दानवीरों की भूमि भी कहलाई।


हस्तिनापुर में विराजमान हैं भगवान ऋषभदेव की प्रतिमा

जैन समाज की सर्वोच्च साध्वी गणिनी प्रमुख ज्ञानमती माता का कहना है कि प्रत्येक वर्ष हस्तिनापुर में भगवान ऋषभदेव की प्रतिमा के समक्ष इच्क्षुरस का आहार करवाया जाता है। अक्षय तृतीया का पर्व हस्तिनापुर से ही प्रारंभ हुआ है। करोड़ों वर्ष से भक्तगण आज भी इस धरती पर आकर अक्षय तृतीया के दिन तीर्थ पर विराजमान साधुओं को आहार देकर अपने जीवन को धन्य मानते हैं।



कई दिनों तक चलता है वर्षितप महोत्सव

ऐतिहासिक नगरी में स्थित प्राचीन श्वेतांबर मंदिर में अक्षय तृतीया के अवसर पर देश-विदेश से श्रद्धालु पहुंचते हैं। मंदिर के प्रबंधक तेजपाल सिंह ने बताया कि इस बार 26 अप्रैल से 1 मई तक कार्यक्रम चलेगा।

अक्षय तृतीया के अवसर पर भव्य रूप से सजाया गया श्री श्वेतांबर मंदिर स्रोत संवाद

अक्षय तृतीया के अवसर पर भव्य रूप से सजाया गया श्री श्वेतांबर मंदिर स्रोत संवाद

अक्षय तृतीया के अवसर पर भव्य रूप से सजाया गया श्री श्वेतांबर मंदिर स्रोत संवाद

अक्षय तृतीया के अवसर पर भव्य रूप से सजाया गया श्री श्वेतांबर मंदिर स्रोत संवाद

अक्षय तृतीया के अवसर पर भव्य रूप से सजाया गया श्री श्वेतांबर मंदिर स्रोत संवाद

अक्षय तृतीया के अवसर पर भव्य रूप से सजाया गया श्री श्वेतांबर मंदिर स्रोत संवाद

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