स्वास्थ्य विभाग की सालाना रिपोर्ट में हुआ सनसनीखेज खुलासा
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चौंकिए मत। यह हकीकत है। मेरठ में महिलाओं के गर्भ में ही बच्चे ‘गायब’ हो रहे हैं। पिछले एक साल में गर्भवती हुईं महिलाओं के तीन हजार बच्चों का पता नहीं चल सका है। वह जीवित हैं या मृत, स्वास्थ्य विभाग के पास इसकी कोई जानकारी नहीं है। यह सनसनीखेज खुलासा स्वास्थ्य विभाग की सालाना रिपोर्ट में हुआ है।
स्वास्थ्य विभाग की रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष 2017-18 में 56096 गर्भवती महिलाएं रजिस्टर्ड की गईं। इनमें से 52739 महिलाओं ने बच्चों को जन्म दिया। 357 बच्चों की जन्म के दौरान मृत्यु हो गई या वह गर्भ में ही मर गए। इस दौरान 26 महिलाओं की भी मौत हो गई। इस तरह तीन हजार गर्भवती महिलाएं ऐसी रहीं, जिनके गर्भ में पल रहे बच्चों का क्या हुआ, यह स्वास्थ्य विभाग को पता नहीं है।
हर साल हो रही लापरवाही
विभाग की यह लापरवाही इसी साल की नहीं है। कमोबेश हर साल इसी तरह ‘गर्भ’ से बच्चे गायब हो जाते हैं और स्वास्थ्य विभाग को इसका पता तक नहीं चलता है। स्वास्थ्य विभाग ने साल 2016-17 में 59293 गर्भवती महिलाएं रजिस्टर्ड की थीं। इनमें से 57975 महिलाओं ने बच्चों को जन्म दिया। 324 बच्चों की मृत्यु हो गई। इस दौरान 26 महिलाओं की भी जान गई। बाकी 994 गर्भवती महिलाओं केबच्चों का क्या हुआ। इसका जवाब स्वास्थ्य विभाग के पास नहीं है। स्वास्थ्य विभाग के सूत्रों का भी मानना है कि इनमें कई मामले गर्भपात कराने के हो सकते हैं। लेकिन गंभीरता न होने के कारण यह पकड़ में नहीं आता है।
गर्भपात का हो सकता है खेल
यह गर्भपात कराने का खेल हो सकता है, लेकिन इसका खुलासा करने में स्वास्थ्य विभाग फेल साबित हो रहा है। दरअसल, शासन की मुखबिर योजना मेरठ में दम तोड़ रही है। दस माह हो गए हैं, लेकिन कोई भी व्यक्ति गर्भ में बेटियों की रक्षा के लिए किए जाने वाले स्टिंग ऑपरेशन के लिए आगे नहीं आया है। एक जुलाई से लागू हो चुकी शासन की ‘मुखबिर योजना’ मेरठ में परवान नहीं चढ़ पा रही है। इसके तहत एक स्टिंग ऑपरेशन पर शासन दो लाख रुपये खर्च करता है। इसमें भ्रूण जांच या गर्भपात कराने वाले सेंटर को ढूंढने वाले व्यक्ति को 60 हजार रुपये दिए जाते हैं। जो महिला मिथ्या गर्भवती बनकर सेंटर में जाएगी, उसे एक लाख रुपये दिए जाते हैं। महिला के सहयोगी को 40 हजार रुपये दिए जाते हैं। इस योजना केलागू होने के बाद सिर्फ एक बार इस तरह का मामला पकड़ा गया है, वह भी हरियाणा की टीम ने छापामारी कर पकड़ा था।
आशाएं नहीं करतीं मॉनिटरिंग
यह बात सही है कि हर साल काफी संख्या में गर्भवती महिलाओं की मॉनिटरिंग नहीं हो पाती है। इसकी जिम्मेदारी आशाओं की दी हुई हैं। जिले में करीब 1500 आशाएं हैं, जो गर्भवती महिलाओं की निगरानी करती हैं। बच्चे के जन्म तक वह सब महिलाओं की मॉनिटरिंग नहीं कर पाती हैं। इस कारण इस तरह के आंकड़े सामने आ रहे हैं।- डॉ. राजकुमार, सीएमओ मेरठ
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