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आत्मविश्वास ही जीवन की सबसे मजबूत कड़ी: भाव भूषण
Fri, 20 Feb 2026 06:09 PM IST
मेरठ ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, मेरठ
संवाद न्यूज एजेंसी, मेरठ
Updated Fri, 20 Feb 2026 06:09 PM IST
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कैलाश पर्वत मंदिर पर चल रहे भक्तांबर विधान पाठ में पूजा अर्चना करते श्रद्धालु स्रोत संवाद
कैलाश पर्वत दिगंबर जैन मंदिर मेंं धार्मिक अनुष्ठान श्रद्धा और भक्ति के साथ सम्पन्न
संवाद न्यूज एजेंसी
हस्तिनापुर। कैलाश पर्वत दिगंबर जैन मंदिर मेंं चल रहे 48 दिवसीय भक्तामर विधान एवं पाठ के तेरहवें दिन धार्मिक अनुष्ठान श्रद्धा और भक्ति के साथ सम्पन्न हुए। कार्यक्रम का शुभारंभ विधानाचार्य सौरभ शास्त्री ने मंगल मंत्रोच्चार के साथ किया।
इस अवसर पर 108 श्री भाव भूषण महाराज ने श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए उन्हें आत्मविश्वास का महत्व बताया। उन्होंने कहा कि आत्मविश्वास ही जीवन की सबसे मजबूत कड़ी है, जिसके बल पर व्यक्ति हर चुनौती का सामना कर सकता है। मनुष्य अक्सर भविष्य को लेकर संशय और भय में जीता है, इस कारण वह सहारे की तलाश करता है। सहारा लेना गलत नहीं है, लेकिन जीवनभर दूसरों के सहारे रहना उचित नहीं होता। यदि व्यक्ति अपनी आंतरिक क्षमता को पहचान ले और उसे विकसित करे, तो उसे किसी बाहरी सहारे की आवश्यकता नहीं पड़ती।
जैन मुनि ने कहा कि योग्यता और शक्ति हर व्यक्ति के भीतर विद्यमान है, आवश्यकता केवल उसे जागृत करने की है। आत्मबल बढ़ने पर कठिन से कठिन परिस्थितियां भी सरल प्रतीत होने लगती हैं। उन्होंने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि वे आत्मचिंतन करें, अपने भीतर की शक्तियों को पहचानें और आत्मनिर्भर बनें।
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स्वर्ण कलश से अभिषेक का सौभाग्य प्रशांत जैन सागर और आकाश जैन को प्राप्त हुआ, जबकि शांतिधारा नीतेश जैन शास्त्री ने संपन्न कराई। दीप प्रज्ज्वलन कुसुमलता जैन ने किया। सुनीता दीदी ने विश्व के सभी जीवों के सुखी रहने की कामना के साथ शांतिधारा का वाचन किया। इसके बाद तीर्थंकरों को 48 अर्घ्य अर्पित कर विधान प्रारंभ हुआ। विधान का विसर्जन संजीव जैन व मीनू जैन ने किया।
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हस्तिनापुर। कैलाश पर्वत दिगंबर जैन मंदिर मेंं चल रहे 48 दिवसीय भक्तामर विधान एवं पाठ के तेरहवें दिन धार्मिक अनुष्ठान श्रद्धा और भक्ति के साथ सम्पन्न हुए। कार्यक्रम का शुभारंभ विधानाचार्य सौरभ शास्त्री ने मंगल मंत्रोच्चार के साथ किया।
इस अवसर पर 108 श्री भाव भूषण महाराज ने श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए उन्हें आत्मविश्वास का महत्व बताया। उन्होंने कहा कि आत्मविश्वास ही जीवन की सबसे मजबूत कड़ी है, जिसके बल पर व्यक्ति हर चुनौती का सामना कर सकता है। मनुष्य अक्सर भविष्य को लेकर संशय और भय में जीता है, इस कारण वह सहारे की तलाश करता है। सहारा लेना गलत नहीं है, लेकिन जीवनभर दूसरों के सहारे रहना उचित नहीं होता। यदि व्यक्ति अपनी आंतरिक क्षमता को पहचान ले और उसे विकसित करे, तो उसे किसी बाहरी सहारे की आवश्यकता नहीं पड़ती।
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जैन मुनि ने कहा कि योग्यता और शक्ति हर व्यक्ति के भीतर विद्यमान है, आवश्यकता केवल उसे जागृत करने की है। आत्मबल बढ़ने पर कठिन से कठिन परिस्थितियां भी सरल प्रतीत होने लगती हैं। उन्होंने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि वे आत्मचिंतन करें, अपने भीतर की शक्तियों को पहचानें और आत्मनिर्भर बनें।
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स्वर्ण कलश से अभिषेक का सौभाग्य प्रशांत जैन सागर और आकाश जैन को प्राप्त हुआ, जबकि शांतिधारा नीतेश जैन शास्त्री ने संपन्न कराई। दीप प्रज्ज्वलन कुसुमलता जैन ने किया। सुनीता दीदी ने विश्व के सभी जीवों के सुखी रहने की कामना के साथ शांतिधारा का वाचन किया। इसके बाद तीर्थंकरों को 48 अर्घ्य अर्पित कर विधान प्रारंभ हुआ। विधान का विसर्जन संजीव जैन व मीनू जैन ने किया।