UP: तीसरी बार भाजपा के करीब चौधरी परिवार, रालोद को रास आता रहा गठबंधन, 27 वर्ष में 10 बार मिलाया हाथ
चौधरी चरणसिंह को भारत रत्न की घोषणा के बाद भाजपा और रालोद की राहे एक हो गई हैं। यह पहली बार नहीं है जब रालोद ने किसी पार्टी के साथ हाथ मिलाया हो। 27 वर्ष में रालोद 10 बार विभिन्न दलों के साथ हाथ मिला चुके हैं। वहीं चौधरी परिवार की राहें अब तीसरी बार एक हो गई हैं।
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पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह को भारत रत्न देने की घोषणा के साथ ही यह तय हो गया है कि जल्द ही रालोद एनडीए के कुनबे में शामिल हो जाएगा। आरएलडी अपने 27 साल के सियासी इतिहास में पहली बार किसी दल के साथ गठबंधन नहीं कर रही, बल्कि इससे पहले भाजपा से लेकर कांग्रेस और बसपा सहित सभी प्रमुख दलों के साथ 10 बार हाथ मिला चुकी है।
चौधरी चरण सिंह के बेटे चौधरी अजित सिंह उत्तर प्रदेश में 2002 के विधानसभा और 2009 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के साथ मिलकर लड़े थे। अब फिर रालोद 2024 के लोकसभा चुनाव में तीसरी बार भाजपा के करीब आ रही है। चौधरी अजित सिंह 1986 में सियासत में आए थे। अजित सिंह ने राजनीति में कदम रखा तो उनके पास पिता की बड़ी विरासत थी। चौधरी चरण सिंह के निधन के बाद चौधरी अजित सिंह 1987 में लोकदल के अध्यक्ष बने और 1988 में ही जनता पार्टी के अध्यक्ष घोषित किए गए।
अजित सिंह अपनी खोई जमीन तलाश ही रहे थे कि सियासी परिस्थितियों ने फिर उन्हें कांग्रेस का साथ देकर केंद्रीय मंत्री बनने की तरफ मोड़ दिया। वह कांग्रेस के साथ ज्यादा दिन नहीं रह सके और 1996 के लोकसभा चुनाव के बाद वह फिर अलग होकर उस संयुक्त मोर्चा का हिस्सा बन गए, जिसमें मुलायम सिंह यादव भी शामिल थे। देवेगौड़ा और गुजराल सरकार में भी अजित मंत्री रहे।
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भाजपा के साथ मिलकर लड़े चुनाव, 14 सीटें जीतीं
अजित सिंह ने 1996 में राष्ट्रीय लोकदल का गठन किया। 1998 में अजित सिंह को लोकसभा चुनाव में हार का सामना करना पड़ा। साल 1999 के लोकसभा चुनाव में अजित सिंह चुनाव जीते और बाद में भाजपा से समझौता कर लिया। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के अगुवाई वाली सरकार में वह कृषि मंत्री बने, लेकिन ज्यादा दिन साथ नहीं रह सके।
वर्ष 2002 के विधानसभा चुनाव में रालोद ने भाजपा के साथ मिलकर चुनाव लड़ा, जिसमें आरएलडी 14 सीटें जीतने में सफल रही, लेकिन चुनाव के बाद अजित सिंह ने अटल सरकार से इस्तीफा दे दिया और भाजपा ने गठबंधन तोड़ लिया।
जब छह विधायक बने मंत्री
मुलायम सिंह यादव के साथ अजित सिंह की राजनीतिक प्रतिद्वंदिता थी, लेकिन 2003 में जब उत्तर प्रदेश भाजपा के गठबंधन से मायावती की सरकार चल रही थी, तब अजित सिंह ने अपने 14 विधायकों का समर्थन वापस लेकर मायावती सरकार के गिरने का रास्ता तैयार कर दिया। अजित सिंह ने मुलायम सिंह यादव को समर्थन देकर उनकी सरकार बनवाई। मुलायम सरकार में अजित सिंह के छह विधायक मंत्री बने थे।
सपा के साथ फायदा कम, नुकसान ज्यादा
2004 के लोकसभा चुनाव में रालोद ने समाजवादी पार्टी के साथ मिलकर किस्मत आजमाई। यह सपा के लिए फायदेमंद रहा। रालोद सिर्फ तीन सीटें जीत सकी, जबकि सपा को 35 सीटें मिलीं। हालांकि चार साल के बाद दोनों दलों का गठबंधन टूट गया। 2007 चुनाव में सपा और रालोद अलग-अलग चुनाव लड़ीं। इस चुनाव में आरएलडी 10 सीटें जीतने में कामयाब रहे।
भाजपा से ज्यादा रालोद को मिला लाभ
2008 में जब अमेरिका के साथ परमाणु समझौते को लेकर वामपंथी दलों का समर्थन लेने के बाद यूपीए सरकार संसद में अविश्वास प्रस्ताव का सामना कर रही थी तब अजित सिंह ने कांग्रेस के खिलाफ वोट दिया था। इसके बाद 2009 के लोकसभा चुनाव में आरएलडी ने बीजेपी के साथ मिलकर किस्मत आजमाई, लेकिन इसका फायदा बीजेपी से ज्यादा आरएलडी को मिला। आरएलडी को पांच सीटें मिलीं जबकि बीजेपी को महज 10 सीटों के साथ संतोष करना पड़ा।
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अजित और जयंत दोनों हार गए
अजित सिंह 2011 में यूपीए-2 का हिस्सा बने और मनमोहन सिंह की सरकार में नागरिक उड्डयन मंत्री बने। 2012 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और आरएलडी मिलकर मैदान में उतरे। आरएलडी 46 सीटों पर लड़ी और 9 सीटें जीती जबकि कांग्रेस 355 सीटों पर लड़कर 22 सीटें ही जीत सकी। 2014 के लोकसभा चुनाव में आरएलडी और कांग्रेस की दोस्ती बरकरार रही, लेकिन 2013 में हुए मुजफ्फरनगर दंगों का नुकसान अजित सिंह और आरएलडी को हुआ। 2014 के लोकसभा चुनाव में अजित और उनके पुत्र जयंत चौधरी दोनों ही हार गए। कांग्रेस महज दो सीटें जीत पाई जबकि आरएलडी अपना खाता ही नहीं खोल सकी.
कांग्रेस-सपा की दोस्ती से रालोद हाशिए पर आई
2017 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और सपा में दोस्ती हो जाने से आरएलडी हाशिए पर पहुंच गई। अकेले चुनाव लड़ी और एक ही विधायक बन सका। 2018 में कैराना लोकसभा उपचुनाव में आरएलडी का सपा के साथ नजदीकियां बढ़ीं। 2019 के लोकसभा चुनाव में आरएलडी, बसपा और सपा के साथ हाथ मिलाकर चुनावी मैदान में उतरी। आरएलडी 3 सीटों पर चुनाव लड़ी, जिनमें एक भी सीट वो नहीं जीत सकी। अजित सिंह और जयंत दोनों हार गए।
मायावती के गठबंधन से अलग हो जाने के बाद सपा और आरएलडी साथ थे। 2022 के विधानसभा चुनाव में सपा और आरएलडी मिलकर चुनाव लड़ी। आरएलडी 36 सीटों पर चुनाव लड़ी, जिसमें 8 सीटें जीतने में कामयाब रही और एक सीट उपचुनाव में जीती। विधानसभा चुनाव के बाद सपा ने जयंत चौधरी को अपने कोटे से राज्यसभा भेजा। 2024 के लोकसभा चुनाव में भी सपा और आरएलडी के साथ लड़ने का समझौता था, इसके तहत ही अखिलेश यादव ने आरएलडी को सात लोकसभा सीटें देने का एलान भी किया था, लेकिन अब उनकी बातचीत भाजपा से चल रही है।