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भक्ति और समर्पण से ही संभव है भगवान की प्राप्ति : शांतनु महाराज
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खरखौदा में चल रही श्री राम कथा सुनते भक्त(संवाद)
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- खरखौदा स्थित लालू अध्यक्ष फार्म हाउस में सात दिवसीय श्रीराम कथा का छठा दिन
संवाद न्यूज एजेंसी
खरखौदा। कथा व्यास शांतनु महाराज ने रघुवंश की माताओं के आदर्श चरित्र, भगवान श्रीराम के वनगमन तथा केवट प्रसंग का भावपूर्ण वर्णन करते हुए कहा कि भारतीय संस्कृति और सनातन धर्म की रक्षा में मातृशक्ति की सबसे महत्वपूर्ण भूमिका रही है। मां कौशल्या, मां सुमित्रा, माता जानकी और उर्मिला का जीवन त्याग, समर्पण, धैर्य और धर्मपालन का सर्वोच्च उदाहरण है।
कस्बा खरखौदा में स्थित लालू अध्यक्ष फार्म हाउस में चल रही सात दिवसीय श्रीराम कथा के छठे दिन महाराज ने कहा कि आज देश, धर्म और संस्कृति सुरक्षित हैं तो इसके पीछे उन माताओं और बहनों का योगदान है, जिन्होंने धर्म की रक्षा के लिए अपने पुत्रों, भाइयों और पतियों को हंसते हुए तिलक लगाकर रणभूमि और कर्तव्यपथ पर भेजा। उन्होंने कहा कि रामराज्य का जो भव्य स्वरूप संसार के सामने दिखाई देता है, उसकी मजबूत नींव जनक परिवार की पुत्री माता जानकी के त्याग और तपस्या पर रखी गई थी। महाराज ने भगवान श्रीराम, माता जानकी और लक्ष्मण के वनगमन प्रसंग का वर्णन करते हुए कहा कि जब प्रभु अयोध्या छोड़कर वन की ओर प्रस्थान कर रहे थे, तब पूरी अयोध्या उनके साथ चल पड़ी थी। अयोध्यावासी माता कैकेयी के निर्णय को धिक्कारते हुए अपने आराध्य के प्रति प्रेम और समर्पण का परिचय दे रहे थे। यह प्रसंग दर्शाता है कि भगवान और भक्त के बीच का संबंध केवल श्रद्धा का नहीं, बल्कि आत्मीयता और प्रेम का भी होता है।
उन्होंने निषादराज गुह और भगवान श्रीराम के मिलन प्रसंग को रामराज्य का आधार बताते हुए कहा कि आदर्श शासन वही है, जहां ऊंच-नीच, जाति-पांति और बड़े-छोटे का कोई भेदभाव न हो। भगवान श्रीराम ने अपने व्यवहार से समाज को समरसता, समानता और प्रेम का संदेश दिया। रामराज्य की कल्पना सामाजिक सौहार्द और मानवीय मूल्यों पर आधारित है।
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महाराज ने रामचरितमानस के अत्यंत भावपूर्ण केवट प्रसंग का वर्णन करते हुए कहा कि यदि मनुष्य परमात्मा की प्राप्ति करना चाहता है तो उसे सरल, सहज और निष्कपट बनना होगा। भगवान को दिखावा नहीं, बल्कि निष्कलुष और भोली भक्ति प्रिय है। केवट द्वारा भगवान के चरण धोकर उन्हें नाव में बैठाने का प्रसंग भक्त और भगवान के बीच प्रेम, विश्वास और समर्पण की अनूठी मिसाल है। उन्होंने कहा कि केवट भगवान से बार-बार तर्क करता है और उनके चरण धोने का आग्रह करता है। इसका कारण यह है कि वह प्रभु की करुणा और दयालुता को भली-भांति जानता है। प्रभु अपने भक्तों का दुख और रुदन सहन नहीं कर सकते। महाराज श्री ने कहा कि सच्चे हृदय से किया गया रुदन ही भक्ति मार्ग की वह साधना है, जो भक्त को भगवान के चरणों तक पहुंचा देती है।
कथा में मुख्य अतिथि उत्तर प्रदेश सरकार के मंत्री कुंवर बृजेश सिंह, कल्कि धाम के पीठाधीश्वर आचार्य प्रमोद कृष्णम, भारत रक्षा मंच के राष्ट्रीय अध्यक्ष सूर्यकांत केलकर तथा राष्ट्रीय लोकदल के महासचिव त्रिलोक चंद त्यागी उपस्थित रहे। इस मौके पर कथा आयोजक अजय त्यागी ने अतिथियों का स्वागत किया।
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संवाद न्यूज एजेंसी
खरखौदा। कथा व्यास शांतनु महाराज ने रघुवंश की माताओं के आदर्श चरित्र, भगवान श्रीराम के वनगमन तथा केवट प्रसंग का भावपूर्ण वर्णन करते हुए कहा कि भारतीय संस्कृति और सनातन धर्म की रक्षा में मातृशक्ति की सबसे महत्वपूर्ण भूमिका रही है। मां कौशल्या, मां सुमित्रा, माता जानकी और उर्मिला का जीवन त्याग, समर्पण, धैर्य और धर्मपालन का सर्वोच्च उदाहरण है।
कस्बा खरखौदा में स्थित लालू अध्यक्ष फार्म हाउस में चल रही सात दिवसीय श्रीराम कथा के छठे दिन महाराज ने कहा कि आज देश, धर्म और संस्कृति सुरक्षित हैं तो इसके पीछे उन माताओं और बहनों का योगदान है, जिन्होंने धर्म की रक्षा के लिए अपने पुत्रों, भाइयों और पतियों को हंसते हुए तिलक लगाकर रणभूमि और कर्तव्यपथ पर भेजा। उन्होंने कहा कि रामराज्य का जो भव्य स्वरूप संसार के सामने दिखाई देता है, उसकी मजबूत नींव जनक परिवार की पुत्री माता जानकी के त्याग और तपस्या पर रखी गई थी। महाराज ने भगवान श्रीराम, माता जानकी और लक्ष्मण के वनगमन प्रसंग का वर्णन करते हुए कहा कि जब प्रभु अयोध्या छोड़कर वन की ओर प्रस्थान कर रहे थे, तब पूरी अयोध्या उनके साथ चल पड़ी थी। अयोध्यावासी माता कैकेयी के निर्णय को धिक्कारते हुए अपने आराध्य के प्रति प्रेम और समर्पण का परिचय दे रहे थे। यह प्रसंग दर्शाता है कि भगवान और भक्त के बीच का संबंध केवल श्रद्धा का नहीं, बल्कि आत्मीयता और प्रेम का भी होता है।
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उन्होंने निषादराज गुह और भगवान श्रीराम के मिलन प्रसंग को रामराज्य का आधार बताते हुए कहा कि आदर्श शासन वही है, जहां ऊंच-नीच, जाति-पांति और बड़े-छोटे का कोई भेदभाव न हो। भगवान श्रीराम ने अपने व्यवहार से समाज को समरसता, समानता और प्रेम का संदेश दिया। रामराज्य की कल्पना सामाजिक सौहार्द और मानवीय मूल्यों पर आधारित है।
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महाराज ने रामचरितमानस के अत्यंत भावपूर्ण केवट प्रसंग का वर्णन करते हुए कहा कि यदि मनुष्य परमात्मा की प्राप्ति करना चाहता है तो उसे सरल, सहज और निष्कपट बनना होगा। भगवान को दिखावा नहीं, बल्कि निष्कलुष और भोली भक्ति प्रिय है। केवट द्वारा भगवान के चरण धोकर उन्हें नाव में बैठाने का प्रसंग भक्त और भगवान के बीच प्रेम, विश्वास और समर्पण की अनूठी मिसाल है। उन्होंने कहा कि केवट भगवान से बार-बार तर्क करता है और उनके चरण धोने का आग्रह करता है। इसका कारण यह है कि वह प्रभु की करुणा और दयालुता को भली-भांति जानता है। प्रभु अपने भक्तों का दुख और रुदन सहन नहीं कर सकते। महाराज श्री ने कहा कि सच्चे हृदय से किया गया रुदन ही भक्ति मार्ग की वह साधना है, जो भक्त को भगवान के चरणों तक पहुंचा देती है।
कथा में मुख्य अतिथि उत्तर प्रदेश सरकार के मंत्री कुंवर बृजेश सिंह, कल्कि धाम के पीठाधीश्वर आचार्य प्रमोद कृष्णम, भारत रक्षा मंच के राष्ट्रीय अध्यक्ष सूर्यकांत केलकर तथा राष्ट्रीय लोकदल के महासचिव त्रिलोक चंद त्यागी उपस्थित रहे। इस मौके पर कथा आयोजक अजय त्यागी ने अतिथियों का स्वागत किया।

खरखौदा में चल रही श्री राम कथा सुनते भक्त(संवाद)