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18 साल बाद भी अपनी दुर्दशा पर रो रहा है रविदास आश्रम का यह सिलापट
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अपनी दुर्दशा पर आंसू बहा रहा रविदास आश्रम का शिलापट
हस्तिनापुर। भले ही केंद्र और प्रदेश सरकार बीते कई वर्षों से सबका साथ सबका विकास के दावे कर रही हो, परंतु महाभारत कालीन ऐतिहासिक नगरी में संत शिरोमणि गुरु रविदास आश्रम की आधारशिला 2003 में रखी गई थी। जिसके बाद यहां आज तक कोई निर्माण नहीं हुआ। यह स्थान वर्तमान में वन आरक्षित क्षेत्र में है।
मध्य गंग नहर किनारे प्राचीन हस्तिनापुर के समीप 26 अप्रैल, 2003 को अखिल भारतीय संत शिरोमणि सतगुरु रविदास मिशन संस्था के तहत गुरु रविदास का आश्रम बनाने के उद्देश्य से प्रदेश के पूर्व मंत्री रवि गौतम ने शिलापट का शिलान्यास किया था, जिससे कस्बे के लोगों को उम्मीद जगी थी कि संत शिरोमणि रविदास का आश्रम कस्बे में बनेगा। परंतु शिलान्यास कार्यक्रम को हुए लगभग 18 वर्ष बीत चुके हैं। इस बीच देश-प्रदेश में कई सरकार बदली लेकिन किसी भी सरकार या किसी भी जनप्रतिनिधि ने इस शिलान्यास के उद्देश्य को पूर्ण नहीं किया। आश्रम के नाम का शिलापट आज वन आरक्षित क्षेत्र के बीच सिमटकर रह गया है। जबकि संत शिरोमणि संत रविदास के जीवन के अद्भुत आश्चर्य किसी से छिपे नहीं हैं।
कस्बे के रमेश बैठकवाल का कहना है कि गुरुदेव रविदास इस प्रकार का समाज चाहते थे, जहां जाति और वर्ग के आधार पर समाज में कोई भेद न हो।
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हस्तिनापुर। भले ही केंद्र और प्रदेश सरकार बीते कई वर्षों से सबका साथ सबका विकास के दावे कर रही हो, परंतु महाभारत कालीन ऐतिहासिक नगरी में संत शिरोमणि गुरु रविदास आश्रम की आधारशिला 2003 में रखी गई थी। जिसके बाद यहां आज तक कोई निर्माण नहीं हुआ। यह स्थान वर्तमान में वन आरक्षित क्षेत्र में है।
मध्य गंग नहर किनारे प्राचीन हस्तिनापुर के समीप 26 अप्रैल, 2003 को अखिल भारतीय संत शिरोमणि सतगुरु रविदास मिशन संस्था के तहत गुरु रविदास का आश्रम बनाने के उद्देश्य से प्रदेश के पूर्व मंत्री रवि गौतम ने शिलापट का शिलान्यास किया था, जिससे कस्बे के लोगों को उम्मीद जगी थी कि संत शिरोमणि रविदास का आश्रम कस्बे में बनेगा। परंतु शिलान्यास कार्यक्रम को हुए लगभग 18 वर्ष बीत चुके हैं। इस बीच देश-प्रदेश में कई सरकार बदली लेकिन किसी भी सरकार या किसी भी जनप्रतिनिधि ने इस शिलान्यास के उद्देश्य को पूर्ण नहीं किया। आश्रम के नाम का शिलापट आज वन आरक्षित क्षेत्र के बीच सिमटकर रह गया है। जबकि संत शिरोमणि संत रविदास के जीवन के अद्भुत आश्चर्य किसी से छिपे नहीं हैं।
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कस्बे के रमेश बैठकवाल का कहना है कि गुरुदेव रविदास इस प्रकार का समाज चाहते थे, जहां जाति और वर्ग के आधार पर समाज में कोई भेद न हो।