शहीद मनवीर के परिजन बोले- जब दोषियों को लग जाएगी फांसी, तब मिलेगा सुकून
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रामपुर सीआरपीएफ केंद्र पर हुए आतंकी हमले में शहीद मनवीर के परिजनों का कहना है कि कोर्ट ने दोषियों को फांसी की सजा देकर सही फैसला किया है। लेकिन उन्हें पूरा सुकून तो तब मिलेगा जब दोषियों को फांसी के फंदे पर लटका दिया जाएगा। मनवीर धनौरा टीकरी गांव के किसान सुमेर सिंह का बेटा था। वर्ष 2007 में आतंकी हमले में मनवीर की शहादत को मां सहन नहीं कर पाई थी और एक साल के अंदर ही उसने भी अंतिम विदा ले ली।
बता दें कि बागपत में धनौरा टीकरी गांव के किसान सुमेर सिंह (70) के चार बेटे थे। इनमें ब्रजपाल, बी नारायण और सुंदर खेती करते हैं, जबकि मनवीर सीआरपीएफ में भर्ती हो गया था। सरकारी नौकरी मिली तो परिवार को बड़ा सहारा मिल गया। लेकिन 31 दिसंबर 2007 को परिवार पर गम का पहाड़ टूट पड़ा। आतंकी हमले में मनवीर शहीद हो गया। शहीद का भाई बी नारायण बताता है कि भाई की मौत के गम से पूरा परिवार आज तक उबर नहीं सका है। शहादत के एक साल बाद ही बेटे की मौत के गम में उनकी मां का निधन हो गया था। भाई सुंदर कहता है कि मां अपने बेटे की मौत का गम नहीं झेल सकी। उनका पूरा परिवार आज तक गमजदा है।
सुंदर कहते हैं कि आतंकी हमले में दोषी करार दिए गए लोगों को फांसी की सजा का फैसला तो सराहनीय है। लेकिन परिवार को पूरा सकून उसी दिन मिलेगा जब दोषी फांसी के फंदे पर लटका दिए जाएंगे। अब उन्हें किसी तरह की राहत नहीं मिलनी चाहिए। भाई बी नारायण तो यहां तक कहते हैं कि ऐसे दोषियों के सरेआम टुकड़े किए जाने चाहिएं। सीआरपीएफ के बेकसूर जवानों को मारने वाले नहीं बख्शे जाने चाहिएं।
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जिंदगीभर का गम देकर गया मनवीर
किसान सुमेर सिंह कहते हैं कि बेटे की मौत का उन्हें आज तक गम है। पूरा परिवार इस बात का यकीन ही नहीं कर पाता कि मनवीर हमारे बीच नहीं है। वह सबका लाडला था। आज भी परिवार के सदस्य रोज लाडले को याद करते हैं।
अब बच्चे ही मेरी जिंदगी का मकसद : पिंकी
शहीद मनवीर की पत्नी पिंकी का कहना है कि हादसे के बाद जिंदगी बेमायने सी हो गई थी। लेकिन फिर बच्चों के लिए जीना शुरू किया। परिवार ने पूरा साथ दिया। वह अपनी बेटी दीपा, साक्षी और बेटे मानिक के साथ रामपुर में ही मिले क्वार्टर में रहती है। पेंशन से घर चल रहा है। ससुराल और मायके वाले सहयोग करते हैं।
पति की जगह बेटे को सीआरपीएफ में भेजेंगे
पिंकी कहती हैं कि अभी बेटा कक्षा 11 में पढ़ता है। जब हादसा हुआ वह बेहद छोटा था। हमने कभी बच्चों को पीड़ा का अहसास नहीं होने दिया। लेकिन बच्चे जैसे-जैसे बड़े होते गए चीजों को समझते गए। वह स्नातक के बाद बेटे को सीआरपीएफ में ही भेजेंगी। जिंदगी से हार तो नहीं मान सकते हैं।
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