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पहली किस्त दी नहीं, अब दूसरी भी देय

Thu, 23 Jun 2016 01:42 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
अमर उजाला ब्यूरो Updated Thu, 23 Jun 2016 01:42 AM IST
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pheli kisht de nahi
फाइल फोटो - फोटो : अमर उजाला
 मंडल की चार शुगर मिलों को छोड़कर बाकी 11 मिलों ने अभी तक पहली किस्त का भी पूरा भुगतान नहीं किया है। शासनादेश के मुताबिक इनमें से कई मिलों की दूसरी किस्त (50 रुपये प्रति क्विंटल) भी देय हो चुकी है। एसएपी की दर से मंडल की शुगर इंडस्ट्री पर किसानों का 1304 करोड़ रुपये और पहली किस्त का 826 करोड़ रुपये बकाया है। प्रदेश के गन्ना एवं चीनी आयुक्त विपिन कुमार द्विवेदी ने एसएपी की दर से तत्काल भुगतान करने के आदेश दिए हैं।  
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प्रदेश सरकार ने पेराई सत्र 2015-16 में शुगर इंडस्ट्री को राहत देते हुए एसएपी 280 रुपये प्रति क्विंटल का दो किस्तों में भुगतान (पहली किस्त 230 और दूसरी 50 रुपये प्रति क्विंटल) करने की व्यवस्था की थी। शर्त में पहली किस्त का भुगतान गन्ना आपूर्ति के 14 दिन बाद और दूसरी किस्त का भुगतान पेराई सत्र खत्म होने के तीन महीने के बाद करने का प्रावधान किया गया था। शुगर इंडस्ट्री ने शर्त का पालन नहीं किया। मंडल की किसी भी शुगर मिल ने शर्त के अनुसार पहली किस्त का गन्ना आपूर्ति के 14 दिन बाद भुगतान नहीं किया। हालांकि दौराला, अनामिका, साबितगढ़ और मोहिउद्दीनपुर शुगर मिल ने पहली किस्त का शत प्रतिशत भुगतान कर दिया है। लेकिन मवाना, किनौनी, सिंभावली, मलकपुर, मोदी, बृजनाथपुर और नंगलामल ऐसी शुगर मिल है जिन पर पहली किस्त का ही करीब 750 करोड़ रुपये बकाया है।
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दूसरी किस्त भी हो चुकी देय
नंगलामल, सिंभावली, बृजनाथपुर शुगर मिल पर पेराई सत्र खत्म होने के तीन महीने बाद दूसरी किस्त का शासनादेश लागू हो चुका है। दौराला मिल पर 9 जुलाई, सकौती मिल पर 12 जुलाई, किनौनी मिल पर 29 जून, मोहिउद्दीनपुर मिल पर 18 जुलाई, मोदीनगर पर 24 जून, मलकपुर पर 11 जुलाई को दूसरी किस्त देय हो जाएगी।
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1304 करोड़ रुपये बकाया
मंडल की शुगर मिलों पर एसएपी की दर से कुल 1304 करोड़ रुपये बकाया है। इसमें से पहली किस्त का ही 826 करोड़ रुपये बकाया है। करीब 480 करोड़ दूसरी किस्त से किसानों के खाते में जाने है।


सहकारी मिल भी बकायेदार
मंडल की सहकारी मिलों ने भी पहली किस्त का संपूर्ण भुगतान नहीं किया है। बागपत मिल ने 87 फीसदी, रमाला मिल ने 90 फीसदी और अनूपशहर मिल ने 85 फीसदी भुगतान किया है। किसानों का कहना है कि सरकार अपनी मिलों से भी भुगतान कराने में फेल रही है। ऐसे में सरकार कैसे निजी शुगर मिलों पर भुगतान का दबाव बना सकती है।  
 
 
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