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पैकफेड में 82 लाख का घोटाला
अमर उजाला ब्यूरो
Updated Sun, 04 Dec 2016 01:47 AM IST
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फाइल फोटो
- फोटो : अमर उजाला
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व्यापारी, ठेकेदार या निजी कंपनियां ही टैक्स बचाने के लिए तमाम फार्मूले नहीं अपनाती हैं, बल्कि सरकारी कंपनी भी खेल करती हैं। उत्तर प्रदेश विधायन एवं निर्माण सहकारी संघ लिमिटेड (पैकफेड) का बड़ा घोटाला सामने आया है। नियमों व कागजों की बाजीगरी के जरिये सरकार को तीन माह में करीब 82 लाख का चूना लगा दिया गया है। वाणिज्य कर विभाग में फाइल खुली तो पैकफेड के साथ कई बड़े डीलर और ठेकेदारों की नींद उड़ गई। उधर, जांच को दबाने के लिए प्रदेश के सीनियर अधिकारी और सत्ताधारी दल से जुड़े कई नेता सक्रिय हो गए, जिसके बाद से जांच अधिकारी भी फाइल को दबाने की कोशिशों में लगे हैं।
अमर उजाला के हाथ लगे अहम कागजात बता रहे हैं कि पैकफेड ने अप्रैल से सितंबर के बीच करीब 60 डीलरों से आठ करोड़ रुपये में विभिन्न तरह की बिल्डिंग सामग्री खरीदी। पैकफेड ने अपने रिकार्ड में 82 लाख रुपये का खर्च सामान खरीद पर टैक्स के तौर पर दिखा दिया है। वाणिज्य कर विभाग ने छानबीन शुरू की तो पता चला कि पैकफेड ने जितने भी डीलरों से बिल्डिंग एवं कंस्ट्रक्शन आइटम खरीदें हैं, वे सभी विभाग से समाधान योजना हासिल किये हुए हैं, जिसके तहत उन्हें किसी खरीददार से टैक्स लेने का अधिकार ही नहीं है और न ही टैक्स इनवॉइस जारी करने का। लेकिन इन्होंने पैकफेड को टैक्स इनवाइस जारी की और उसकी वसूली भी की। अब पैकफेड से वसूला गया टैक्स सरकार को चुकाना था, लेकिन समाधान योजना का क्लेम करते डीलरों ने चवन्नी भी विभाग में जमा नहीं कराई। जबकि नियम कहता है कि अगर कोई डीलर या विक्रेता जनता से टैक्स लेता है, तो वह सरकार के खाते में जायेगा।
पैकफेड भी खेल में शामिल
जांच के बीच पैकफेड क्लेम कर रहा है कि उसे डीलर ने टैक्स इनवायस दी थी, जिस कारण उसने टैक्स चुकाया। लेकिन पैकफेड के अधिकारी और अभियंता इस बात का जवाब नहीं दे पाये कि उन्होंने सारी खरीदी उन्हीं डीलरों से कैसे की, जिन्होंने समाधान योजना ली हुई है। ऐसे में स्पष्ट होता है कि पैकफेड के अधिकारियों से लेकर इंजीनियरों तक को पूरे स्कैम की जानकारी थी। दस्तावेज बता रहे हैं कि पैकफेड ने बिल्डिंग आइटम (टाइल्स, पत्थर, लकड़ी, बिजली का सामान आदि) खरीद के लिए मेरठ, मुजफ्फरनगर, गाजियाबाद से लेकर मुरादाबाद तक उन्हीं डीलरों को चिह्नित किया, जो समाधान योजना धारक हैं।
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कैसे खुला मामला ?
बताया जा रहा है कि वाणिज्य कर विभाग के डिप्टी कमिश्नर पैकफेड की ऑनलाइन खरीद को देख रहे थे, जिसमें पैकफेड में आईटीसी (इनपुट टैक्स क्रेडिट) के जरिये 82 लाख रुपया आगे ले जाना दिखाया गया। ऐसे में आगे की छानबीन की गई। उन डीलरों की जांच की गई, जिनसे सामान खरीदा गया। इसके बाद सारा मामला खुलता चला गया।
बड़ौत का स्टेडियम अहम कड़ी
जांच के दौरान कस्बा बड़ौत (बागपत) का निर्माणाधीन स्टेडियम सबसे अहम कड़ी साबित हुआ। 141.52 लाख के स्टेडियम को बनाने में खरीदी गई सामग्री के जरिये ही जांच अधिकारी सारे घोटाले की तह तक पहुंच पाये। क्योंकि मेरठ जोन (मेरठ व बागपत) में सबसे ज्यादा खरीद पैकफेड ने इसी स्टेडियम के नाम पर की है।
क्या है समाधान योजना ?
वाणिज्य कर विभाग समाधान योजना को संचालित करता है, जिसे कोई भी ऐसा डीलर या सिविल वर्क का ठेकेदार हासिल कर सकता है जिसका सालाना टर्नओवर 50 लाख रुपये का हो। उसके बदले योजना धारक को टर्नओवर पर सिर्फ आधे फीसदी का टैक्स देना होता है। लेकिन समाधान योजना की सबसे अहम शर्त यही होती है कि वो किसी भी ग्राहक यानी खरीददार से टैक्स नहीं वसूलेगा और न ही टैक्स इनवाइस जारी करेगा।
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अमर उजाला के हाथ लगे अहम कागजात बता रहे हैं कि पैकफेड ने अप्रैल से सितंबर के बीच करीब 60 डीलरों से आठ करोड़ रुपये में विभिन्न तरह की बिल्डिंग सामग्री खरीदी। पैकफेड ने अपने रिकार्ड में 82 लाख रुपये का खर्च सामान खरीद पर टैक्स के तौर पर दिखा दिया है। वाणिज्य कर विभाग ने छानबीन शुरू की तो पता चला कि पैकफेड ने जितने भी डीलरों से बिल्डिंग एवं कंस्ट्रक्शन आइटम खरीदें हैं, वे सभी विभाग से समाधान योजना हासिल किये हुए हैं, जिसके तहत उन्हें किसी खरीददार से टैक्स लेने का अधिकार ही नहीं है और न ही टैक्स इनवॉइस जारी करने का। लेकिन इन्होंने पैकफेड को टैक्स इनवाइस जारी की और उसकी वसूली भी की। अब पैकफेड से वसूला गया टैक्स सरकार को चुकाना था, लेकिन समाधान योजना का क्लेम करते डीलरों ने चवन्नी भी विभाग में जमा नहीं कराई। जबकि नियम कहता है कि अगर कोई डीलर या विक्रेता जनता से टैक्स लेता है, तो वह सरकार के खाते में जायेगा।
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पैकफेड भी खेल में शामिल
जांच के बीच पैकफेड क्लेम कर रहा है कि उसे डीलर ने टैक्स इनवायस दी थी, जिस कारण उसने टैक्स चुकाया। लेकिन पैकफेड के अधिकारी और अभियंता इस बात का जवाब नहीं दे पाये कि उन्होंने सारी खरीदी उन्हीं डीलरों से कैसे की, जिन्होंने समाधान योजना ली हुई है। ऐसे में स्पष्ट होता है कि पैकफेड के अधिकारियों से लेकर इंजीनियरों तक को पूरे स्कैम की जानकारी थी। दस्तावेज बता रहे हैं कि पैकफेड ने बिल्डिंग आइटम (टाइल्स, पत्थर, लकड़ी, बिजली का सामान आदि) खरीद के लिए मेरठ, मुजफ्फरनगर, गाजियाबाद से लेकर मुरादाबाद तक उन्हीं डीलरों को चिह्नित किया, जो समाधान योजना धारक हैं।
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कैसे खुला मामला ?
बताया जा रहा है कि वाणिज्य कर विभाग के डिप्टी कमिश्नर पैकफेड की ऑनलाइन खरीद को देख रहे थे, जिसमें पैकफेड में आईटीसी (इनपुट टैक्स क्रेडिट) के जरिये 82 लाख रुपया आगे ले जाना दिखाया गया। ऐसे में आगे की छानबीन की गई। उन डीलरों की जांच की गई, जिनसे सामान खरीदा गया। इसके बाद सारा मामला खुलता चला गया।
बड़ौत का स्टेडियम अहम कड़ी
जांच के दौरान कस्बा बड़ौत (बागपत) का निर्माणाधीन स्टेडियम सबसे अहम कड़ी साबित हुआ। 141.52 लाख के स्टेडियम को बनाने में खरीदी गई सामग्री के जरिये ही जांच अधिकारी सारे घोटाले की तह तक पहुंच पाये। क्योंकि मेरठ जोन (मेरठ व बागपत) में सबसे ज्यादा खरीद पैकफेड ने इसी स्टेडियम के नाम पर की है।
क्या है समाधान योजना ?
वाणिज्य कर विभाग समाधान योजना को संचालित करता है, जिसे कोई भी ऐसा डीलर या सिविल वर्क का ठेकेदार हासिल कर सकता है जिसका सालाना टर्नओवर 50 लाख रुपये का हो। उसके बदले योजना धारक को टर्नओवर पर सिर्फ आधे फीसदी का टैक्स देना होता है। लेकिन समाधान योजना की सबसे अहम शर्त यही होती है कि वो किसी भी ग्राहक यानी खरीददार से टैक्स नहीं वसूलेगा और न ही टैक्स इनवाइस जारी करेगा।