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आत्मचिंतन से ही मिटेगा जीवन का संताप : विमर्श सागर
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प्राचीन दिगंबर जैन बड़े मंदिर में पूजा अर्चना करते श्रद्धालु स्रोत संवाद
संवाद न्यूज एजेंसी
हस्तिनापुर। कस्बे के कैलाश पर्वत दिगंबर जैन मंदिर में विश्व की सुख-शांति-समृद्धि के लिए चल रहे 48 दिवसीय भक्तामर विधान एवं पाठ के सत्रहवें दिन विधानाचार्य सौरभ शास्त्री ने मांगलिक मंत्रों से क्रियाओं का शुभारंभ किया।
आकाश जैन और आशीष जैन ने स्वर्ण कलश से अभिषेक किया। शांतिधारा प्रफुल्ल जैन और दीप प्रज्ज्वलन रूपा जैन ने किया। सुनीता दीदी ने शांतिधारा का उच्चारण किया। आदिनाथ भगवान की पूजा और सभी तीर्थंकरों को अर्घ्य चढ़ाने के बाद भक्तामर विधान का शुभारंभ हुआ। 48 अर्घ्य चढ़ाए गए। 136 परिवारों की ओर से विधान का आयोजन कराया गया।
विमर्श सागर महाराज ने कहा कि मनुष्य प्रायः अपने दुखों के लिए दूसरों को जिम्मेदार ठहराता है, जबकि वास्तविक शांति तब मिलती है जब व्यक्ति स्वयं के भीतर झांककर अपने दुख के कारणों को समझता है। उन्होंने कहा कि बाहरी परिस्थितियां केवल निमित्त होती हैं। मूल कारण हमारे विचार, कर्म और दृष्टिकोण में छिपा होता है।
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आचार्य ने कहा कि जब तक मनुष्य अपने स्वभाव, अपेक्षाओं और आसक्ति का विश्लेषण नहीं करेगा, तब तक दुखों से मुक्ति संभव नहीं है। आत्मचिंतन और संयम ही जीवन को संतुलित बनाते हैं। उन्होंने श्रद्धालुओं को प्रतिदिन कुछ समय आत्ममंथन के लिए निकालने और अपने आचरण को सुधारने का संकल्प लेने की प्रेरणा दी। आचार्य ने सभी को धर्म के मार्ग पर चलकर आत्मकल्याण का संदेश दिया।
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हस्तिनापुर। कस्बे के कैलाश पर्वत दिगंबर जैन मंदिर में विश्व की सुख-शांति-समृद्धि के लिए चल रहे 48 दिवसीय भक्तामर विधान एवं पाठ के सत्रहवें दिन विधानाचार्य सौरभ शास्त्री ने मांगलिक मंत्रों से क्रियाओं का शुभारंभ किया।
आकाश जैन और आशीष जैन ने स्वर्ण कलश से अभिषेक किया। शांतिधारा प्रफुल्ल जैन और दीप प्रज्ज्वलन रूपा जैन ने किया। सुनीता दीदी ने शांतिधारा का उच्चारण किया। आदिनाथ भगवान की पूजा और सभी तीर्थंकरों को अर्घ्य चढ़ाने के बाद भक्तामर विधान का शुभारंभ हुआ। 48 अर्घ्य चढ़ाए गए। 136 परिवारों की ओर से विधान का आयोजन कराया गया।
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विमर्श सागर महाराज ने कहा कि मनुष्य प्रायः अपने दुखों के लिए दूसरों को जिम्मेदार ठहराता है, जबकि वास्तविक शांति तब मिलती है जब व्यक्ति स्वयं के भीतर झांककर अपने दुख के कारणों को समझता है। उन्होंने कहा कि बाहरी परिस्थितियां केवल निमित्त होती हैं। मूल कारण हमारे विचार, कर्म और दृष्टिकोण में छिपा होता है।
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आचार्य ने कहा कि जब तक मनुष्य अपने स्वभाव, अपेक्षाओं और आसक्ति का विश्लेषण नहीं करेगा, तब तक दुखों से मुक्ति संभव नहीं है। आत्मचिंतन और संयम ही जीवन को संतुलित बनाते हैं। उन्होंने श्रद्धालुओं को प्रतिदिन कुछ समय आत्ममंथन के लिए निकालने और अपने आचरण को सुधारने का संकल्प लेने की प्रेरणा दी। आचार्य ने सभी को धर्म के मार्ग पर चलकर आत्मकल्याण का संदेश दिया।

प्राचीन दिगंबर जैन बड़े मंदिर में पूजा अर्चना करते श्रद्धालु स्रोत संवाद

प्राचीन दिगंबर जैन बड़े मंदिर में पूजा अर्चना करते श्रद्धालु स्रोत संवाद