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इन हालातों में तो 'पीजीआई' नहीं बन पाएगा एलएलआरएम मेडिकल कॉलेज
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इन हालात में पीजीआई नहीं बन पाएगा एलएलआरएम मेडिकल कॉलेज
मेरठ। एलएलआरएम मेडिकल कॉलेज में भी संजय गांधी पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टीटूट ऑफ मेडिकल साइंस (एसजीपीजीआई) की तरह इलाज मिले। यह यहां परेशान मरीजों के लिए किसी संजीवनी से कम नहीं होगा। हाईकोर्ट ने भी इस तरह की हिदायत दी है, लेकिन यहां के जो हालात हैं, उनमें यह संभव नजर नहीं आ रहा है।
दरअसल, मेडिकल कॉलेज में विशेषज्ञ चिकित्सकों की कमी है और दवाओं का टोटा है। गनीमत है कि कोरोना काल के कारण लॉक डाउन में सामान्य ओपीडी बंद रही, नहीं तो अस्पतालों में और बिगड़े हालात होते।
मेडिकल कॉलेज में 839 तरह की दवाएं रजिस्टर्ड हैं, जिनमें से वहां इन दिनों 450 तरह की दवाएं उपलब्ध हैं। 389 प्रकार की दवाएं नहीं हैं। खासकर सर्जिकल में इस्तेमाल होने वाली दवाएं। दूसरी तरफ, कोरोना महामारी चलते हुए एक साल से ज्यादा हो गया, मगर चिकित्सकों की भरपाई नहीं हो सकी।
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मेडिकल कॉलेज में 44 चिकित्सकों व शिक्षकों की कमी है। फार्मेसी, मेडिसिन, रेडियोथेरेपी, रेडियोडायग्नोसिस, ह्यूमन मेटाबोल्जिम, ईएनटी और गायनोकोलोजी में पद खाली है। फार्माकोलोजी, फोरेंसिक मेडिसिन, न्यूरोलॉजी, माइक्रोबायोलॉजी में भी पद खाली चल रहे हैं।
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अस्थाई चिकित्सकों से की जा रही भरपाई
मेडिकल के प्राचार्य डॉ ज्ञानेंद्र कुमार ने बताया कि मेडिकल कॉलेज के पास 8 करोड़ से ज्यादा दवाओं का बजट और जरूरी दवाएं हैं। ओपीडी न चलने के कारण ज्यादा दवाएं नहीं मंगाई गई। आगे जरूरत के हिसाब से मंगाई जाएंगी। चिकित्सकों की कमी को पूरा करने के लिए कुछ अस्थाई चिकित्सक रखे गए हैं।
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मेडिकल कॉलेज में नहीं ये सुविधाएं
- लेजर तकनीक से आंखों का इलाज
- जले हुए मरीज के लिए बर्न वार्ड
- कैंसर के मरीजों के लिए रेडियोथैरेपी
- लीवर और हृदय रोग का इलाज
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शुरू नहीं हो पाई सुपर स्पेशयलिटी सुविधाएं
मेरठ। एलएलआरएम मेडिकल कॉलेज में 150 करोड़ रुपये की लागत से बने सुपर स्पेशयलिटी ब्लॉक का लोकार्पण नहीं हो सका है। करीब दो साल से इसकी कवायद चल रही है। पहले प्रधानमंत्री के आने की बात थी, इसके बाद केंद्रीय गृहमंत्री, फिर केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री के आने की तैयारी थी। इससे पहले भी एक बार यूपी के मुख्यमंत्री के आने की चर्चा थी, और अब फिर से मुख्यमंत्री को लोकार्पण करने के लिए आना था, लेकिन उनका कार्यक्रम निरस्त हो गया। साल 2016 में इसकी नींव रखी गई थी। बिल्डिंग बनकर तैयार हुई, लेकिन लगातार कमियों और विशेषज्ञ चिकित्सकों के चलते उद्घाटन नहीं हो पाया। इसके बाद कोरोना कॉल आ जाने से यह व्यवस्था अमली जामा नहीं पहन सकी। मेडिकल कॉलेज के इस सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल को मिनी एम्स बनाने की कवायद थी। हालांकि लोकार्पण हो जाने के बाद भी फिलहाल ऐसा नहीं लगता कि मरीजों को सुपरस्पेशलिटी वाली सुविधाएं मिलेंगी।
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अब तक अटकीं हैं ये विशेष सुविधाएं
- गुर्दे के मरीजों के लिए नेफ्रोलॉजी ओपीडी व नेफ्रोसर्जरी
- दिल के मरीजों के कार्डियोलॉजी विभाग
- दिल के मरीजों की जांच के लिए कैथ लैब
- दिल की सर्जरी के कार्डियोथोरोसिक व वस्कुलर सर्जरी
- बच्चों के लिए पीडियाट्रिक ओपीडी व पीडिया सर्जरी
- जले हुए मरीजों के लिए रिकंस्ट्रक्टिव व प्लास्टिक सर्जरी
- कैंसर के मरीजों के लिए रेडियोलॉजी थेरेपी
- एमबीबीएस की 50 सीटें कम हो गई
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71 करोड़ रुपये के अटके हुए हैं काम
- मेडिकल में मॉड्यूलर ओटी का उच्चीकरण
- मेडिकल व नर्सिंग कॉलेज का जीर्णोद्धार
- लेक्चर थियेटर व केंद्रीय पुस्तकालय का निर्माण
- बर्न यूनिट का निर्माण, लेबर रूम का उच्चीकरण।
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मेरठ। एलएलआरएम मेडिकल कॉलेज में भी संजय गांधी पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टीटूट ऑफ मेडिकल साइंस (एसजीपीजीआई) की तरह इलाज मिले। यह यहां परेशान मरीजों के लिए किसी संजीवनी से कम नहीं होगा। हाईकोर्ट ने भी इस तरह की हिदायत दी है, लेकिन यहां के जो हालात हैं, उनमें यह संभव नजर नहीं आ रहा है।
दरअसल, मेडिकल कॉलेज में विशेषज्ञ चिकित्सकों की कमी है और दवाओं का टोटा है। गनीमत है कि कोरोना काल के कारण लॉक डाउन में सामान्य ओपीडी बंद रही, नहीं तो अस्पतालों में और बिगड़े हालात होते।
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मेडिकल कॉलेज में 839 तरह की दवाएं रजिस्टर्ड हैं, जिनमें से वहां इन दिनों 450 तरह की दवाएं उपलब्ध हैं। 389 प्रकार की दवाएं नहीं हैं। खासकर सर्जिकल में इस्तेमाल होने वाली दवाएं। दूसरी तरफ, कोरोना महामारी चलते हुए एक साल से ज्यादा हो गया, मगर चिकित्सकों की भरपाई नहीं हो सकी।
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मेडिकल कॉलेज में 44 चिकित्सकों व शिक्षकों की कमी है। फार्मेसी, मेडिसिन, रेडियोथेरेपी, रेडियोडायग्नोसिस, ह्यूमन मेटाबोल्जिम, ईएनटी और गायनोकोलोजी में पद खाली है। फार्माकोलोजी, फोरेंसिक मेडिसिन, न्यूरोलॉजी, माइक्रोबायोलॉजी में भी पद खाली चल रहे हैं।
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अस्थाई चिकित्सकों से की जा रही भरपाई
मेडिकल के प्राचार्य डॉ ज्ञानेंद्र कुमार ने बताया कि मेडिकल कॉलेज के पास 8 करोड़ से ज्यादा दवाओं का बजट और जरूरी दवाएं हैं। ओपीडी न चलने के कारण ज्यादा दवाएं नहीं मंगाई गई। आगे जरूरत के हिसाब से मंगाई जाएंगी। चिकित्सकों की कमी को पूरा करने के लिए कुछ अस्थाई चिकित्सक रखे गए हैं।
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मेडिकल कॉलेज में नहीं ये सुविधाएं
- लेजर तकनीक से आंखों का इलाज
- जले हुए मरीज के लिए बर्न वार्ड
- कैंसर के मरीजों के लिए रेडियोथैरेपी
- लीवर और हृदय रोग का इलाज
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शुरू नहीं हो पाई सुपर स्पेशयलिटी सुविधाएं
मेरठ। एलएलआरएम मेडिकल कॉलेज में 150 करोड़ रुपये की लागत से बने सुपर स्पेशयलिटी ब्लॉक का लोकार्पण नहीं हो सका है। करीब दो साल से इसकी कवायद चल रही है। पहले प्रधानमंत्री के आने की बात थी, इसके बाद केंद्रीय गृहमंत्री, फिर केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री के आने की तैयारी थी। इससे पहले भी एक बार यूपी के मुख्यमंत्री के आने की चर्चा थी, और अब फिर से मुख्यमंत्री को लोकार्पण करने के लिए आना था, लेकिन उनका कार्यक्रम निरस्त हो गया। साल 2016 में इसकी नींव रखी गई थी। बिल्डिंग बनकर तैयार हुई, लेकिन लगातार कमियों और विशेषज्ञ चिकित्सकों के चलते उद्घाटन नहीं हो पाया। इसके बाद कोरोना कॉल आ जाने से यह व्यवस्था अमली जामा नहीं पहन सकी। मेडिकल कॉलेज के इस सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल को मिनी एम्स बनाने की कवायद थी। हालांकि लोकार्पण हो जाने के बाद भी फिलहाल ऐसा नहीं लगता कि मरीजों को सुपरस्पेशलिटी वाली सुविधाएं मिलेंगी।
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अब तक अटकीं हैं ये विशेष सुविधाएं
- गुर्दे के मरीजों के लिए नेफ्रोलॉजी ओपीडी व नेफ्रोसर्जरी
- दिल के मरीजों के कार्डियोलॉजी विभाग
- दिल के मरीजों की जांच के लिए कैथ लैब
- दिल की सर्जरी के कार्डियोथोरोसिक व वस्कुलर सर्जरी
- बच्चों के लिए पीडियाट्रिक ओपीडी व पीडिया सर्जरी
- जले हुए मरीजों के लिए रिकंस्ट्रक्टिव व प्लास्टिक सर्जरी
- कैंसर के मरीजों के लिए रेडियोलॉजी थेरेपी
- एमबीबीएस की 50 सीटें कम हो गई
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71 करोड़ रुपये के अटके हुए हैं काम
- मेडिकल में मॉड्यूलर ओटी का उच्चीकरण
- मेडिकल व नर्सिंग कॉलेज का जीर्णोद्धार
- लेक्चर थियेटर व केंद्रीय पुस्तकालय का निर्माण
- बर्न यूनिट का निर्माण, लेबर रूम का उच्चीकरण।